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  "type": "article",
  "title": "भीलवाड़ा के इस अनूठे गांव में नहीं जलाया जाता रावण का पुतला, सदी पुरानी प्रतिमा का होता है वध",
  "summary": "भीलवाड़ा जिले के रोपां गांव में दशहरा बेहद अनोखे तरीके से मनाया जाता है, जहां पुतला फूंकने के बजाय करीब 100 साल पुरानी स्थायी प्रतिमा का वध किया जाता है और लोग इसे अपनी गहरी आस्था का केंद्र मानते हैं।",
  "content": "भीलवाड़ा के शाहपुरा जिले में स्थित रोपां गांव का दशहरा उत्सव देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग और अनूठा माना जाता है। सामान्य तौर पर देश भर में विजयादशमी के पावन अवसर पर रावण के बड़े-बड़े पुतलों को आग के हवाले किया जाता है, लेकिन इस गांव में परंपरा बिल्कुल जुदा है। यहां किसी कागजी पुतले का दहन करने का विधान नहीं है, बल्कि गांव में स्थापित करीब 10 फीट ऊंची एक स्थायी प्रतिमा का वध किया जाता है। त्योहार की शुरुआत से ठीक पहले इस प्राचीन मूर्ति की विशेष रंगाई-पुताई की जाती है और फिर राम की भूमिका निभा रहे एक छोटे बालक द्वारा तीर-कमान चलाकर रावण वध की रस्म पूरी की जाती है। इस दिलचस्प और अनोखे आयोजन को देखने के लिए न सिर्फ स्थानीय ग्रामीण, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी बड़ी तादाद में दर्शक इकट्ठा होते हैं।\n\nएक सदी पुरानी परंपरा और लंका दहन का विधान\nस्थानीय लोगों की जानकारी के मुताबिक, गांव में मौजूद रावण की यह स्थायी मूर्ति करीब 100 साल से भी अधिक पुरानी है। इसी प्राचीन रीति-रिवाज के कारण आसपास के लोग इस क्षेत्र को रावण के गांव के रूप में भी अच्छी तरह पहचानते हैं। मुख्य वध समारोह से ठीक एक दिन पहले गांव में लंका दहन का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस अनुष्ठान के तहत भगवान चारभुजानाथ के मुख्य मंदिर से ठाकुरजी की एक सुंदर शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसके बाद राम और लक्ष्मण के पात्रों की बोली लगाने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद हनुमान का किरदार निभा रहा बाल कलाकार रावण चौक की तरफ बढ़ता है, जहां प्रतीकात्मक रूप से लंका दहन की प्रक्रिया पूरी की जाती है। अगले दिन निर्धारित समय पर राम बने बालक के हाथों तीर-कमान से रावण का वध संपन्न होता है।\n\nग्रामीणों की अटूट आस्था और विद्वान के रूप में सम्मान\nरोपां गांव में रावण की यह प्रतिमा केवल एक पुरानी रस्म भर नहीं है, बल्कि यह यहां के बाशिंदों के लिए अटूट विश्वास और गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र भी है। गांव के पुजारी पंडित सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि यहां रावण को किसी खलनायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ज्ञानी विद्वान के तौर पर देखा और माना जाता है। करीब एक सदी से बिना किसी रुकावट के चली आ रही इस परंपरा में दहन की जगह उसका वध करने का विधान है। दशहरे के खास दिन यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें पूरा गांव बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।\n\nसंकट के समय पूरी हुई मन्नत और बारिश का चमत्कार\nपुजारी के अनुसार, गांव के लोग अपनी विभिन्न मनोकामनाएं लेकर पूरी श्रद्धा के साथ रावण के इस स्थान पर पहुंचते हैं और मन्नत पूरी हो जाने पर विधि-विधान से चढ़ावा अर्पित करते हैं। वे एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार गांव में सूखे और अकाल जैसे हालात पैदा हो गए थे और आसमान में बादलों का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था। तब परेशान ग्रामीणों ने रावण के इसी स्थान पर पूरी रात जागकर जागरण किया और अच्छी बारिश होने की कामना की। लोगों की गहरी मान्यता है कि जैसे ही सुबह हुई, इलाके में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। इस चमत्कारिक घटना के बाद से रावण के प्रति स्थानीय लोगों का विश्वास और भी ज्यादा गहरा हो गया। आज भी जब लोग इस रास्ते से निकलते हैं, तो वे रावण को आदरपूर्वक धोक देते हैं और अपनी हर मुराद पूरी होने के लिए प्रार्थना करते हैं।\n\nपूर्वजों की अमूल्य विरासत और पीढ़ियों का सफर\nगाँव के निवासी भागचंद शर्मा इस अनूठी परंपरा को अपने पुरखों की एक अनमोल विरासत बताते हैं। उनका कहना है कि वे अपने बचपन के दिनों से ही इस प्राचीन प्रतिमा को देखते आ रहे हैं। जहाँ दूसरे गाँवों में विजयादशमी के दिन बुराई के प्रतीक रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं रोपां में इस स्थायी मूर्ति के वध के जरिए ही पर्व का उल्लास मनाया जाता है। बारिश न होने की स्थिति में रातभर जागरण करने और मन्नत माँगने की यह कहानी यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही है। इसी लोकमान्यता के चलते आज भी लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए यहाँ आते हैं और मनोकामना पूरी होने पर प्रसाद या चढ़ावा भेंट करते हैं।\n\nसांस्कृतिक धरोहर और एक अलग पहचान\nरोपां गाँव की यह अनोखी प्रथा इस पर्व को एक विशिष्ट पहचान देती है। जहाँ आम तौर पर देश भर में रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है, वहीं इस गाँव में सदी पुरानी प्रतिमा का वध करके परंपरा का निर्वाह किया जाता है। आस्था, इतिहास और संस्कृति का यह अनूठा संगम इस क्षेत्र को खास बनाता है। यहाँ का दशहरा इस बात का जीता-जाता प्रमाण है कि एक ही त्योहार को देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय मान्यताओं और संस्कृति के अनुसार कितने भिन्न और अनूठे रूपों में मनाया जाता है।\n\nइसका आप पर असर\nरोपां गांव की यह अनूठी परंपरा मुख्य रूप से स्थानीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है, जिसका सीधा असर वहां की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन पर पड़ता है।\n\n• स्थानीय प्रभाव: भीलवाड़ा और शाहपुरा क्षेत्र के आसपास के लोगों के लिए यह दशहरा मेला एक बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक आकर्षण होता है। इस आयोजन से स्थानीय स्तर पर मेल-जोल और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।\n• व्यापक प्रभाव: देश भर में रोपां गांव अपनी इस सदी पुरानी अनूठी परंपरा के कारण अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है, जो विभिन्न क्षेत्रों की लोक मान्यताओं को रेखांकित करता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरोपां गांव में रावण का दहन न करके उसके वध की यह अनूठी प्रथा करीब एक सदी पुरानी लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है।\n\n• ऐतिहासिक परंपरा: गांव में स्थापित करीब 100 साल पुरानी स्थायी प्रतिमा के कारण यह अनोखी प्रथा पीढ़ियों से बिना किसी रुकावट के चली आ रही है।\n• लोक मान्यता: अकाल और सूखे के दौरान ग्रामीणों द्वारा किए गए रात्रि जागरण के बाद हुई बारिश की चमत्कारिक घटना ने इस स्थान के प्रति लोगों की आस्था को और अधिक मजबूत किया।\n• विद्वान के रूप में सम्मान: स्थानीय परंपरा में रावण को खलनायक के बजाय एक ज्ञानी विद्वान के रूप में देखा जाता है, जिसके कारण पुतला जलाने के बजाय उसका वध किया जाता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रोपां गांव कहां स्थित है?\nरोपां गांव भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा क्षेत्र में स्थित है।\n\n2. रोपां गांव में दशहरा क्यों खास है?\nयहां रावण का पुतला जलाने के बजाय करीब 100 साल पुरानी स्थायी प्रतिमा का वध किया जाता है।\n\n3. रावण वध से पहले कौन सा कार्यक्रम होता है?\nरावण वध से एक दिन पहले लंका दहन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।\n\n4. इस परंपरा के पीछे क्या मान्यता है?\nग्रामीण रावण को एक विद्वान मानते हैं और संकट के समय मन्नत पूरी होने पर यहां चढ़ावा चढ़ाते हैं।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-17",
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