भीलवाड़ा के खेतों में लहलहाएगी मूंग की एमएच-1142 किस्म, कम समय और कम पानी में बंपर मुनाफे की उम्मीद भीलवाड़ा के पोण्डरास गांव में कृषि विज्ञान केंद्र ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत मूंग की उन्नत किस्म एमएच-1142 का प्रदर्शन किया, जिससे प्रति हेक्टेयर 16 से 18 क्विंटल तक पैदावार मिलने की उम्मीद है। कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा ने सुवाणा पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाले पोण्डरास गांव में मूंग की फसल को लेकर एक विशेष फील्ड डे का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय किसानों को कृषि की उन्नत तकनीकों से रूबरू कराना और उन्हें खेती में आत्मनिर्भर बनाना था। इस कृषि चौपाल के दौरान उपस्थित किसानों को मूंग की नई और उन्नत किस्म एमएच-1142 के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। दलहन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे 'दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन' के तहत इस उन्नत किस्म का प्रदर्शन गांव के कुल 37 किसानों के खेतों पर किया गया है। इन सभी चयनित किसानों को प्रदर्शन के लिए प्रति किसान 6 किलोग्राम उन्नत बीज के साथ-साथ आवश्यक जैव उर्वरक और कीटनाशक भी मुफ्त में उपलब्ध कराए गए ताकि वे आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से इसकी बुवाई कर सकें। एमएच-1142 किस्म की विशेषताएं और इसके फायदे कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ. सी. एम. यादव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए किसानों को इस उन्नत किस्म के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें बताईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मूंग की एमएच-1142 किस्म पारंपरिक रूप से बोई जाने वाली अन्य किस्मों की तुलना में बहुत अधिक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत ही कम समय में पककर तैयार हो जाती है। जब कोई फसल कम समय में तैयार हो जाती है, तो किसानों को अपनी जमीन खाली करने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इससे वे बिना किसी देरी के अपनी अगली फसल की बुवाई बिल्कुल सही समय पर शुरू कर सकते हैं, जिससे उनकी वार्षिक कृषि योजना प्रभावित नहीं होती। इसके अतिरिक्त, इस किस्म में फसलों को बर्बाद करने वाले घातक पीला मोजेक वायरस का प्रकोप भी न के बराबर देखा गया है। पीला मोजेक वायरस के प्रति प्रतिरोधी होने के कारण यह फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है और किसानों को फसल सुरक्षा के साथ-साथ शानदार उत्पादन का दोहरा लाभ मिलता है। लागत कम करने और बीज उत्पादन पर विशेष जोर कार्यक्रम के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को खुद के स्तर पर उन्नत बीज तैयार करने के लिए प्रेरित किया। इस योजना के माध्यम से किसान अब केवल उपभोक्ता बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि वे खुद अपने खेतों में उच्च गुणवत्ता वाले बीज तैयार करने में सक्षम हो सकेंगे। जब किसान स्वयं गुणवत्तापूर्ण बीज का उत्पादन करेंगे, तो न केवल उनकी अपनी निर्भरता बाजार पर कम होगी, बल्कि वे अपने आसपास के अन्य साथी किसानों को भी सही दाम पर बेहतर किस्म के बीज आसानी से उपलब्ध करा सकेंगे। डॉ. सी. एम. यादव ने किसानों से खेती की कुल लागत को कम करने और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर पैदावार को दोगुना करने का आह्वान किया। इसके लिए उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण कृषि रणनीतियों को अपनाने की सलाह दी, जिसमें बुवाई से पहले बीजोपचार करना, हमेशाा मान्यता प्राप्त और उन्नत किस्मों के बीजों का ही चयन करना, मिट्टी की जांच के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना और फसल चक्र की वैज्ञानिक नीति का कड़ाई से पालन करना शामिल है। प्राकृतिक खेती की ओर कदम और उत्पादन का अनुमान आधुनिक रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर मोड़ने के लिए कई उपयोगी तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी गई। डॉ. यादव ने किसानों को स्वयं अपने घरों पर जैविक इनपुट तैयार करने की सरल विधियों के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत और फसलों को कीटों से बचाने के लिए नीमास्त्र बनाने की पूरी प्रक्रिया का प्रदर्शन किया और इनके सही उपयोग के तरीके बताए। इसके साथ ही, गिरते भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों को ऐसी फसलों की बुवाई करने के लिए प्रेरित किया जिनमें बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार जिन खेतों में मूंग की उन्नत किस्म एमएच-1142 का प्रदर्शन किया गया है, वहां फसल की स्थिति बहुत अच्छी है। अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि इस बार किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग 16 से 18 क्विंटल तक मूंग का बंपर उत्पादन प्राप्त हो सकता है, जो सामान्य पैदावार से काफी अधिक है। इसका आप पर असर मूंग की उन्नत किस्म एमएच-1142 को अपनाकर किसान कम समय में अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी और प्राकृतिक खेती के तरीकों से कृषि लागत में कमी आएगी। • भारत में: दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ने से देश में दालों की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। इससे आम उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर पोषक दालें मिल सकेंगी। • भीलवाड़ा में: स्थानीय किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र के सहयोग से मुफ्त उन्नत बीज और तकनीकी मार्गदर्शन मिल रहा है। इससे जिले में दलहन की पैदावार बढ़कर 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह कार्यक्रम दलहन क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया। सरकार और कृषि वैज्ञानिक चाहते हैं कि किसान उन्नत बीजों और प्राकृतिक तरीकों का उपयोग करके अपनी कृषि लागत को कम करें। इसके अलावा, पारंपरिक मूंग फसलों में पीला मोजेक वायरस और कम उत्पादकता जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए एमएच-1142 जैसी प्रतिरोधी किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है। • आत्मनिर्भरता की आवश्यकता: भारत को दलहन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। • बीमारियों से सुरक्षा: पारंपरिक मूंग की फसलों में पीला मोजेक वायरस जैसी बीमारियों से फसल नष्ट हो जाती थी, जिसका समाधान एमएच-1142 जैसी प्रतिरोधी किस्में प्रदान करती हैं। • मृदा स्वास्थ्य और कम पानी: लगातार रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता गिर रही थी, इसलिए किसानों को जीवामृत और नीमास्त्र जैसी प्राकृतिक तकनीकों के प्रति जागरूक किया गया। सवाल-जवाब 1. मूंग की एमएच-1142 किस्म की मुख्य विशेषता क्या है? यह किस्म बहुत कम समय में पककर तैयार हो जाती है और इसमें पीला मोजेक वायरस जैसी बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है। 2. दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत भीलवाड़ा में कितने किसानों को शामिल किया गया? सुवाणा पंचायत समिति के पोण्डरास गांव में कुल 37 किसानों के खेतों में इस किस्म का प्रदर्शन किया गया। 3. प्रदर्शन के लिए किसानों को क्या-क्या सामग्री प्रदान की गई? प्रत्येक किसान को 6 किलोग्राम उन्नत बीज के साथ जैव उर्वरक और कीटनाशक उपलब्ध कराए गए। 4. एमएच-1142 किस्म से प्रति हेक्टेयर कितने उत्पादन की उम्मीद है? कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस उन्नत किस्म से प्रति हेक्टेयर लगभग 16 से 18 क्विंटल तक उत्पादन होने की संभावना है। 5. डॉ. सी. एम. यादव ने प्राकृतिक खेती के लिए किन इनपुट्स को तैयार करने की विधि समझाई? उन्होंने किसानों को बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत और नीमास्त्र तैयार करने और उनके उपयोग की विधि समझाई। प्रेरणा और सबक इस कार्यक्रम से किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक सबक सामने आते हैं जो उन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ बना सकते हैं। • उन्नत तकनीकों का चयन: कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक मार्गदर्शन को अपनाकर किसान पारंपरिक खेती की जगह वैज्ञानिक तरीकों से अपनी आय को बढ़ा सकते हैं। • बीज उत्पादन में आत्मनिर्भरता: केवल बाजार पर निर्भर रहने के बजाय किसान खुद गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार कर सकते हैं, जिससे अन्य किसानों को भी लाभ होगा। • प्राकृतिक खेती का महत्व: रासायनिक खादों की जगह बीजामृत और जीवामृत का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता और फसलों की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-ke-kheton-men-lahalahaegi-munga-ki-mh-1142-kisma-kama-samaya-aura-kama-pani-men-bnpara-munaphe-ki-ummida-31555 TrendKia — Har trend, sabse pehle.