भीलवाड़ा के खेतों में तेजी से फैल रही गाजर घास, फसल उत्पादन 40 प्रतिशत तक घटने का मंडराया खतरा भीलवाड़ा में गाजर घास का प्रकोप बढ़ने से फसलों की पैदावार 40 प्रतिशत तक घटने का अंदेशा है। यह खरपतवार इंसानों में एलर्जी और पशुओं के स्वास्थ्य के साथ दूध की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रही है। भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण और कृषि इलाकों में गाजर घास का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिससे किसान काफी परेशान हैं। चटक चांदनी और सफेद टोपी के नाम से भी जानी जाने वाली यह विदेशी खरपतवार न केवल फसलों की पैदावार कम कर रही है, बल्कि मवेशियों और इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। खाली जमीनों, खेतों के किनारों और सड़कों के आसपास यह पौधा तेजी से अपने पैर पसार रहा है। 1955 में अमेरिका से भारत आई थी यह खरपतवार यह खतरनाक पौधा भारत का मूल निवासी नहीं है। वर्ष 1955 में जब अमेरिका से गेहूं का आयात किया गया था, उसी खेप के साथ इस खरपतवार के बीज भारत पहुंचे थे। इसके बाद से यह पौधा पूरे देश के अलग-अलग राज्यों में फैल गया। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान में देश का लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र इस घास की चपेट में आ चुका है। बीजों का तेजी से फैलाव और छोटा जीवन चक्र गाजर घास की सबसे बड़ी खासियत और समस्या इसका तेजी से होने वाला फैलाव है। इस पौधे का जीवन चक्र केवल तीन से चार महीने का होता है, लेकिन यह साल भर किसी भी मौसम में उगने की क्षमता रखता है। एक अकेला गाजर घास का पौधा लगभग 5 हजार से लेकर 25 हजार तक बेहद बारीक बीज पैदा करता है। ये बीज हवा के तेज झोंकों और बहते पानी के जरिए आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाते हैं। इसी वजह से यदि किसी एक हिस्से में यह खरपतवार उग आती है, तो बहुत जल्द आसपास के पूरे इलाके में फैल जाती है। फसलों की पैदावार में 40 प्रतिशत तक की गिरावट कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गाजर घास फसलों के उत्पादन पर बेहद बुरा असर डालती है। इस पौधे में सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नाम का एक जहरीला रसायन पाया जाता है। यह केमिकल आसपास उगने वाली मुख्य फसलों की ग्रोथ को रोक देता है और उनकी जड़ों व पत्तियों के विकास को बाधित करता है। जिन खेतों में इस खरपतवार का प्रकोप अत्यधिक हो जाता है, वहां फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की जाती है। इससे किसानों को हर साल बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। इंसानों और पशुधन की सेहत पर पड़ रहा बुरा असर यह खरपतवार केवल फसलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इंसानों और मवेशियों की सेहत को भी नुकसान पहुंचाती है। जो लोग लगातार इसके संपर्क में आते हैं, उन्हें त्वचा पर एलर्जी, दाने, तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि गाय, भैंस या अन्य पशु इसे चर लेते हैं, तो उनके पाचन तंत्र और स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। साथ ही दुधारू पशुओं के दूध का स्वाद कड़वा होने की शिकायत भी सामने आती है। रोकथाम के जरूरी उपाय और जैविक नियंत्रण गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने समय रहते कदम उठाने की सलाह दी है। इसे रोकने का सबसे असरदार तरीका यह है कि पौधे में फूल आने से पहले ही इसे जड़ से उखाड़कर नष्ट कर दिया जाए। पौधे को उखाड़ते समय किसानों व आम लोगों को हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क पहनना अनिवार्य है, ताकि इसके विषैले तत्वों से बचाव हो सके। उखाड़े गए पौधों का निस्तारण सुरक्षित तरीके से करना जरूरी है ताकि बीज दोबारा जमीन में न गिरें। इसके अलावा, कृषि विभाग जैविक नियंत्रण के तहत प्रभावित इलाकों में मैक्सिकन बीटल नामक मित्र कीट छोड़ने की सलाह देता है। यह कीट गाजर घास की पत्तियों को खाकर इसके विकास को रोक देता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इस पर काबू पाया जा सकता है। इसका आप पर असर गाजर घास के तेजी से फैलाव से फसल उत्पादन घटने, मवेशियों का दूध प्रभावित होने और लोगों में त्वचा तथा सांस से जुड़ी एलर्जी का जोखिम बढ़ गया है। • भारत में: देश के लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में गाजर घास का फैलाव कृषि अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाल रहा है। किसानों को समय रहते खरपतवार हटाने के लिए अतिरिक्त श्रम और संसाधनों की आवश्यकता होगी। • भीलवाड़ा में: जिले के गांवों और खेतों में इस खरपतवार के तेजी से बढ़ने से स्थानीय फसल सुरक्षा को चुनौती मिल रही है। क्षेत्र के किसानों को फूल आने से पहले ही पौधों को उखाड़कर नष्ट करने का अभियान चलाना होगा। • किसानों के लिए: भारी संक्रमण वाले खेतों में फसलों की पैदावार 40 प्रतिशत तक घट सकती है। इससे किसानों की उपज कम होगी और बाजार में बेचने के लिए कम अनाज उपलब्ध रहेगा। • पशुपालकों के लिए: मवेशियों द्वारा इस घास को चरने से उनके स्वास्थ्य में गिरावट आती है और दूध कड़वा हो जाता है। इससे डेयरी से जुड़ी कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। • आम नागरिकों के लिए: गाजर घास के संपर्क में आने से दाने, खुजली, बुखार और सांस की बीमारियां हो सकती हैं। खेतों या सड़कों के पास काम करते समय मास्क और दस्ताने पहनना जरूरी है। ऐसा क्यों हुआ गाजर घास का भारत में आगमन और इसका तेजी से फैलाव विदेशी गेहूं के आयात और पौधे की उच्च प्रजनन क्षमता का परिणाम है। 1955 में अमेरिका से आए बीजों के बाद यह खरपतवार पूरे देश के कृषि क्षेत्रों में फैल चुकी है। • विदेशी गेहूं का आयात: वर्ष 1955 में अमेरिका से मंगाए गए गेहूं के साथ गाजर घास के बीज भारत पहुंचे थे। उस समय उचित स्क्रीनिंग न होने के कारण यह विदेशी पौधा भारतीय मिट्टी में स्थापित हो गया। • अत्यधिक बीज उत्पादन: इस खरपतवार का एक पौधा 5 हजार से लेकर 25 हजार तक बेहद बारीक बीज पैदा करता है। इतनी बड़ी संख्या में बीजों के बनने से इसका फैलाव नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। • प्राकृतिक माध्यमों से प्रसार: गाजर घास के हलके बीज हवा के झोंकों और बहते पानी के जरिए आसानी से दूर-दूर तक यात्रा करते हैं। इससे खाली पड़े भूखंडों और खेतों में यह बहुत तेजी से कब्जा जमा लेता है। • विषाक्त रसायन की मौजूदगी: इस पौधे में मौजूद सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नामक केमिकल आसपास की फसलों की वृद्धि को रोकता है। इसके प्रभाव से अन्य पौधे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं और गाजर घास हावी हो जाती है। सवाल-जवाब 1. गाजर घास की पहचान कैसे की जाती है और इसके अन्य नाम क्या हैं? गाजर घास को स्थानीय भाषा में चटक चांदनी और सफेद टोपी भी कहा जाता है। यह सफेद फूलों वाली एक विदेशी खरपतवार है जो खेतों और खाली भूखंडों में तेजी से उगती है। 2. गाजर घास पहली बार भारत में कब और कैसे आई थी? यह खरपतवार वर्ष 1955 में अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ भारत पहुंची थी। वर्तमान में यह देश के लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी है। 3. गाजर घास से फसलों के उत्पादन पर कितना असर पड़ता है? इस पौधे में सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नामक विषैला रसायन होता है जो फसलों की बढ़वार रोकता है। अत्यधिक प्रकोप होने पर फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। 4. गाजर घास से इंसानों और पशुओं के स्वास्थ्य को क्या नुकसान है? इंसानों को त्वचा में एलर्जी, बुखार और अस्थमा जैसी सांस की समस्या हो सकती है। वहीं पशुओं के इसे खाने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है और दूध का स्वाद कड़वा हो जाता है। 5. गाजर घास को नष्ट करने के लिए क्या उपाय अपनाने चाहिए? इसे फूल आने से पहले ही दस्ताने और मास्क पहनकर जड़ से उखाड़ देना चाहिए। इसके अलावा, कृषि विभाग प्रभावित क्षेत्रों में मैक्सिकन बीटल कीट छोड़कर भी इसका जैविक नियंत्रण करता है। https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-ke-kheton-men-teji-se-phaila-rahi-gajara-ghasa-phasala-utpadana-40-pratishata-taka-ghatane-ka-mndaraya-khatara-30188 TrendKia — Har trend, sabse pehle.