# भीलवाड़ा के किसानों के लिए खास नुस्खा, सिर्फ दस पत्तियों से तैयार करें देसी अर्क और घट जाएगा खेती का खर्च

> रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च से परेशान किसानों के लिए दशपर्णी अर्क एक किफायती और जैविक विकल्प साबित हो सकता है। इसे घर पर ही नीम, धतूरा और आक जैसी दस प्रकार की पत्तियों, गोमूत्र और गोबर की मदद से आसानी से तैयार किया जाता है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-ke-kisano-ke-liye-khas-nuskha-sirf-das-pattiyon-se-taiyar-karein-desi-ark-aur-ghat-jaayega-kheti-ka-kharch-52251 · **Language:** Hindi
**Tags:** जैविक खेती, दशपर्णी अर्क, कृषि समाचार, किसान टिप्स, फसल सुरक्षा, कीटनाशक

खेती किसानी में रासायनिक उर्वरकों और महंगे कीटनाशकों पर लगातार बढ़ता खर्च अन्नदाताओं की जेब पर भारी पड़ रहा है, जिसके चलते अब जैविक तरीकों की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। इसी कड़ी में दशपर्णी अर्क किसानों के बीच एक बेहद उपयोगी और सस्ता देसी विकल्प बनकर उभर रहा है। इस अनोखे घोल को नीम, धतूरा और आक समेत कुल दस अलग-अलग प्रकार की पत्तियों के इस्तेमाल से बहुत कम लागत में सीधे खेत या घर पर ही तैयार किया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य फसलों को कीटों के प्रकोप से बचाना और बाजार में मिलने वाले महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर से अन्नदाताओं की निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना है। इस देसी विधि को सही तरीके से अपनाकर खेती को किफायती बनाया जा सकता है। दशपर्णी अर्क को बनाने के लिए मुख्य रूप से नीम, धतूरा, आक, करंज, सीताफल, अरंडी, पपीता, निर्गुंडी, तुलसी और गेंदा जैसी स्थानीय स्तर पर आसानी से मिल जाने वाली वनस्पतियों की पत्तियों का चयन किया जाता है। क्षेत्रीय उपलब्धता के आधार पर पत्तियों के इस संयोजन में थोड़ा बदलाव भी किया जा सकता है। इसके अलावा इस पारंपरिक और असरदार नुस्खे को तैयार करने में गोमूत्र, साफ पानी और थोड़ी मात्रा में गोबर का इस्तेमाल भी अनिवार्य रूप से किया जाता है।

## घर पर दशपर्णी अर्क तैयार करने की पूरी विधि
कृषि विज्ञान केंद्र के डॉक्टर सी एम यादव ने इस देसी घोल को बनाने की पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। सबसे पहले चरण में विभिन्न प्रकार की दस चुनिंदा पत्तियों को अच्छी तरह से इकट्ठा करके साफ कर लेना चाहिए और फिर उन्हें बारीक काट लेना होता है। इसके बाद एक बड़े आकार के प्लास्टिक के ड्रम या फिर किसी अन्य उपयुक्त बर्तन में इन सभी कटी हुई पत्तियों को डाल दिया जाता है। इस बर्तन के अंदर ही पानी, गोमूत्र और गोबर को डालकर एक गाढ़ा मिश्रण तैयार किया जाता है। जब सारी सामग्री बर्तन के अंदर अच्छी तरह से मिला दी जाती है, तब उस बर्तन को ऊपर से ढककर किसी सुरक्षित और छायादार स्थान पर रख दिया जाता है। इस मिश्रण को सड़ने और फर्मेंट होने की प्रक्रिया के दौरान नियमित अंतराल पर लकड़ी की डंडी की सहायता से लगातार हिलाते रहना जरूरी होता है, ताकि सभी तत्व आपस में भली-भांति घुल-मिल जाएं। पारंपरिक और प्रामाणिक विधि के अनुसार इस पूरे मिश्रण को लगभग 30 से 45 दिनों तक पूरी तरह सड़ने और किण्वित होने के लिए छोड़ दिया जाता है। तय समय सीमा पूरी होने के बाद इस तैयार मिश्रण को एक साफ सूती कपड़े की मदद से अच्छी तरह छान लिया जाता है ताकि अवशेष अलग हो जाएं और शुद्ध अर्क हाथ लग सके। इस तरह जो गाढ़ा अर्क बनकर तैयार होता है, उसे आवश्यकता के अनुसार साफ पानी में घोलकर फसलों के ऊपर छिड़काव के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस घोल की सही मात्रा हमेशा फसल के प्रकार, कीटों के प्रकोप और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही तय की जानी चाहिए।

## फसल सुरक्षा और लागत में कमी के अनूठे लाभ
डॉक्टर सी एम यादव ने आगे बताया कि दशपर्णी अर्क के निर्माण में जिन दस विभिन्न प्रकार की पत्तियों का उपयोग किया जाता है, उनमें तमाम तरह के प्राकृतिक और औषधीय तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये प्राकृतिक तत्व कुछ चुनिंदा कीटों को फसलों से दूर रखने और उनकी हानिकारक गतिविधियों को नियंत्रित करने में खासे मददगार साबित होते हैं। इससे किसानों को फसलों में कीट प्रबंधन के लिए एक अतिरिक्त और पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मिल जाता है, जो प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाता। खेत की अपनी ही मेड़ या आसपास आसानी से मिलने वाली सामग्रियों से इस जैविक घोल को तैयार करने पर बाजार से खरीदे जाने वाले रासायनिक उत्पादों की भारी-भरकम लागत से राहत मिलती है। अन्नदाताओं के लिए यह तकनीक विशेष तौर पर तब बेहद फायदेमंद साबित होती है जब वे खेती की कुल लागत को न्यूनतम स्तर पर लाने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के प्रयास में जुटे हों। हालांकि इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि दशपर्णी अर्क हर तरह के कीट या गंभीर बीमारी पर एक समान रूप से असरदार साबित नहीं होता है और इसे रासायनिक खाद या उर्वरक का कोई पूर्ण विकल्प कतई नहीं माना जाना चाहिए। फसलों पर इसका छिड़काव करने से पहले हमेशा थोड़े से हिस्से पर इसका परीक्षण जरूर कर लेना चाहिए, हाथों में सुरक्षा के लिए दस्ताने पहनने चाहिए और किसी भरोसेमंद कृषि विशेषज्ञ से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए।

## इसका आप पर असर
यह जैविक नुस्खा किसानों के लिए खेती की लागत को सीधे तौर पर कम करने का एक व्यावहारिक रास्ता तैयार करता है।

- **भारत में:** रासायनिक उत्पादों पर निर्भर रहने वाले किसानों को महंगे कीटनाशकों के विकल्प के रूप में कम खर्च में फसल सुरक्षा का एक नया साधन मिल जाता है। इससे खेती का कुल बजट नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
- **भीलवाड़ा में:** स्थानीय स्तर पर आसानी से मिलने वाली दस पत्तियों और गोमूत्र से घोल तैयार करने पर क्षेत्रीय किसानों को बाजार जाने और महंगे उत्पाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे छोटे किसानों की बचत सीधे तौर पर बढ़ जाती है।

## ऐसा क्यों हुआ
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते दामों के कारण खेती की बढ़ती लागत ने किसानों के सामने वित्तीय संकट पैदा कर दिया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों को पुनर्जीवित किया जा रहा है।

- **बढ़ता खर्च:** बाजार में मिलने वाले रासायनिक कीटनाशकों के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं, जिससे खेती का बजट बिगड़ जाता है।
- **स्थानीय उपलब्धता:** नीम, धतूरा और आक जैसी वनस्पतियां ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं, जिन्हें बिना किसी बड़े निवेश के एकत्र किया जा सकता है।
- **पारंपरिक ज्ञान:** पुरानी कृषि पद्धतियों में गोमूत्र और गोबर के साथ प्राकृतिक अर्क तैयार करने के नुस्खे आजमाए जाते रहे हैं, जो कीट प्रबंधन में असरदार माने जाते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. दशपर्णी अर्क क्या है?
यह नीम, धतूरा और आक समेत दस प्रकार की पत्तियों, गोमूत्र और गोबर से तैयार किया जाने वाला एक जैविक और देसी अर्क है।

### 2. इसे बनाने में कौन-कौन सी मुख्य पत्तियां काम आती हैं?
इसमें नीम, धतूरा, आक, करंज, सीताफल, अरंडी, पपीता, निर्गुंडी, तुलसी और गेंदा की पत्तियों का उपयोग किया जाता है।

### 3. घोल को तैयार होने में कितना समय लगता है?
पारंपरिक विधि के अनुसार इस मिश्रण को लगभग 30 से 45 दिन तक सड़ने और किण्वित होने के लिए रखा जाता है।

### 4. इस अर्क का उपयोग किस काम के लिए किया जाता है?
इसका उपयोग फसलों में कीटों के प्रबंधन के लिए और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने हेतु किया जाता है।

### 5. इस विधि की जानकारी किसने दी है?
इस विधि की जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र के डॉक्टर सी एम यादव ने दी है।

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