# भीलवाड़ा में गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल, चार पीढ़ियों से मिलकर रावण के पुतले बना रहे हैं हिंदू-मुस्लिम परिवार

> राजस्थान के भीलवाड़ा में दशहरा उत्सव आपसी भाईचारे की अनूठी कहानी कह रहा है, जहां राजेश कुमार गांछा और समद भाई शोरगर के परिवार चार पीढ़ियों से मिलकर रावण के पुतले तैयार कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-me-ganga-jamuni-tahjeeb-ki-anuthi-misal-char-pidhiyon-se-milkar-ravan-ke-putle-bana-rahe-hain-parivar-48750 · **Language:** Hindi
**Tags:** भीलवाड़ा, दशहरा, गंगा-जमुनी तहजीब, भाईचारा, राजेश कुमार गांछा, समद भाई शोरगर, रावण दहन

बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक माने जाने वाले विजय दशमी के पर्व पर राजस्थान के भीलवाड़ा से सांप्रदायिक सौहार्द की एक बेहद प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां का दशहरा महोत्सव केवल धार्मिक उल्लास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। शहर में पिछले चार दशकों से अधिक समय से दो अलग-अलग समुदायों के परिवार मिलकर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले तैयार करने में जुटे हुए हैं। इन परिवारों का यह जुड़ाव महज व्यावसायिक साझेदारी नहीं है, बल्कि आपसी विश्वास और अटूट स्नेह का एक ऐसा प्रतीक है जो समय के साथ और अधिक मजबूत होता गया है।

## चार दशकों से अधिक पुरानी अटूट साझेदारी
इस अनूठी परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हुए राजेश कुमार गांछा कहते हैं कि उनके पिता ग्यारसीलाल जी गांछा और उनके अजीज मित्र सुलेमान जी शोरगर ने संयुक्त रूप से इन पुतलों का निर्माण कार्य शुरू किया था। वे दोनों केवल व्यावसायिक रूप से जुड़े नहीं थे, बल्कि उनके बीच गहरी मित्रता थी जो जीवनभर कायम रही। हालांकि अब वे दोनों इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई भाईचारे की इस विरासत को उनकी संतानें पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही हैं। वर्तमान में राजेश कुमार गांछा और सुलेमान जी के सुपुत्र समद भाई शोरगर मिलकर इस काम को संभाल रहे हैं और दोनों परिवारों का यह सहयोग पिछले करीब 50 वर्षों से लगातार जारी है।

## चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है आपसी सहयोग की यह विरासत
समय बीतने के साथ ही इस साझा परंपरा की जड़ें और गहरी होती चली गई हैं और अब यह सिलसिला आगे बढ़कर चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। पुतला निर्माण कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें इस काम के दौरान कभी किसी प्रकार की बाधा या मतभेद का सामना नहीं करना पड़ा। दोनों ही परिवार हर साल आपसी समन्वय और सौहार्द के साथ मिलकर काम करते हैं, जिससे समाज में प्रेम और सहयोग का एक सकारात्मक संदेश जाता है। खास बात यह है कि इस पुश्तैनी काम में अब घर की नई पीढ़ी के युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और अपने बुजुर्गों की इस विरासत को सहेजने में पूरा योगदान दे रहे हैं।

## शहर के विभिन्न चौराहों और इलाकों में भेजे जाते हैं विशाल पुतले
भीलवाड़ा शहर के प्रमुख तेजाजी चौक पर हर साल विशेष आकर्षण का केंद्र रहने वाला 51 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया जाता है, जिसके साथ ही 35-35 फीट ऊंचे कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले भी बनाए जाते हैं जिनका दशहरे के दिन दहन किया जाता है। इसके अलावा भीलवाड़ा शहर के मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर जैसे तमाम अन्य इलाकों से भी पुतलों की भारी मांग रहती है, जिन्हें समय पर तैयार करके वहां भेजा जाता है। इन सभी चिन्हित स्थानों पर दो-दो पुतलों के सेट के साथ-साथ पारंपरिक रूप से अन्य जानवरों के पुतले भी बनाकर भेजे जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जुटते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. भीलवाड़ा में रावण के पुतले बनाने की परंपरा कितने समय से चली आ रही है?
भीलवाड़ा में दोनों परिवार पिछले करीब 50 वर्षों से मिलकर रावण के पुतले बना रहे हैं।

### 2. इस परंपरा को वर्तमान में कौन-कौन आगे बढ़ा रहा है?
वर्तमान में इस परंपरा को राजेश कुमार गांछा और समद भाई शोरगर मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।

### 3. तेजाजी चौक पर बनाए जाने वाले रावण के पुतले की ऊंचाई कितनी होती है?
तेजाजी चौक पर 51 फीट ऊंचा रावण का पुतला बनाया जाता है।

### 4. रावण के अलावा किन अन्य पुतलों का निर्माण किया जाता है?
रावण के साथ-साथ 35-35 फीट ऊंचे कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले भी बनाए जाते हैं।

### 5. भीलवाड़ा में पुतले किन-किन अन्य स्थानों पर भेजे जाते हैं?
पुतले मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर सहित अन्य स्थानों पर भेजे जाते हैं।

## प्रेरणा और सबक
यह अनूठी कहानी दिखाती है कि किस तरह आपसी सहयोग और पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाकर सामाजिक सौहार्द को मजबूत किया जा सकता है।

- **पीढ़ियों का सहयोग:** बुजुर्गों द्वारा शुरू किए गए अच्छे कार्यों और व्यवसायों को परिवार की अगली पीढ़ियों तक निरंतर आगे बढ़ाया जा सकता है।
- **सांप्रदायिक सौहार्द:** आपसी विश्वास और प्रेम के जरिए किसी भी प्रकार के सामाजिक या सांस्कृतिक अंतर को पाटा जा सकता है।
- **साझा विरासत:** पुश्तैनी हुनर और कला को सामूहिक प्रयासों से जीवित रखा जा सकता है।
- **निरंतरता:** बिना किसी रुकावट के दशकों तक एक ही काम में निष्ठा के साथ डटे रहना सफलता की कुंजी है।

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