भीलवाड़ा में गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल, चार पीढ़ियों से मिलकर रावण के पुतले बना रहे हैं दो परिवार राजस्थान के भीलवाड़ा में विजयादशमी के पावन पर्व पर हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी तस्वीर देखने को मिलती है, जहां चार पीढ़ियों से दो परिवार आपसी भाईचारे के साथ मिलकर रावण के पुतले तैयार कर रहे हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला विजयादशमी का पर्व राजस्थान के भीलवाड़ा में आपसी सौहार्द और भाईचारे का अनूठा संदेश दे रहा है। यहाँ राजेश कुमार गांछा और समद भाई शोरगर के परिवार पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से साथ मिलकर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के विशाल पुतले तैयार करते आ रहे हैं। इन दोनों परिवारों का यह सहयोग केवल एक व्यावसायिक साझेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की साझा संस्कृति और आपसी प्रेम की एक प्रेरणादायक बानगी पेश करता है। पारिवारिक मित्रता से शुरू हुई यह खास परंपरा इस अनूठी परंपरा की शुरुआत राजेश कुमार के पिता ग्यारसीलाल जी गांछा और उनके अजीज मित्र सुलेमान जी शोरगर ने मिलकर की थी। वे दोनों पुराने समय से ही संयुक्त रूप से पुतले बनाने का काम करते थे। हालांकि अब वे दोनों इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई इस मजबूत विरासत को उनकी अगली पीढ़ियाँ पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही हैं। राजेश कुमार बताते हैं कि उनके परिवार को इस पुतला निर्माण कार्य से जुड़े हुए करीब 50 साल हो चुके हैं, और वर्तमान में वह सुलेमान जी के सुपुत्र समद भाई शोरगर के साथ मिलकर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं। चौथी पीढ़ी तक सफलतापूर्वक पहुँची भाईचारे की यह डोर समय बीतने के साथ बुजुर्गों के साये भले ही उठ गए हों, लेकिन दोनों परिवारों के बीच का स्नेह और सहयोग आज भी पूरी तरह कायम है। यह पुरानी परंपरा अब अपनी चौथी पीढ़ी तक पहुँच चुकी है, और घर के नए युवा भी इस रचनात्मक कार्य में पूरी सक्रियता से हाथ बंटा रहे हैं। काम के दौरान दोनों परिवारों को कभी किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा है, और वे पूरी एकता के साथ हर साल इन पुतलों का निर्माण करते हैं। भीलवाड़ा के विभिन्न चौराहों के लिए तैयार होते हैं पुतले भीलवाड़ा शहर के प्रमुख तेजाजी चौक पर दहन के लिए 51 फीट ऊंचे रावण का पुतला बनाया जाता है, जिसके साथ 35-35 फीट ऊंचे मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले भी तैयार किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त शहर की मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी यहाँ से पुतले सप्लाई किए जाते हैं। इन तमाम स्थानों पर मुख्य पुतलों के साथ-साथ पारंपरिक रूप से जानवरों के पुतले भी बनाकर भेजे जाते हैं, जिनका दहन उत्सव के दौरान किया जाता है। सवाल-जवाब 1. भीलवाड़ा में रावण के पुतले बनाने का काम कौन से परिवार कर रहे हैं? भीलवाड़ा में राजेश कुमार गांछा और समद भाई शोरगर के परिवार मिलकर रावण के पुतले बना रहे हैं। 2. यह परंपरा कितने वर्षों से चली आ रही है? यह परंपरा लगभग 50 वर्षों से चली आ रही है और अब इसकी चौथी पीढ़ी तक पहुँच चुकी है। 3. तेजाजी चौक पर बनाए जाने वाले रावण के पुतले की ऊंचाई कितनी होती है? तेजाजी चौक पर 51 फीट ऊंचे रावण का पुतला बनाया जाता है। 4. रावण के अलावा किन अन्य पुतलों का निर्माण किया जाता है? रावण के साथ-साथ मेघनाथ, कुंभकरण और जानवरों के पुतले भी बनाए जाते हैं। 5. भीलवाड़ा में किन-किन स्थानों पर ये पुतले भेजे जाते हैं? यहाँ से पुतले मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर सहित कई अन्य स्थानों पर भेजे जाते हैं। प्रेरणा और सबक भीलवाड़ा के इन दो परिवारों की कहानी समाज को यह सिखाती है कि आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर कैसे पीढ़ियों तक सद्भावना को जिंदा रखा जा सकता है। इस प्रेरणादायक सफर से निम्नलिखित मुख्य सीख मिलती हैं: • आपसी विश्वास: पुश्तैनी साझेदारी और भरोसे को बनाए रखकर पीढ़ियों तक रिश्तों को मजबूत रखा जा सकता है। • साझा संस्कृति: पर्व और त्योहारों को मिलजुलकर मनाने से सामाजिक ताना-बाना और भाईचारा प्रगाढ़ होता है। • पारिवारिक विरासत: पुरखों द्वारा शुरू किए गए अच्छे कार्यों और कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी सामाजिक ताकत को बढ़ाता है। • सहयोग की भावना: किसी भी काम में आने वाली बाधाओं को आपसी प्रेम और सहयोग से आसानी से पार किया जा सकता है। https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-mein-ganga-jamuni-tahzeeb-ki-misaal-ravan-ke-putle-48751 TrendKia — Har trend, sabse pehle.