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  "title": "भीलवाड़ा में कपास पर गुलाबी सुंडी का हमला, कृषि विभाग ने जारी की बचाव की गाइडलाइन",
  "summary": "राजस्थान के भीलवाड़ा में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी का गंभीर खतरा मंडरा रहा है, जिससे बचाव के लिए कृषि विभाग ने किसानों को खेत की सफाई और जैविक छिड़काव के जरूरी उपाय बताए हैं।",
  "content": "राजस्थान के प्रमुख कपड़ा और कपास उत्पादक जिले भीलवाड़ा में इन दिनों कपास की खेती करने वाले किसान एक गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। खेतों में खड़ी फसल पर गुलाबी सुंडी यानी पिंक बोलवर्म का प्रकोप तेजी से फैल रहा है, जिससे पैदावार और कपास की गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। इस स्थिति को देखते हुए स्थानीय कृषि विभाग सक्रिय हो गया है और किसानों को फसल बचाने के लिए वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके अपनाने की सलाह दे रहा है ताकि समय रहते नुकसान को सीमित किया जा सके।\n\nभीलवाड़ा में कपास का बड़ा रकबा और मौजूदा संकट\nभीलवाड़ा जिला राष्ट्रीय स्तर पर कपड़ा उद्योग के लिए विख्यात है और यहां का कृषि क्षेत्र भी बड़े पैमाने पर कपास की पैदावार से जुड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर अनेक कॉटन और जिनिंग मिलें चलने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में आसानी होती है और बाजार में समय पर उचित दाम भी मिल जाते हैं। इसी आर्थिक लाभ के चलते जिले में किसान हर साल करीब 40 से 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई करते हैं। हालांकि, हाल के दिनों में गुलाबी सुंडी के फैलाव ने किसानों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं, क्योंकि यह कीट फसल की गुणवत्ता खराब करने के साथ कुल उत्पादन में सीधी गिरावट ला रहा है।\n\nलक्षण और फसल को पहुंचने वाला नुकसान\nकपास में लगने वाली गुलाबी सुंडी बेहद खतरनाक कीट मानी जाती है, क्योंकि इसका सीधा निशाना पौधे के डोडे यानी टिंडे होते हैं। कृषि विभाग के उद्यान विभाग के विशेषज्ञ डॉ. शंकर सिंह राठौड़ के मुताबिक, इस कीट का प्रभाव सामान्य तौर पर बुवाई के लगभग 60 से 70 दिन बाद साफ नजर आने लगता है। सुंडी या इल्ली डोडे के भीतर चुपचाप प्रवेश कर जाती है और अंदर मौजूद बीजों तथा रुई को खाकर खोखला कर देती है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखने के कारण किसान शुरुआती चरण में इसके हमले को भांप नहीं पाते हैं। जब तक लक्षण स्पष्ट होते हैं, तब तक फसल भीतर से काफी नष्ट हो चुकी होती है, इसलिए शुरुआत से ही सुरक्षात्मक कदम उठाना बेहद जरूरी होता है।\n\nखेत की साफ सफाई और अवशेषों का प्रबंधन\nगुलाबी सुंडी के जीवन चक्र को तोड़ने के लिए कृषि विभाग ने खेतों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की अपील की है। नए बुवाई चक्र में संक्रमण को रोकने के लिए पिछले मौसम के फसल अवशेषों का सही ढंग से निस्तारण करना पहली शर्त है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे बुवाई से पहले अपने खेतों और आसपास रखी सूखी बनेठियों यानी लकड़ियों को अच्छी तरह हिलाकर साफ कर लें तथा सूखे डोडों को पूरी तरह नष्ट कर दें।\n\n• खेतों की मेड़ों पर सूखी लकड़ियों और बनेठियों के बड़े ढेर कतई जमा न होने दें, क्योंकि इनमें सुंडी और उसके प्यूपा जीवित रहकर नई फसल पर धावा बोलते हैं।\n• जिनिंग इकाइयों और कपास प्रसंस्करण मिलों के आसपास बिखरे कचरे और फसल अवशेषों को भी समय पर समाप्त किया जाना जरूरी है, ताकि नए सीजन में कीटों का फैलाव रोका जा सके।\n\nनीम का अर्क और अनुशंसित दवाओं का छिड़काव\nकीट नियंत्रण को लेकर डॉ. शंकर सिंह राठौड़ ने छिड़काव का सही समय और तकनीक भी साझा की है। उन्होंने सुझाव दिया कि जब कपास की फसल 60 दिन की अवस्था पर पहुंच जाए, तब उस पर 5 प्रतिशत नीम सीड कर्नल एक्सट्रैक्ट (NSKE) का छिड़काव किया जाना चाहिए। यह एक प्राकृतिक और जैविक उपाय है, जो प्रारंभिक चरण में सुंडी को पनपने से रोकता है और फसल की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।\n\nइसके अलावा, फसल के 60 से 120 दिन की अवधि के दौरान रासायनिक दवाओं के अनियंत्रित उपयोग से बचने की चेतावनी दी गई है। विशेषज्ञों की सलाह के बिना किसी भी तरह के भारी या मनमाने रासायनिक मिश्रण का छिड़काव नहीं करना चाहिए। किसानों को केवल कृषि विभाग द्वारा स्वीकृत प्रामाणिक कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में ही उपयोग करना चाहिए, जिससे फसल की सुरक्षा सुनिश्चित होने के साथ मिट्टी और पर्यावरण पर भी कोई प्रतिकूल असर न पड़े।\n\nइसका आप पर असर\nगुलाबी सुंडी के प्रकोप से किसानों की उपज और आय सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है, जिससे समय पर बचाव कार्य करना अनिवार्य हो गया है।\n\n• भारत में: देश भर के कपास उत्पादकों को बुवाई चक्र में पुराने फसल अवशेष हटाने और शुरुआती अवस्था में जैविक सुरक्षा अपनाने की जरूरत है। प्रमाणित दवाओं के सही छिड़काव से फसल की बर्बादी रुकती है और मंडियों में रुई का बेहतर भाव मिलता है।\n• भीलवाड़ा में: जिले के करीब 40 से 50 हजार हेक्टेयर रकबे में खेती करने वाले किसानों को तुरंत अपने खेतों की सफाई करनी होगी। समय पर 5 प्रतिशत नीम अर्क का छिड़काव करने से स्थानीय जिनिंग मिलों को उच्च गुणवत्ता वाली कपास की आपूर्ति बनी रहेगी।\n• लागत और बचत: मनमाने भारी रसायनों के स्थान पर अनुशंसित मात्रा में दवाएं डालने से किसानों का गैर-जरूरी खर्च बचेगा। वैज्ञानिक देखरेख में कीटनाशकों का प्रयोग पर्यावरण और फसल दोनों की सेहत सुरक्षित रखेगा।\n• फसल प्रबंधन: बुवाई के 60 से 120 दिनों के बीच नियमित निगरानी रखने से डोडों के भीतर सुंडी के फैलाव को प्रारंभिक चरण में ही रोका जा सकता है। इससे कटाई के समय उत्पादन में आने वाली बड़ी गिरावट से आसानी से बचा जा सकेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकपास की फसल में गुलाबी सुंडी का प्रकोप पुराने अवशेषों में कीटों के पनपने और प्रारंभिक अवस्था में पहचान न हो पाने के कारण होता है।\n\n• सीधा कारण: यह कीट बुवाई के 60 से 70 दिन बाद डोडों के भीतर घुसकर रुई और बीजों को खाने लगता है, जिससे फसल अंदर से खोखली हो जाती है। बाहर कोई स्पष्ट लक्षण न दिखने की वजह से किसान शुरुआती अवस्था में इसके हमले को पहचान नहीं पाते हैं।\n• फैलने की परिस्थितियां: खेतों की मेड़ों और जिनिंग मिलों के पास पुरानी सूखी लकड़ियों और पुराने डोडों के ढेर पड़े रहने से कीटों को जीवित रहने का अनुकूल वातावरण मिलता है। अगली फसल की शुरुआत में यही अवशेष कीटों के नए संक्रमण का मुख्य केंद्र बन जाते हैं।\n• अनियंत्रित रसायनों का असर: बिना विशेषज्ञ सलाह के मनमाने या भारी रसायनों के छिड़काव से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा रहता है। इसी वजह से कृषि विभाग ने शुरुआती चरण में प्राकृतिक नीम अर्क और अनुशंसित दवाओं के इस्तेमाल पर जोर दिया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भीलवाड़ा में कपास की खेती का कुल रकबा कितना है?\nभीलवाड़ा जिले में किसान हर साल लगभग 40 से 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती करते हैं।\n\n2. फसल में गुलाबी सुंडी का हमला कब दिखाई देने लगता है?\nकपास की बुवाई के लगभग 60 से 70 दिन बीत जाने के बाद इस कीट का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दिखने लगता है।\n\n3. गुलाबी सुंडी कपास के पौधे को किस प्रकार क्षति पहुंचाती है?\nयह कीट कपास के डोडों के भीतर घुसकर अंदर मौजूद बीजों और रुई को खाकर खोखला कर देता है।\n\n4. फसल 60 दिन की होने पर कृषि विभाग ने किस छिड़काव की सिफारिश की है?\nविभाग ने फसल 60 दिन की होने पर 5 प्रतिशत नीम सीड कर्नल एक्सट्रैक्ट (NSKE) के छिड़काव की सलाह दी है।\n\n5. नए सीजन में सुंडी के फैलाव को रोकने के लिए क्या प्रबंध करना चाहिए?\nकिसानों को पुरानी सूखी लकड़ियों, बनेठियों और सूखे डोडों को अच्छी तरह झाड़कर नष्ट कर देना चाहिए और मेड़ों पर ढेर नहीं लगाने चाहिए।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-01",
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