भीलवाड़ा में पशुपालकों को मिली राहत, यूरिया उपचार से सूखे चारे में ही बढ़ेगी प्रोटीन की ताकत ग्रामीण इलाकों में चारे की किल्लत के बीच किसान वैज्ञानिक विधि से सूखे चारे को पौष्टिक बना सकते हैं। यूरिया के संतुलित घोल से नाइट्रोजन बढ़ाकर चारे का पोषण मूल्य सुधारा जा सकता है। गांवों में पशुपालन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अनगिनत किसान परिवारों की आजीविका का मजबूत आधार है। मवेशी स्वस्थ, हट्टे-कट्टे और ताकतवर बने रहें, यह हर पशुपालक की पहली प्राथमिकता होती है। जब मौसम या अन्य वजहों से हरे चारे की भारी कमी हो जाती है, तब मवेशियों के शरीर में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना एक गंभीर चुनौती बन जाता है। ऐसी स्थिति में किसान अक्सर बाजार में मिलने वाले महंगे वाणिज्यिक पशु आहार पर भारी रकम खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। हालांकि खेतों में उपलब्ध साधारण सूखे चारे को ही पोषण से भरपूर बनाकर इस अतिरिक्त खर्च को रोका जा सकता है। साधारण सूखे चारे में पोषण की कमी खेतों से मिलने वाले आम सूखे चारे में कुदरती रूप से प्रोटीन की मात्रा काफी कम पाई जाती है। जब पशु लगातार केवल सूखा चारा खाते हैं, तो उन्हें जरूरी शारीरिक विकास और ताकत के लिए पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इसी वजह से मवेशियों की सेहत कमजोर पड़ने लगती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार किया गया चारा इस कमी को दूर करने में बेहद कारगर सिद्ध होता है। विशेष रूप से तैयार यूरिया उपचार की मदद से सूखे भूसे या चारे की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है, जिससे पशुओं को जरूरी तत्वों की आपूर्ति आसानी से हो जाती है। यूरिया घोल तैयार करने का सटीक अनुपात पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. ए के सिंह के अनुसार सूखे चारे में प्रोटीन का स्तर कम होने पर यूरिया प्रक्रिया के जरिए आवश्यक नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाई जाती है। इस वैज्ञानिक विधि में सूखे चारे के कुल वजन का लगभग 4 प्रतिशत यूरिया इस्तेमाल किया जाता है। एक मानक प्रक्रिया के तहत 40 लीटर पानी लेकर उसमें 4 किलोग्राम यूरिया को पूरी तरह घोला जाता है। जब यह तरल मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब इसे सूखे चारे पर हर तरफ बराबर मात्रा में छिड़क दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का मूल उद्देश्य सूखे चारे में प्रोटीन रहित नाइट्रोजन के अनुपात को सुरक्षित रूप से बढ़ाना है। पाचन तंत्र में नाइट्रोजन कैसे बनता है प्रोटीन मवेशियों के पेट और पाचन तंत्र के भीतर कई तरह के सूक्ष्मजीव यानी माइक्रोब्स मौजूद रहते हैं। जब उपचारित चारा पशु के पेट में पहुंचता है, तो ये सूक्ष्मजीव चारे में मौजूद नाइट्रोजन का इस्तेमाल करके प्रोटीन संश्लेषण का काम तेज कर देते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया से चारे का संपूर्ण पोषण मूल्य काफी बढ़ जाता है और पशु का शरीर प्रोटीन का बेहतर उपयोग करने में सक्षम हो जाता है। इसके अतिरिक्त, रासायनिक प्रक्रिया के असर से कड़ा सूखा चारा काफी नरम और मुलायम हो जाता है। मुलायम होने की वजह से जानवर इसे बेहद चाव से खाते हैं और उनका हाजमा भी दुरुस्त रहता है। लापरवाही बन सकती है जानलेवा जोखिम यूरिया से चारे का उपचार करते समय अत्यधिक सावधानी, सही नाप-तौल और निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन करना अनिवार्य है। बिना किसी ठोस जानकारी अथवा गलत अनुपात में यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल पशुओं के स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। विषैले प्रभाव से बचाव के लिए पशुपालकों को अपनी मर्जी से कोई प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस विधि को आजमाने से पहले किसी योग्य पशु चिकित्सक अथवा मान्यता प्राप्त पशुपालन विशेषज्ञ से पूरी प्रक्रिया समझकर उनकी देखरेख में ही काम शुरू करना चाहिए। इसका आप पर असर इस वैज्ञानिक तरीके को अपनाकर किसान बाजार के महंगे पशु आहार पर होने वाले भारी खर्च से बच सकते हैं। • भारत में: सूखे चारे की कमी से जूझ रहे डेयरी किसान इस उपचार से अपने मवेशियों का पोषण स्तर सुरक्षित रख सकते हैं। इससे पशुओं के वजन और दूध उत्पादन क्षमता को बिना अतिरिक्त लागत के बनाए रखने में मदद मिलती है। • भीलवाड़ा में: स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चारे को पौष्टिक बनाकर किसान महंगे बाजारू उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। इसके लिए पशुपालकों को नजदीकी पशु चिकित्सालय से सही मात्रा और विधि की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। • सुरक्षा नियम: यूरिया की थोड़ी सी भी अतिरिक्त मात्रा मवेशी के लिए जहर बन सकती है। इसलिए किसान बिना डॉक्टर की लिखित सलाह या देखरेख के यह घोल कभी न बनाएं। • वित्तीय बचत: बाजार से महंगा बोरीबंद पशु आहार खरीदने की जगह घर के भूसे से ही काम चलाया जा सकता है। इससे छोटे और सीमांत पशुपालकों का मासिक चारा खर्च काफी घट जाता है। ऐसा क्यों हुआ सूखे चारे में प्राकृतिक प्रोटीन बेहद कम होने के कारण चारे की किल्लत में पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है, जिसे सुधारने के लिए यह तकनीक अपनाई जाती है। • सूखे चारे की कमी: फसल अवशेषों से प्राप्त सूखे भूसे में प्राकृतिक रूप से प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों की भारी कमी होती है। जब हरे चारे की अनुपलब्धता होती है, तो पशु केवल सूखा चारा खाकर कमजोर होने लगते हैं। • यूरिया की वैज्ञानिक भूमिका: यूरिया में प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन मौजूद होता है जो चारे के संपर्क में आकर पोषण मान बढ़ाता है। यह नाइट्रोजन पशु के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवों को प्रोटीन निर्माण के लिए जरूरी कच्चा माल देता है। • फाइबर का नरम होना: यूरिया के जलीय घोल का छिड़काव करने से कड़ा और रूखा चारा रासायनिक प्रभाव से मुलायम हो जाता है। इससे चारा सुपाच्य बनता है और जानवर उसे बिना छोड़े पूरा खा लेते हैं। सवाल-जवाब 1. सूखे चारे के उपचार में कितना यूरिया इस्तेमाल किया जाता है? इस प्रक्रिया में सूखे चारे के कुल वजन का लगभग 4 प्रतिशत यूरिया उपयोग में लाया जाता है। 2. यूरिया का घोल तैयार करने के लिए पानी और यूरिया का क्या अनुपात होना चाहिए? आमतौर पर 40 लीटर साफ पानी में 4 किलोग्राम यूरिया को अच्छी तरह घोला जाता है। 3. चारे में मौजूद नाइट्रोजन पशु के शरीर में प्रोटीन कैसे बनता है? पशु के पाचन तंत्र में मौजूद सूक्ष्मजीव इस नाइट्रोजन का उपयोग करके प्रोटीन का संश्लेषण करते हैं। 4. यूरिया उपचार के बाद सूखे चारे में क्या बदलाव आता है? इस प्रक्रिया से चारे का पोषण मूल्य बढ़ जाता है और वह नरम हो जाता है, जिससे पशु उसे आसानी से पचा लेते हैं। 5. क्या किसान बिना विशेषज्ञ सलाह के यह प्रक्रिया अपना सकते हैं? नहीं, सही जानकारी के बिना यूरिया का इस्तेमाल पशुओं के लिए जानलेवा हो सकता है, इसलिए पशु चिकित्सक की सलाह जरूरी है। https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-men-pashupalakon-ko-mili-rahata-yuriya-upachara-se-sukhe-chare-men-hi-barhegi-protina-ki-takata-46404 TrendKia — Har trend, sabse pehle.