बीकानेर के उष्ट्र अनुसंधान केंद्र को मिली बड़ी सफलता, स्टेम सेल से होगा थनेला रोग का इलाज बीकानेर के राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र को ऊंटों में होने वाले थनेला रोग के एंटीबायोटिक मुक्त उपचार के लिए एक अहम रिसर्च प्रोजेक्ट मिला है। इस शोध के सफल होने पर न केवल ऊंटपालकों को राहत मिलेगी बल्कि डेयरी सेक्टर को भी एक नया विकल्प मिलेगा। बीकानेर के ऊंटपालकों के लिए राहत देने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। राजस्थान के इस शहर में स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र यानी आईसीएआर-एनआरसीसी को एक बेहद अहम रिसर्च प्रोजेक्ट की मंजूरी मिल गई है। इस नई परियोजना का मुख्य उद्देश्य ऊंटों में दूध की मात्रा और उसकी गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करने वाली थनेला बीमारी यानी मास्टाइटिस का उपचार ढूंढना है। खास बात यह है कि इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए अब ऊंट के अपने ही स्टेम सेल का इस्तेमाल करने की दिशा में वैज्ञानिक अनुसंधान किया जाएगा। अनुसंधान नेशनल फाउंडेशन के तहत मिली मंजूरी राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ अनिल कुमार पूनिया ने इस प्रोजेक्ट के बारे में विस्तृत जानकारी साझा करते हुए बताया कि यह पूरा शोध कार्य नेशनल रिसर्च फाउंडेशन यानी एएनआरएफ के एडवांस्ड रिसर्च ग्रांट के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। इस परियोजना का मूल लक्ष्य ऊंट के स्टेम सेल की मदद से थनेला रोग का एक ऐसा इलाज तैयार करना है जिसमें किसी भी तरह की एंटीबायोटिक दवा की जरूरत न पड़े। यदि यह वैज्ञानिक प्रयोग सफल साबित होता है, तो इससे न केवल संक्रमण और सूजन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकेगा, बल्कि बीमारी के कारण खराब हो चुके थन ऊतकों का पुनर्निर्माण भी संभव हो पाएगा। इसके अलावा इससे ऊंट के दूध के उत्पादन और उसकी ओवरऑल क्वालिटी में भी उल्लेखनीय सुधार होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। ऊंटपालकों के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती राजस्थान जैसे शुष्क और रेगिस्तानी इलाकों में ऊंट का दूध सांस्कृतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोणों से बहुत अधिक महत्व रखता है। जब किसी ऊंट को थनेला रोग हो जाता है, तो उसके थनों में तेज सूजन और खतरनाक संक्रमण फैल जाता है। इस बीमारी की वजह से जहां एक तरफ दूध का उत्पादन भारी मात्रा में घट जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी गुणवत्ता भी गिर जाती है, जिससे स्थानीय ऊंटपालकों को भारी आर्थिक घाटे का सामना करना पड़ता है। मौजूदा समय में इस बीमारी से निपटने के लिए अमूमन एंटीबायोटिक दवाओं का ही सहारा लिया जाता है। लेकिन इन दवाओं के लगातार और लंबे समय तक इस्तेमाल करने की वजह से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते आने वाले समय में ये दवाएं पूरी तरह बेअसर भी हो सकती हैं। यही वजह है कि देश के वैज्ञानिक अब किसी ऐसे सुरक्षित और असरदार विकल्प की तलाश में जुटे हैं जो पूरी तरह एंटीबायोटिक मुक्त हो। संक्रमण, सूजन और ऊतकों की मरम्मत पर एक साथ काम इस नई परियोजना के तहत वैज्ञानिक ऊंट के अलग-अलग हिस्सों से मेसेनकाइमल स्टेम सेल निकालेंगे और उनकी विशेषताओं का बारीकी से अध्ययन करेंगे। इसके बाद प्रयोगशाला के भीतर ही इन कोशिकाओं की संक्रमण रोकने की ताकत, प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने की क्षमता और क्षतिग्रस्त ऊतकों को दोबारा बनाने की काबिलियत की कड़ी जांच की जाएगी। इन शुरुआती चरणों के पूरा होने के बाद सबसे पहले छोटे पशुओं पर और फिर सीधे ऊंटों पर प्रीक्लिनिकल परीक्षण किए जाएंगे। इस पूरे अध्ययन के दौरान पशुओं के खून और दूध के नमूनों की गहन प्रयोगशाला जांच होगी, जिसमें दूध के अंदर मौजूद बैक्टीरिया, सोमैटिक सेल काउंट, सूजन की स्थिति और थन के ऊतकों की सेहत का पूरा आकलन किया जाएगा। इसके अलावा स्टेम सेल को जानवर की नस में, सीधे थन के अंदर या फिर इन दोनों तरीकों से एक साथ देने की प्रभावशीलता को भी परखा जाएगा ताकि सबसे बेहतर परिणाम सामने आ सकें. गाय और भैंस पालकों के लिए भी खुलेंगे नए रास्ते इस प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध केवल ऊंटों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। यदि यह तकनीकी प्रयोग सफल होता है, तो इसके परिणाम आने वाले दिनों में देश की गायों और भैंसों में होने वाले थनेला रोग के इलाज के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे पूरे देश के डेयरी उद्योग को एंटीबायोटिक मुक्त इलाज का एक बिल्कुल नया और सुरक्षित विकल्प मिलने की मजबूत उम्मीद जग गई है। एनआरसीसी के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का दृढ़ विश्वास है कि पुनर्योजी चिकित्सा और आधुनिक स्टेम सेल तकनीक को पशुपालन के क्षेत्र से जोड़ने वाला यह कदम किसानों और ऊंटपालकों की आमदनी को बढ़ाने, पशुओं के स्वास्थ्य में व्यापक सुधार लाने और उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित दूध का उत्पादन सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसका आप पर असर यह शोध सफल होने पर पशुपालकों और डेयरी उद्योग को बड़ा लाभ मिलेगा। - भारत में: देश भर के पशुपालकों को एंटीबायोटिक मुक्त इलाज का विकल्प मिलेगा, जिससे दूध की गुणवत्ता सुधरेगी। - बीकानेर में: स्थानीय ऊंटपालकों को थनेला रोग से होने वाले आर्थिक नुकसान से राहत मिलेगी और आय बढ़ेगी। सवाल-जवाब 1. थनेला रोग के इलाज के लिए किस तकनीक का उपयोग किया जाएगा? इस रोग के उपचार के लिए ऊंट के स्टेम सेल का उपयोग करने पर शोध किया जाएगा। 2. इस रिसर्च प्रोजेक्ट को कौन सी संस्था संचालित कर रही है? भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर द्वारा यह प्रोजेक्ट किया जा रहा है। 3. इस अनुसंधान के लिए फंडिंग कहाँ से मिल रही है? यह शोध नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के एडवांस्ड रिसर्च ग्रांट के तहत किया जा रहा है। 4. इस शोध का मुख्य उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य थनेला रोग का एंटीबायोटिक मुक्त उपचार विकसित करना और दूध की गुणवत्ता सुधारना है। 5. क्या यह शोध अन्य पशुओं के लिए भी उपयोगी होगा? हाँ, वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके सफल परिणाम गाय और भैंसों के इलाज में भी काम आ सकते हैं। https://trendkia.com/rajasthan/bikaner-camel-research-center-gets-major-grant-for-stem-cell-mastitis-treatment-27624 TrendKia — Har trend, sabse pehle.