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  "type": "article",
  "title": "बीकानेर के ९१ साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर की अनूठी परंपरा, राजपरिवार भेजता है शाही पोशाक और कुंवारे लाते हैं पीले चावल",
  "summary": "बीकानेर में स्थित ९१ साल पुराने ऐतिहासिक महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के पावन पर्व पर शाही पोशाक अर्पित की जाती है और यहां कुंवारे युवक विशेष मनोकामना के साथ पीले चावल लेकर पहुंचते हैं।",
  "content": "बीकानेर के दाऊजी रोड पर स्थित प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि लोग धन और समृद्धि की देवी की आराधना करने पहुंचते हैं। लगभग ९१ साल पुराने इस ऐतिहासिक स्थल पर सालभर चहल-पहल रहती है, किंतु प्रकाश पर्व के समय इसका धार्मिक महत्व काफी अधिक बढ़ जाता है। शहर के मध्य में स्थित यह मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का मुख्य केंद्र है और यहां दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।\n\nवर्ष १९३२ में हुई थी स्थापना\nइस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की स्थापना वर्ष १९३२ में बीकानेर रियासत के तत्कालीन राजपंडित यमुना दत्त श्रीमाली द्वारा कराई गई थी। मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के पवित्र अनुष्ठान में बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह ने खुद शिरकत की थी और मुख्य यजमान की भूमिका निभाई थी। श्री महालक्ष्मी मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं पुजारी राजेंद्र कुमार श्रीमाली के मुताबिक, इसी शाही जुड़ाव के कारण इस प्राचीन मंदिर का इतिहास रियासतकाल से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।\n\nराजपरिवार की ओर से भेजी जाती है पोशाक\nइस मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां निभाई जाने वाली शाही परंपरा है, जिसके तहत बीकानेर के पूर्व राजपरिवार की तरफ से साल में दो बार मां महालक्ष्मी को विशेष पोशाक भेजी जाती है। पहली पोशाक दीपावली के शुभ अवसर पर आती है, जबकि दूसरी पोशाक श्राद्ध पक्ष की अष्टमी के दिन अर्पित की जाती है। इन खास मौकों पर देवी को यही विशेष पोशाक पहनाई जाती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में इकट्ठा होते हैं।\n\nहाथियों की सूंड और कलश वाली अद्भुत मूर्ति\nमंदिर के भीतर स्थापित माता महालक्ष्मी की अलौकिक प्रतिमा भक्तों के आकर्षण का मुख्य बिंदु है, जहां देवी एक खिले हुए कमल के फूल पर विराजमान मुद्रा में नजर आती हैं। इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि इसमें हाथियों की सूंड में कलश दर्शाए गए हैं, जो सनातन संस्कृति में सुख, वैभव, समृद्धि और धन का प्रतीक माने जाते हैं। यहां आने वाले भक्त परिवार की खुशहाली और उन्नति की कामना करते हैं।\n\nदीपावली पर पूरे दिन खुले रहते हैं कपाट\nसामान्य दिनों में इस मंदिर में रोजाना लगभग २०० से ३०० श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि शुक्रवार के दिन यह आंकड़ा हजारों तक पहुंच जाता है। दीपावली के खास मौके पर सुबह से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहता है और भारी भीड़ को नियंत्रित करने तथा दर्शन सुलभ बनाने के लिए मंदिर के पट पूरे दिन और रात खुले रखे जाते हैं।\n\nकुंवारे युवकों की अनूठी मनोकामना\nइस प्राचीन मंदिर से एक बेहद दिलचस्प और अनूठी लोक मान्यता जुड़ी हुई है, जिसके तहत विवाह योग्य कुंवारे युवक विशेष अवसरों पर पीले चावल लेकर माता के दरबार में अपनी अर्जी लगाते हैं। वे मां महालक्ष्मी से अपने लिए एक सुयोग्य जीवनसंगिनी यानी गृह लक्ष्मी की कृपा पाने की प्रार्थना करते हैं। बीकानेर के निवासियों के लिए यह मंदिर श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवित प्रतीक बना हुआ है।\n\nइसका आप पर असर\nइस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी परंपराओं का स्थानीय नागरिकों और दर्शनार्थियों पर सीधा असर पड़ता है।\n\n• बीकानेर में: स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं को दीपावली के दिन मंदिर में पूरे दिन निर्बाध दर्शन की सुविधा मिलती है। दर्शनार्थियों को भारी भीड़ के दौरान अपनी आस्था और पूजा के लिए विशेष समय प्रबंधन करना पड़ता है।\n• भारत में: देश भर के प्राचीन धार्मिक स्थलों पर त्योहारी सीजन के दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ से स्थानीय प्रशासन और प्रबंधन प्रणालियों को अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने होते हैं। इससे ऐतिहासिक मंदिरों में सांस्कृतिक पर्यटन और धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह प्राचीन मंदिर रियासतकालीन परंपराओं और स्थानीय लोक मान्यताओं के कारण अपनी अनूठी पहचान बनाए हुए है।\n\n• ऐतिहासिक जुड़ाव: वर्ष १९३२ में बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह द्वारा प्राण प्रतिष्ठा में भाग लेने के कारण इस मंदिर का राजपरिवार से गहरा संबंध स्थापित हुआ था।\n• शाही परंपराएं: पूर्व राजपरिवार द्वारा हर साल दीपावली और श्राद्ध पक्ष की अष्टमी पर विशेष पोशाक भेजने की परंपरा रियासतकाल से आज तक पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है।\n• लोक मान्यताएं: स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण विवाह योग्य युवाओं द्वारा पीले चावल चढ़ाने की परंपरा इस मंदिर के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. श्री महालक्ष्मी मंदिर बीकानेर में कहां स्थित है?\nयह प्राचीन मंदिर बीकानेर के दाऊजी रोड पर स्थित है।\n\n2. इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना कब हुई थी?\nइस मंदिर की स्थापना वर्ष १९३२ में बीकानेर रियासत के राजपंडित यमुना दत्त श्रीमाली द्वारा की गई थी।\n\n3. मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय कौन उपस्थित थे?\nबीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य यजमान के रूप में भाग लिया था।\n\n4. राजपरिवार द्वारा मंदिर में कितनी बार पोशाक भेजी जाती है?\nराजपरिवार की तरफ से साल में दो बार, यानी दीपावली और श्राद्ध पक्ष की अष्टमी पर विशेष पोशाक भेजी जाती है।\n\n5. दीपावली के दिन मंदिर के कपाट कब तक खुले रहते हैं?\nदीपावली के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर के पट सुबह तड़के से लेकर देर रात तक पूरे दिन खुले रहते हैं।\n\n6. कुंवारे युवक मंदिर में क्या अर्पित करने आते हैं?\nविवाह योग्य कुंवारे युवक सुयोग्य जीवनसंगिनी की कामना के लिए पीले चावल लेकर मंदिर में आते हैं।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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