बीकानेर के दिव्यांग बच्चों की कला का कमाल, दिवाली के लिए रंगे 12 हजार दीये, गुजरात और कोलकाता से मिले ऑर्डर बीकानेर के एक संस्थान में पढ़ने वाले मूकबधिर बच्चे अपनी लगन से साधारण दीयों को आकर्षक रूप दे रहे हैं। अब तक 12 हजार दीये रंगे जा चुके हैं और बिक्री से होने वाली आय इन्हीं बच्चों के कल्याण में इस्तेमाल होगी। त्योहारों के मौसम में जब पूरा देश रोशनी की तैयारी में जुटता है, तब बीकानेर के कुछ विशेष बच्चे अपनी रचनात्मकता और कौशल से इस पर्व को और अधिक अर्थपूर्ण बना रहे हैं। गंगाशहर इलाके की चौधरी कॉलोनी में स्थित दिव्यांग सेवा संस्थान के मूकबधिर बच्चों ने इस बार मिट्टी के दीपकों को अपनी कल्पना के रंगों से सजाने का बीड़ा उठाया है। बोल और सुन न पाने के बावजूद इन बच्चों की कलात्मक दृष्टि इतनी समृद्ध है कि साधारण मिट्टी के दीये भी अब बेहद सुंदर और नक्काशीदार कलाकृतियों में बदल चुके हैं। प्रतिदिन पढ़ाई के बाद कला साधना में जुटते हैं बच्चे संस्थान में कार्यरत शिक्षक कलवंत कुमार ने बताया कि इस केंद्र में वर्तमान में लगभग 60 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन विद्यार्थियों में से 15 बच्चे संस्थान के ही छात्रावास परिसर में रहते हैं, जबकि शेष 45 बच्चे बीकानेर शहर के अलग-अलग मोहल्लों से हर दिन यहां पढ़ने पहुंचते हैं। संस्थान का पाठ्यक्रम केवल पारंपरिक किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की व्यक्तिगत रुचि और कौशल के अनुसार उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है। इसी पहल के अंतर्गत करीब एक महीने पहले बच्चों ने मिट्टी के दीयों को रंगने और सजाने का काम अपने हाथ में लिया था। अपनी नियमित कक्षाओं और पढ़ाई को पूरा करने के बाद ये बच्चे प्रतिदिन दो से तीन घंटे इस काम में लगाते हैं। बच्चे दीयों पर केवल एक जैसा रंग नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी पसंद और कल्पना के अनुसार अलग-अलग रंगों के संयोजन, बारीक बॉर्डर और पारंपरिक डिजाइन उकेरते हैं। यही वजह है कि बच्चों के हाथों से निकला प्रत्येक दीपक एक अनोखी और अलग पहचान लेकर सामने आता है। संस्थान परिसर में दीयों को तैयार करने का यह सिलसिला लगातार जारी है। एक महीने के भीतर तैयार किए 12 हजार कलात्मक दीपक संस्थान के अनुसार बच्चों ने बीते एक माह के दौरान अपने हाथों से करीब 12 हजार दीयों को रंगकर तैयार कर दिया है। बच्चों की बनाई इन कलाकृतियों को स्थानीय स्तर पर समाज के लोगों की ओर से काफी सराहना मिली है और कई लोगों ने इन्हें खरीदा भी है। स्थानीय स्तर पर पसंद किए जाने के साथ-साथ अब इन दीपकों की मांग अन्य राज्यों तक भी पहुंच चुकी है। हाल ही में गुजरात और कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों से भी इन दीपकों के ऑर्डर संस्थान को प्राप्त हुए हैं। दूरदराज के क्षेत्रों से मांग आने के कारण बच्चों का आत्मविश्वास और उत्साह कई गुना बढ़ गया है। अब बच्चे और अधिक लगन के साथ दीयों को सजाने के काम में जुटे हुए हैं, ताकि त्योहार से पहले ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर पूरे किए जा सकें और लोगों के घरों तक इन दीपकों की रोशनी पहुंच सके। दीयों की बिक्री से संवरेगा बच्चों का भविष्य इस संस्थान की स्थापना वर्ष 2016 में की गई थी और तब से यह केंद्र विशेष बच्चों के समग्र विकास के लिए काम कर रहा है। कलवंत कुमार ने स्पष्ट किया कि केंद्र का प्राथमिक लक्ष्य बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं है, बल्कि उन्हें स्वावलंबी बनाकर समाज में सम्मानपूर्वक जीने का हौसला देना है। मिट्टी के दीयों को सजाने की यह परियोजना भी बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की इसी व्यापक सोच का एक हिस्सा है। दीयों की बिक्री से जो भी धनराशि एकत्र होगी, वह पूरी तरह से संस्थान के मूकबधिर बच्चों के कल्याण, उनकी सुविधाओं और शिक्षा पर ही खर्च की जाएगी। इस तरह बच्चों के हाथों से सजे ये दीपक न केवल लोगों के घरों के आंगनों को रोशन करेंगे, बल्कि स्वयं इन बच्चों के जीवन और भविष्य को भी नई रोशनी और संबल प्रदान करेंगे। इसका आप पर असर यह खबर दर्शाती है कि सामाजिक सहभागिता और हस्तनिर्मित उत्पादों को बढ़ावा देकर विशेष बच्चों के भविष्य को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। • भारत में: त्योहारी खरीदारी के दौरान बड़े ब्रांड्स के बजाय विशेष बच्चों और स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को चुनकर आम नागरिक सामाजिक विकास में सीधा योगदान दे सकते हैं। इससे जरूरतमंद और हुनरमंद बच्चों की संस्थाओं को आर्थिक मजबूती मिलती है। • बीकानेर में: स्थानीय निवासी सीधे गंगाशहर स्थित दिव्यांग सेवा संस्थान पहुंचकर बच्चों द्वारा तैयार इन कलात्मक दीपकों को खरीद सकते हैं। इससे बच्चों का मनोबल बढ़ेगा और त्योहार की खुशियां उन तक भी पहुंचेगी। • उपभोक्ताओं के लिए: घर की सजावट के लिए साधारण दीयों की तुलना में हाथ से रंगे आकर्षक और व्यक्तिगत डिजाइन वाले दीये उपलब्ध हो रहे हैं। इन्हें खरीदने से त्योहारी सजावट बेहतर होगी और दिया गया धन सीधे बच्चों की शिक्षा और देखरेख में जाएगा। • विशेष बच्चों के अभिभावकों के लिए: यह पहल दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन मिलने पर विशेष बच्चे भी अपनी प्रतिभा से स्वावलंबी बन सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को ऐसी कौशल विकास संस्थाओं से जोड़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ संस्थान में बच्चों द्वारा बड़े पैमाने पर दीपक तैयार करने का मुख्य कारण दीपावली के अवसर पर उनके हुनर को निखारना और संस्था को आत्मनिर्भर बनाना है। • कौशल विकास की योजना: संस्थान का उद्देश्य बच्चों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर व्यावहारिक हुनर सिखाना है। त्योहार के अवसर पर दीयों की रंगाई को एक रचनात्मक गतिविधि और व्यावसायिक प्रशिक्षण के तौर पर शुरू किया गया। • स्वावलंबन की जरूरत: वर्ष 2016 से संचालित इस केंद्र में मूकबधिर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने की आवश्यकता रहती है। दीयों की बिक्री से मिलने वाली राशि सीधे बच्चों की देखभाल पर खर्च करने का निर्णय लिया गया। • गुणवत्ता और कलात्मकता: बच्चों ने सामान्य रंगाई के बजाय दीयों पर बारीक और आकर्षक डिजाइन तैयार किए। इसी उच्च कलात्मक गुणवत्ता के कारण स्थानीय बिक्री के बाद गुजरात और कोलकाता से भी थोक ऑर्डर मिलने संभव हुए। सवाल-जवाब 1. यह संस्थान कहां स्थित है और इसका क्या नाम है? यह बीकानेर के गंगाशहर स्थित चौधरी कॉलोनी में है और इसका नाम दिव्यांग सेवा संस्थान है। 2. संस्थान में कितने बच्चे पढ़ते हैं और कितने हॉस्टल में रहते हैं? संस्थान में कुल 60 बच्चे पढ़ते हैं, जिनमें से 15 बच्चे हॉस्टल में रहते हैं और बाकी रोजाना आते हैं। 3. बच्चों ने अब तक कितने दीपक तैयार किए हैं? बच्चों ने पिछले एक महीने की मेहनत से करीब 12 हजार दीयों को रंगकर तैयार किया है। 4. बच्चे पढ़ाई के अलावा रोज कितना समय इस काम में लगाते हैं? बच्चे अपनी नियमित पढ़ाई पूरी करने के बाद हर दिन दो से तीन घंटे दीयों को रंगने में लगाते हैं। 5. बीकानेर के बाहर किन जगहों से दीपकों के ऑर्डर मिले हैं? बच्चों द्वारा तैयार दीपकों के लिए गुजरात और कोलकाता से ऑर्डर मिले हैं। 6. दीपक बेचने से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल कैसे होगा? बिक्री से होने वाली पूरी आय को संस्थान में रहने और पढ़ने वाले मूकबधिर बच्चों की शिक्षा और कल्याण पर खर्च किया जाएगा। 7. इस संस्थान की स्थापना कब हुई थी? इस संस्थान की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी। प्रेरणा और सबक शारीरिक सीमाओं के बावजूद बीकानेर के इन बच्चों ने यह सिद्ध किया है कि सच्ची लगन और सही मार्गदर्शन से कोई भी बाधा पार की जा सकती है। • कला अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है: बोलने और सुनने में असमर्थ होने पर भी बच्चों ने रंगों के माध्यम से अपनी आंतरिक भावनाओं और प्रतिभा को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया। • परिश्रम से आत्मनिर्भरता: पढ़ाई के साथ रोजाना दो से तीन घंटे मेहनत करके बच्चों ने 12 हजार दीये तैयार किए, जो यह सिखाता है कि नियमित अभ्यास से बड़ा लक्ष्य हासिल हो सकता है। • सीमाओं से परे पहचान: स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ छोटा सा प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर गुजरात और कोलकाता तक पहुंचा, जो साबित करता है कि गुणवत्ता किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। • सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल: शिक्षक और संस्थान का समर्पण दर्शाता है कि वंचित वर्ग को अवसर दिए जाएं तो वे समाज का सम्मानजनक हिस्सा बन सकते हैं। 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