बीकानेर में अनूठी मिसाल, 19 साल से रामलीला में भगवान राम बन रहे हैं मोहसिन खान राजस्थान के बीकानेर में मोहसिन खान पिछले 19 वर्षों से रामलीला के मंच पर भगवान राम का किरदार निभा रहे हैं। यह आयोजन शहर की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की एक बेहतरीन मिसाल पेश कर रहा है। राजस्थान के बीकानेर में धर्म की तमाम सीमाओं को पार करते हुए कौमी एकता की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। यहां मजहब की दीवारों को दरकिनार करते हुए मोहसिन खान पिछले 19 वर्षों से रामलीला के मंच पर भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र को जीवंत कर रहे हैं। न केवल वे भगवान राम का किरदार निभाते हैं, बल्कि इस पूरी रामलीला का निर्देशन भी संभालते हैं और भगवान राम के त्याग, करुणा और मर्यादा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाते हैं। शहर में नवरात्रि के पावन अवसर पर कई जगहों पर रामलीला का मंचन किया जा रहा है, लेकिन नेताजी सुभाष कला मंडल द्वारा आयोजित की जाने वाली यह रामलीला अपने सामाजिक संदेश के कारण बेहद खास मानी जाती है। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आपसी प्रेम और सामाजिक सद्भाव का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। मोहसिन खान इस सांस्कृतिक परंपरा से लंबे समय से पूरी निष्ठा और लगन के साथ जुड़े हुए हैं। कला नहीं मानती धर्म और मजहब की कोई दीवार मोहसिन खान का स्पष्ट मानना है कि कला को कभी भी धर्म और मजहब के दायरे में बांधकर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार कला का मुख्य उद्देश्य हमेशा से लोगों को आपस में जोड़ना और समाज में इंसानियत का पैगाम देना रहा है। उनका यह भी कहना है कि इंसानियत ही दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है और ऊपरवाला सब देखता है। इतने लंबे वर्षों तक रामलीला से जुड़े रहने के सफर में उन्हें कभी किसी तरह की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। उनके लिए मंच पर भगवान राम के आदर्शों को उतारना मानवीय मूल्यों को और अधिक मजबूत करने का जरिया है। इस अनूठी रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हिंदू और मुस्लिम समेत विभिन्न धर्मों के 80 से अधिक कलाकार और सहयोगी पूरी तन्मयता से हिस्सा लेते हैं। ये सभी लोग बिना किसी पारिश्रमिक के पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से इस आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहते हैं। इन सभी का एकमात्र उद्देश्य भगवान श्रीराम के जीवन आदर्शों को लोगों तक पहुंचाना और शहर की साझा संस्कृति को बचाए रखना है। डिजिटल युग में पारंपरिक संस्कृति को सहेजने की चुनौती आज के इस आधुनिक और डिजिटल दौर में युवा पीढ़ी मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में अधिक व्यस्त नजर आती है। ऐसे समय में पारंपरिक आयोजनों में दर्शकों की उपस्थिति बनाए रखना और रामलीला के मंचन के लिए जरूरी आर्थिक संसाधन जुटाना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसके बावजूद तमाम कलाकार अपनी इस पुरानी परंपरा को लगातार आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं। उनका मुख्य प्रयास यही है कि आने वाली पीढ़ियां भी देश की समृद्ध संस्कृति, पौराणिक कथाओं और सामाजिक एकता के महत्व को गहराई से समझ सकें। भगवान श्रीराम देश के करोड़ों लोगों की आस्था के मुख्य केंद्र हैं और उनका पूरा जीवन मर्यादा, त्याग और कर्तव्य का संदेश देता है। बीकानेर की यह रामलीला साबित करती है कि आस्था और कला की कोई भौगोलिक या धार्मिक सीमा नहीं होती है। जब किसी आयोजन का मुख्य उद्देश्य इंसानियत का संदेश देना हो, तो धर्म की तमाम दीवारें खुद-ब-खुद छोटी हो जाती हैं। यही वजह है कि मोहसिन खान और उनकी पूरी टीम का यह प्रयास शहर की गंगा-जमुनी तहजीब को और अधिक मजबूत कर रहा है। सवाल-जवाब 1. मोहसिन खान कितने वर्षों से रामलीला से जुड़े हैं? मोहसिन खान पिछले 19 वर्षों से रामलीला के मंच से जुड़े हुए हैं। 2. बीकानेर में इस रामलीला का आयोजन कौन सी संस्था करती है? इस रामलीला का आयोजन नेताजी सुभाष कला मंडल की ओर से किया जाता है। 3. इस रामलीला में कितने कलाकार और सहयोगी हिस्सा लेते हैं? इस रामलीला में हिंदू और मुस्लिम समेत विभिन्न धर्मों के 80 से अधिक छोटे-बड़े कलाकार और सहयोगी जुड़े हुए हैं। 4. कलाकार रामलीला के आयोजन के लिए कितना पारिश्रमिक लेते हैं? सभी कलाकार बिना किसी पारिश्रमिक के पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से इस आयोजन में अपना योगदान देते हैं। प्रेरणा और सबक मोहसिन खान का यह सफर उन लोगों के लिए एक बड़ी सीख है जो कला और संस्कृति को धर्म की सीमाओं में बांधते हैं। उनके जीवन और इस आयोजन से कई प्रेरणादायक बातें सीखी जा सकती हैं: • निसस्वार्थ भाव: इस आयोजन से जुड़े 80 से अधिक कलाकार बिना किसी पारिश्रमिक के काम करते हैं, जो यह सिखाता है कि समाज सेवा और संस्कृति के प्रसार में लगन सबसे ऊपर होती है। • साझा संस्कृति: धर्म की दीवारों को पार करते हुए मिलकर काम करना आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है। • परंपराओं का संरक्षण: डिजिटल युग के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक जड़ों से जुड़े रहकर उन्हें जीवित रखना संभव है। • कला की कोई सीमा नहीं: कला हमेशा लोगों को जोड़ने का काम करती है और मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है। https://trendkia.com/rajasthan/bikaner-mein-anokhi-misal-19-saal-se-ramlila-mein-bhagwan-ram-ban-rahe-hain-mohsin-khan-48728 TrendKia — Har trend, sabse pehle.