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  "type": "article",
  "title": "बीकानेर में मुस्लिम महिलाएं बुन रहीं आस्था का धागा, गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल",
  "summary": "बीकानेर में कृष्णा खत्री द्वारा संचालित मौली निर्माण का कारोबार धार्मिक सौहार्द और महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम महिलाएं मिलकर रोजाना 400 किलो मौली तैयार करती हैं जो देश के कई राज्यों में पहुँचती है।",
  "content": "सनातन परंपरा में कलाई पर बाँधे जाने वाले पवित्र धागे यानी मौली या कलावा का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, अनुष्ठान या दीपावली जैसे पर्वों की शुरुआत बिना मौली के अधूरी मानी जाती है। हालांकि बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह पवित्र धागा किन कठिन चरणों से गुजरकर आमजन तक पहुँचता है और इसे बनाने में कितनी मेहनत लगती है। राजस्थान के बीकानेर जिले में संचालित मौली निर्माण का यह कार्य धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव और महिला उद्यमिता की एक बेहतरीन दास्तान बयान कर रहा है।\n\n \n\nदो दशक पुराना सफर और छोटे स्तर से शुरुआत\n\nबीकानेर की उद्यमी कृष्णा खत्री पिछले करीब 20 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने इस काम की शुरुआत मात्र 10 हजार रुपए की छोटी सी पूँजी के साथ की थी। उनके परिवार के मुताबिक, उनके ससुर ने सबसे पहले इस काम को बहुत छोटे पैमाने पर शुरू किया था, लेकिन कच्चे माल की नियमित आपूर्ति न मिलने के कारण इस कारोबार को कई बार बंद करना पड़ा था। इसके बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों और इस काम में छिपी संभावनाओं को समझते हुए कृष्णा खत्री ने वर्ष 2011 में इसे बड़े पैमाने पर दोबारा शुरू किया। कड़ी मेहनत और अनुभव के बलबूते आज यह कारोबार काफी फैल चुका है और बीकानेर की बनी यह मौली देश के तमाम राज्यों के बाजारों तक अपनी पहुँच बना चुकी है।\n\n \n\nएकजुट होकर काम करती हैं हिंदू और मुस्लिम महिलाएँ\n\nइस कारोबार की सबसे अनूठी और सुंदर बात यह है कि इसमें जुड़ी महिला कामगारों में मुस्लिम समाज की महिलाएँ भी शामिल हैं। यानी जिस पवित्र और धार्मिक धागे को हिंदू परिवार पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनी कलाई पर धारण करते हैं, उसे आकार देने में हिंदू और मुस्लिम महिलाएँ मिलकर अपना योगदान दे रही हैं। यह पहल देश की गंगा-जमुनी तहजीब की एक जीवंत मिसाल पेश करती है, जहाँ धर्म और आस्था से ऊपर उठकर आजीविका और आपसी सहयोग का सुंदर ताना-बाना बुना गया है।\n\n \n\nमौली तैयार होने की लंबी और दिलचस्प प्रक्रिया\n\nमौली बनाने की पूरी प्रक्रिया काफी लंबी और दिलचस्प होती है, जिसे पूरा होने में करीब 8 से 10 दिन का समय लग जाता है। सबसे पहले कच्चे धागे से उसकी लच्छियाँ तैयार की जाती हैं। इसके बाद धागे की रंगाई यानी डाइंग का काम किया जाता है। रंगाई के पश्चात इस धागे को लगभग दो दिनों तक धूप में पूरी तरह सुखाया जाता है। जब धागा पूरी तरह सूख जाता है, तब मशीनों की सहायता से इसकी गोलियाँ बनाई जाती हैं। इसके बाद मौली के गेड़े तैयार किए जाते हैं जिन पर उचित लेबल लगाए जाते हैं और अंत में बेहतरीन पैकेजिंग के बाद इसे बाजार में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है। इस पूरी निर्माण श्रृंखला में लगभग दस अलग-अलग लोगों के हाथों से धागा गुजरता है।\n\n \n\nउत्पादन, कीमत और मासिक आमदनी का गणित\n\nबेहतरीन गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इस कार्य में उच्च कोटि के कच्चे धागे और रंगों का प्रयोग किया जाता है, जिसके लिए धागा बाहर से मँगवाया जाता है। वर्तमान में यहाँ रोजाना लगभग 400 किलो मौली तैयार की जाती है। बाजार में यह तैयार मौली करीब 280 रुपए प्रति किलो के भाव से बेची जाती है। ग्राहकों की अलग-अलग माँग और जरूरतों के हिसाब से इसके विभिन्न आकार के गेड़े तैयार किए जाते हैं। इस पूरे व्यवसाय के संचालन से कृष्णा खत्री को हर महीने लगभग 50 हजार रुपए की कमाई होती है, जिससे उनके परिवार को आर्थिक संबल मिलता है।\n\n \n\nत्योहारों के सीजन में बढ़ती है देशव्यापी माँग\n\nसालभर चलने वाले इस काम में दीपावली और अन्य बड़े त्योहारों के सीजन के दौरान माँग में जबरदस्त उछाल देखने को मिलता है। चूँकि इस धागे का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, महालक्ष्मी पूजन और विभिन्न मांगलिक आयोजनों में अनिवार्य रूप से होता है, इसलिए पर्वों के दिनों में काम का दबाव और उत्पादन दोनों बढ़ जाते हैं। बीकानेर की इस यूनिट में तैयार होने वाली मौली केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह गुजरात, मध्यप्रदेश, असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी भेजी जाती है, जहाँ इसकी लगातार माँग बनी रहती है।\n\nइसका आप पर असर\nयह उद्यम स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर रहा है और देश के विभिन्न राज्यों में धार्मिक सामग्री की आपूर्ति को सुगम बनाता है।\n\n• बीकानेर में: स्थानीय महिला कामगारों को नियमित रोजगार और स्थिर आजीविका मिल रही है, जिससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।\n• भारत में: देश भर के विभिन्न राज्यों के बाजारों में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आवश्यक पवित्र धागे की सुचारू आपूर्ति बनी रहती है।\n• व्यापारिक दृष्टिकोण: छोटे निवेश से शुरू किए गए घरेलू उद्यमों के बढ़ने से महिला उद्यमिता को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।\n• सामाजिक संदेश: विभिन्न समुदायों की महिलाओं का एक साथ मिलकर काम करना समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का सकारात्मक संदेश देता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nइस कारोबार के विस्तार और सफलता के पीछे पारंपरिक पारिवारिक हुनर, बाजार की निरंतर माँग और सूझबूझ से किया गया प्रबंधन मुख्य कारण रहे हैं।\n\n• पारिवारिक पृष्ठभूमि: शुरुआत में ससुर द्वारा छोटे स्तर पर शुरू किए गए काम के अनुभव को आगे चलकर बड़े पैमाने पर व्यवसाय में बदला गया।\n• बढ़ती माँग: देश भर में दीपावली और अन्य त्योहारों पर धार्मिक अनुष्ठानों के लिए मौली की निरंतर आवश्यकता होने से कारोबार को लगातार विस्तार मिला।\n• कम लागत और मेहनत: मात्र 10 हजार रुपए के शुरुआती निवेश से शुरू करके वर्षों की कड़ी मेहनत और अनुभव के बल पर इस कार्य को स्थापित किया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बीकानेर में मौली निर्माण का कारोबार कौन चलाता है?\nबीकानेर में यह कारोबार महिला उद्यमी कृष्णा खत्री द्वारा चलाया जा रहा है।\n\n2. इस व्यवसाय की शुरुआत कितने रुपए से की गई थी?\nइस कारोबार की शुरुआत महज 10 हजार रुपए की शुरुआती पूँजी से की गई थी।\n\n3. रोजाना कितनी मात्रा में मौली तैयार की जाती है?\nइस यूनिट में रोजाना करीब 400 किलो मौली तैयार की जाती है।\n\n4. तैयार मौली बाजार में किस भाव पर बिकती है?\nबाजार में तैयार मौली लगभग 280 रुपए प्रति किलो के भाव से बेची जाती है।\n\n5. मौली बनाने की प्रक्रिया में कितना समय लगता है?\nकच्चे धागे से मौली तैयार होने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 8 से 10 दिन का समय लगता है।\n\n6. इस काम से कितने लोगों को रोजगार मिला है?\nइस कारोबार से लगभग 100 लोगों को रोजगार मिल रहा है, जिनमें मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल हैं।\n\n7. यहाँ तैयार होने वाली मौली किन-किन राज्यों में भेजी जाती है?\nयहाँ की मौली राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और दिल्ली भेजी जाती है।\n\n8. इस कारोबार से हर महीने कितनी कमाई हो जाती है?\nइस व्यवसाय से हर महीने लगभग 50 हजार रुपए की कमाई होती है।\n\nप्रेरणा और सबक\nकृष्णा खत्री का यह सफर उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के साथ अपने दम पर कुछ बड़ा करना चाहते हैं।\n\n• छोटे निवेश से शुरुआत: साबित होता है कि बड़े व्यवसाय के लिए करोड़ों की नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और मात्र 10 हजार रुपए जैसी छोटी पूँजी की भी जरूरत हो सकती है।\n• पारिवारिक और सामाजिक सहयोग: विभिन्न समुदायों की महिलाओं को साथ लेकर काम करने से न सिर्फ उत्पादन बढ़ता है बल्कि सामाजिक सौहार्द भी मजबूत होता है।\n• धैर्य और निरंतरता: शुरुआती दौर की कठिनाइयों और आपूर्ति की समस्याओं के बावजूद काम बंद न करके उसे बड़े पैमाने पर खड़ा करना सफलता की कुंजी है।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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