बीकानेर में ऊंटनी के दूध से बनी प्रोटीन तकनीक को केंद्र की हरी झंडी, मिला आधिकारिक पेटेंट बीकानेर स्थित वेटरनरी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऊंटनी के दूध की प्रोटीन क्षमता बढ़ाने का नया फॉर्मूला तैयार किया है, जिसे भारत सरकार ने पेटेंट प्रदान किया है। राजस्थान के बीकानेर स्थित वेटरनरी विश्वविद्यालय की शोध टीम ने डेयरी विज्ञान और पोषण के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय मुकाम हासिल किया है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऊंटनी के दूध से जुड़े प्रोटीन पर गहन अनुसंधान करते हुए एक विशेष तकनीक तैयार की है, जिसे भारत सरकार की ओर से आधिकारिक पेटेंट प्रदान किया गया है। यह नवाचार ऊंटनी के दूध में मौजूद हाइड्रोलाइज्ड प्रोटीन की शक्ति और उसकी जैविक सक्रियता को कई गुना बढ़ा देता है, जिससे डेयरी खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और पोषण स्तर में अभूतपूर्व सुधार किया जा सकेगा। गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ में बड़ा सुधार पशुधन उत्पाद प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आर के बेरवाल ने इस उपलब्धि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विभाग में पीएचडी शोधार्थी डॉ. अनीता तंवर के गहन अध्ययन से यह सफलता संभव हुई है। उन्होंने बताया कि ऊंटनी के दूध में पाए जाने वाले कुल प्रोटीन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कैसिइन होता है, जिसमें बीटा कैसिइन की प्रचुरता पाई जाती है। शोध के दौरान तैयार किए गए कैसिइन पाउडर को हाइड्रोलाइज्ड करने से उसके कार्यात्मक गुण और जैवसक्रिय क्षमता बहुत तेज हो जाती है। इस फॉर्मूले को जब किसी भी आम दुग्ध उत्पाद में मिलाया जाता है, तो उस उत्पाद की पोषण वैल्यू, कुल मात्रा और शेल्फ लाइफ में भारी वृद्धि दर्ज की जाती है। इसका सीधा लाभ यह होता है कि खाद्य उत्पाद जल्दी खराब नहीं होते और उपभोक्ताओं को पर्याप्त मात्रा में उच्च श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त होता है। व्यावसायिक इस्तेमाल की तैयारी शुरू प्रयोगशाला में मिली इस कामयाबी के बाद विभाग अब इस नई तकनीक को व्यावसायिक धरातल पर उतारने की योजना बना रहा है। विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य शोध को केवल किताबों या प्रयोगशाला तक सीमित न रखकर उसका लाभ बाजार और आम जनजीवन तक पहुंचाना है। इस पाउडर के व्यापक उत्पादन और डेयरी उद्योग में इसके प्रयोग से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर तेजी से काम किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में आम लोगों को सुपरफूड के रूप में बेहतर डेयरी उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकें। स्वास्थ्य लाभ और भविष्य की व्यापक संभावनाएं विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने पूरी अनुसंधान टीम की सराहना करते हुए इसे संस्थान के लिए एक गौरवपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने रेखांकित किया कि यह शोध भविष्य में ऊंटनी के दूध की उपयोगिता को नए आयाम देगा और उसकी बाजार मांग को भी मजबूती प्रदान करेगा। ऊंटनी के दूध में प्राकृतिक रूप से कई गंभीर बीमारियों से लड़ने और शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के औषधीय गुण मौजूद होते हैं। यदि इस वैज्ञानिक तकनीक से तैयार पाउडर को सामान्य खाद्य पदार्थों और डेयरी उत्पादों में शामिल किया जाए, तो यह मानवीय स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डालेगा। इसका आप पर असर ऊंटनी के दूध के प्रोटीन पर आधारित यह नई तकनीक पोषण स्तर को बढ़ाने और डेयरी उत्पादों को लंबे समय तक ताजा रखने में मददगार साबित होगी। • भारत में: डेयरी उद्योग को एक नया प्राकृतिक प्रोटीन घटक मिलेगा जो उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के साथ पोषण स्तर में सुधार लाएगा। उपभोक्ता जल्द ही उच्च प्रोटीन वाले ऐसे नए डेयरी उत्पादों का लाभ उठा सकेंगे जो बिना जल्दी खराब हुए टिके रहते हैं। • बीकानेर और राजस्थान में: स्थानीय ऊंट पालकों को दूध के बेहतर व्यावसायिक दाम और स्थिर बाजार मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। पशुपालकों की आय में सुधार होगा और क्षेत्र की पारंपरिक डेयरी व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से सीधा सहारा मिलेगा। • उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर: आम लोग अब ऊंटनी के दूध में पाए जाने वाले औषधीय गुणों का लाभ रोजमर्रा के दुग्ध उत्पादों के जरिए आसानी से ले सकेंगे। इससे बीमारियों से बचाव और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी। • खाद्य बर्बादी में कमी: उत्पादों की शेल्फ लाइफ कई गुना बढ़ने से खुदरा दुकानदारों और उपभोक्ताओं के स्तर पर दूध उत्पादों के खराब होने का नुकसान घटेगा। इससे भंडारण लागत कम होगी और खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ यह पेटेंट ऊंटनी के दूध के औषधीय गुणों को आधुनिक डेयरी उत्पादों में व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल करने के सफल वैज्ञानिक प्रयोग के बाद दिया गया है। • सीधा कारण: पीएचडी शोधार्थी डॉ. अनीता तंवर और वैज्ञानिक टीम ने ऊंटनी के दूध के कैसिइन को हाइड्रोलाइज्ड कर उसकी बायोएक्टिव शक्ति को कई गुना बढ़ाने की अनूठी तकनीक ईजाद की। इस मूल खोज की प्रामाणिकता को देखते हुए भारत सरकार ने इसे आधिकारिक पेटेंट प्रदान किया। • कैसिइन की संरचना: ऊंटनी के कुल दूध प्रोटीन में 80 प्रतिशत हिस्सा कैसिइन का होता है और इसमें बीटा कैसिइन प्रचुर मात्रा में मौजूद रहता है। वैज्ञानिकों ने इसी खास प्रोटीन संरचना का रासायनिक विश्लेषण करके उसे सुगम और शक्तिशाली पाउडर रूप में तब्दील करने की विधि खोजी। • व्यावहारिक उपयोगिता की जरूरत: ऊंटनी का दूध स्वास्थ्यवर्धक होने के बावजूद सीमित उपलब्धता और विशेष स्वाद के कारण व्यापक रूप से इस्तेमाल नहीं हो पाता था। शोधकर्ताओं ने इस बाधा को दूर करने के लिए ऐसा पाउडर तैयार किया जिसे किसी भी सामान्य डेयरी उत्पाद में आसानी से मिलाया जा सके। • आगामी कदम: तकनीक का पेटेंट सुरक्षित होने के बाद अब विश्वविद्यालय इसे व्यावसायिक रूप देने के लिए औद्योगिक साझेदारियों और बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी में जुट गया है। सवाल-जवाब 1. बीकानेर वेटरनरी विश्वविद्यालय को किस नवाचार के लिए भारत सरकार से पेटेंट मिला है? विश्वविद्यालय को ऊंटनी के दूध में मौजूद हाइड्रोलाइज्ड प्रोटीन की शक्ति और जैवसक्रिय क्षमता को बढ़ाने की नई तकनीक विकसित करने के लिए पेटेंट मिला है। 2. यह शोध किस वैज्ञानिक और विभाग के नेतृत्व में पूरा हुआ? यह शोध पशुधन उत्पाद प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आर के बेरवाल के मार्गदर्शन में पीएचडी शोधार्थी डॉ. अनीता तंवर द्वारा पूरा किया गया है। 3. ऊंटनी के दूध के प्रोटीन पाउडर को अन्य दुग्ध उत्पादों में मिलाने से क्या फायदा होगा? इसे मिलाने से दुग्ध उत्पादों की न्यूट्रिशन वैल्यू, कुल उत्पादन मात्रा और शेल्फ लाइफ कई गुना बढ़ जाती है, जिससे उत्पाद लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं। 4. ऊंटनी के दूध में प्रोटीन की क्या संरचना पाई जाती है? ऊंटनी के दूध के कुल प्रोटीन में 80 प्रतिशत कैसिइन होता है, जिसमें सबसे अधिक मात्रा बीटा कैसिइन की होती है। 5. विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने इस खोज के बारे में क्या कहा? डॉ. सुमंत व्यास ने कहा कि यह शोध ऊंटनी के दूध की भविष्य की उपयोगिता को बढ़ाएगा और इसमें मौजूद औषधीय गुण मानव स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करेंगे। प्रेरणा और सबक बीकानेर के शोधकर्ताओं का यह सफर दर्शाता है कि स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्रित अकादमिक शोध किस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर के नवाचार में बदल सकता है। • समस्या का व्यावहारिक समाधान: अकादमिक अध्ययन का असली उद्देश्य कागजी डिग्रियों से परे समाज और उद्योग के लिए उपयोगी समाधान प्रस्तुत करना होना चाहिए। डॉ. अनीता तंवर ने स्थानीय संसाधन पर ध्यान केंद्रित कर एक क्रांतिकारी परिणाम हासिल किया। • परंपरा और विज्ञान का संगम: सदियों से जाने जाने वाले ऊंटनी के दूध के पारंपरिक औषधीय महत्व को आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से जोड़कर एक नया मूल्यवान उत्पाद बनाया गया। पुरानी जानकारियों को नए वैज्ञानिक नजरिए से देखने पर बड़ी सफलताएं मिलती हैं। • सतत लगन से पेटेंट तक का सफर: एक शोधार्थी के रूप में लैब प्रयोगों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के पेटेंट प्रमाण पत्र तक पहुंचना धैर्य और निरंतर मेहनत का प्रमाण है। युवा वैज्ञानिकों के लिए यह समर्पण एक बड़ी प्रेरणा का स्रोत है। https://trendkia.com/rajasthan/bikaner-men-untani-ke-dudha-se-bani-protina-takanika-ko-kendra-ki-hari-jhndi-mila-adhikarika-petenta-39051 TrendKia — Har trend, sabse pehle.