# बिसाऊ की मूक रामलीला 11 अक्टूबर से, बिना संवाद के मुखौटों और इशारों से जीवंत होगी रामायण

> राजस्थान के झुंझुनूं जिले में करीब दो सदी पुरानी मूक रामलीला 11 अक्टूबर से शुरू होगी, जहां कलाकार बिना कोई संवाद बोले सिर्फ भाव-भंगिमाओं और मुखौटों के जरिए पूरी रामायण का मंचन करते हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/bisau-ki-muka-ramalila-11-aktubara-se-bina-snvada-ke-mukhauton-aura-isharon-se-jivnta-hogi-ramayana-44308 · **Language:** Hindi
**Tags:** बिसाऊ, झुंझुनूं, मूक रामलीला, राजस्थान, गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, रावण दहन

राजस्थान के झुंझुनूं जिले का कस्बा बिसाऊ अपनी करीब दो सौ साल पुरानी ऐतिहासिक मूक रामलीला के लिए पूरे विश्व में विशेष पहचान रखता है। इस प्राचीन मंचन की सबसे अनूठी बात यह है कि पूरे नाटक के दौरान मंच पर मौजूद कोई भी कलाकार एक भी शब्द नहीं बोलता है। शब्दों की जगह कलाकार अपने हाथों के इशारों, चेहरे के हाव-भाव, पारंपरिक मुखौटों और सधे हुए अभिनय के बल पर रामायण की पूरी कथा को दर्शकों के सामने जीवंत करते हैं। इस साल इस ऐतिहासिक आयोजन की शुरुआत 11 अक्टूबर से होने जा रही है। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपनी जगह बना चुकी इस अनूठी रामलीला को देखने के लिए हर साल दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग बिसाऊ पहुंचते हैं, जिसके चलते कस्बे में इस समय मंचन की तैयारियां पूरी गति से चल रही हैं।

## मंचन की तैयारियां और मुखौटों का महत्व
इस मूक मंचन को सफल बनाने के लिए कलाकार कई दिनों से अपने किरदारों में ढलने के लिए लगातार अभ्यास और कड़ी मेहनत में जुटे हैं। कार्यक्रम स्थल पर मंच से जुड़ी सभी आवश्यक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। लंका पर भगवान श्रीराम की चढ़ाई से ठीक पहले समुद्र तट पर की जाने वाली भगवान शिव की पूजा के प्रसंग के लिए कलाकार बाबू नवहाल शिवलिंग पर रंग-रोगन का काम पूरा कर रहे हैं। इसके साथ ही विभिन्न प्रसंगों में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग पात्रों के मुखौटे, वस्त्र और अन्य मंच सामग्री भी बेहद सावधानी से सजाई और संवारी जा रही है। चूंकि इस पूरे नाटक में कोई मौखिक संवाद नहीं होता, इसलिए इन खास मुखौटों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इन्हीं के जरिए पात्रों की पहचान और उनके चेहरे के भाव दर्शकों तक साफ तौर पर पहुंचते हैं।

## रामाणा जोहड़ से ऐसे शुरू हुई थी यह अनूठी परंपरा
बिसाऊ में इस मूक नाटक के आरंभ की कहानी भी काफी रोचक है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, इस अनूठे मंचन की शुरुआत लगभग 170 साल पहले रामाणा जोहड़ नामक स्थान से हुई थी। उस दौर में जमना नाम की एक साध्वी ने गांव के छोटे बच्चों को एक साथ जोड़कर रामलीला का मंचन करवाने की पहल की थी। उस समय पात्रों के अनुसार कई तरह के मुखौटे तैयार किए गए थे, लेकिन जब बच्चे उन भारी मुखौटों को पहनकर मंच पर उतरे, तो उन्हें संवाद बोलने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। बच्चों की इसी कठिनाई को देखते हुए साध्वी और आयोजकों ने एक व्यावहारिक फैसला लिया कि नाटक को बिना किसी संवाद के, पूरी तरह मूक अभिनय के सहारे ही प्रस्तुत किया जाएगा। यह तात्कालिक उपाय आगे चलकर बिसाऊ की एक अद्वितीय वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर बन गया।

## ढोल-नगाड़ों की थाप और चतुर्दशी को रावण दहन
इस रामलीला में मूक अभिनय और शारीरिक गतिविधियां ही संवाद का पूरा काम करती हैं। कलाकारों के हाथों के संकेत, आंखों के भाव, शारीरिक हलचल और मंच पर उनकी गतिशीलता से कहानी आगे बढ़ती है। जब ढोल और नगाड़ों की गूंजती आवाज के बीच कलाकार बिना एक भी शब्द बोले रामायण के प्रसंगों को पेश करते हैं, तो यह दर्शकों को एक अनोखा और रोमांचक अनुभव प्रदान करता है। सामान्य तौर पर पूरे देश में विजयादशमी यानी दशहरे के दिन रावण के पुतले के दहन के साथ रामलीलाएं संपन्न हो जाती हैं, परंतु बिसाऊ की परंपरा बिल्कुल भिन्न है। यहां यह मंचन लगभग एक पखवाड़े तक चलता है। मंचन के सातवें दिन लंका के पुतले का दहन किया जाता है, जबकि रावण दहन का मुख्य कार्यक्रम दशहरे के दिन न होकर चतुर्दशी तिथि को आयोजित किया जाता है।

## सांप्रदायिक सौहार्द और पारंपरिक मिठाइयों का संगम
बिसाऊ की यह रामलीला सामाजिक भाईचारे और आपसी एकता का भी बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय के ईल्लाही समाज के लोग पूरी आस्था और उत्साह के साथ अपनी सहभागिता निभाते हैं। मंचन के दौरान बजने वाले ढोल और नगाड़ों के वादन में ईल्लाही समाज के लोगों की मुख्य भूमिका रहती है। इसके अतिरिक्त, इस उत्सव के दौरान बिसाऊ में विशेष पारंपरिक मिठाइयां, जिन्हें तिलंगनी और सैंठोली कहा जाता है, तैयार की जाती हैं। ये मिठाइयां रामलीला के आरंभ से लेकर दीपावली पर्व तक लगातार बनाई जाती हैं और स्थानीय लोगों व बाहर से आए दर्शकों के बीच आकर्षण का बड़ा केंद्र रहती हैं। आज के आधुनिक युग में इस पौने दो सदी पुरानी विरासत को सोशल मीडिया पर लाइव भी प्रसारित किया जाता है, जिससे देश-विदेश में बैठे लोग भी इस अद्भुत मूक रामलीला का आनंद घर बैठे ले सकें।

## इसका आप पर असर
यह खबर सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में रुचि रखने वाले दर्शकों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए बेहद उपयोगी है।

- **भारत में:** देश भर के कला प्रेमियों और पर्यटकों को राजस्थान की दो सदी पुरानी अनूठी मूक नाट्य परंपरा को जानने और लाइव प्रसारण के जरिए जुड़ने का अवसर मिलेगा। जो लोग इस दुर्लभ शैली को देखना चाहते हैं, वे 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे पखवाड़े भर के मंचन का हिस्सा बन सकते हैं।
- **झुंझुनूं में:** बिसाऊ कस्बे और आसपास के स्थानीय निवासियों के लिए यह वार्षिक उत्सव सामाजिक जुड़ाव और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने का समय है। इस दौरान बनने वाली पारंपरिक मिठाइयों तिलंगनी और सैंठोली की मांग बढ़ जाती है और स्थानीय कारीगरों को मंच संचालन से रोजगार व पहचान मिलती है।
- **आयोजन तिथियों के संबंध में:** दर्शक 11 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस मंचन में पारंपरिक दशहरे के बजाय चतुर्दशी को होने वाले विशेष रावण दहन का प्रत्यक्ष गवाह बन सकते हैं। यात्रा की योजना बनाने वाले लोग सातवें दिन होने वाले लंका दहन और चतुर्दशी के मुख्य दहन को ध्यान में रखकर अपना कार्यक्रम बना सकते हैं।
- **डिजिटल दर्शकों के लिए:** जो लोग बिसाऊ नहीं पहुंच सकते, वे सोशल मीडिया पर होने वाले लाइव प्रसारण के जरिए घर बैठे इस मूक रामलीला को देख सकते हैं। इससे नई पीढ़ी को बिना संवाद वाले इस दुर्लभ अभिनय और लोक कला को करीब से समझने की सुविधा मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
बिसाऊ की रामलीला का मूक रूप में बदलना किसी पूर्व नियोजित योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि मंचन के दौरान सामने आई एक व्यावहारिक समस्या का अभिनव समाधान था।

- **मुखौटों के कारण बोलने में परेशानी:** करीब 170 साल पहले जब साध्वी जमना ने बच्चों को एकत्रित करके रामलीला शुरू करवाई, तो पात्रों के लिए विशेष मुखौटे बनवाए गए थे। इन मुखौटों को पहनने के बाद बच्चों के लिए साफ आवाज में संवाद बोल पाना बेहद कठिन हो गया था।
- **संवाद छोड़कर मूक अभिनय अपनाने का फैसला:** बच्चों की बोलने की इस असुविधा को देखते हुए आयोजकों ने संवाद पूरी तरह बंद करके कहानी को सिर्फ शारीरिक मुद्राओं और भावों से दर्शाने का निर्णय लिया। यह व्यावहारिक बदलाव आगे चलकर इस कस्बे की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान बन गया।
- **परंपरा का पीढ़ियों से निर्वाह:** दर्शकों से मिले अभूतपूर्व प्रोत्साहन और अभिनय की इस अनूठी शैली की लोकप्रियता के कारण स्थानीय लोगों ने इस मौन परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा। परिणामस्वरूप यह आयोजन न केवल 200 वर्षों से जीवित है, बल्कि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हुआ।

## सवाल-जवाब

### 1. बिसाऊ की मूक रामलीला इस साल कब से शुरू हो रही है?
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बिसाऊ में यह ऐतिहासिक मूक रामलीला 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है।

### 2. इस रामलीला की सबसे मुख्य विशेषता क्या है?
इस रामलीला में मंच पर कोई भी कलाकार संवाद नहीं बोलता है, और पूरी रामायण केवल भाव-भंगिमाओं, इशारों और विशेष मुखौटों के जरिए प्रस्तुत की जाती है।

### 3. बिसाऊ में मूक रामलीला की शुरुआत कब और किसने की थी?
स्थानीय मान्यता के अनुसार इसकी शुरुआत करीब 170 साल पहले रामाणा जोहड़ में साध्वी जमना ने बच्चों को एकत्र करके कराई थी।

### 4. इस रामलीला में रावण दहन किस दिन किया जाता है?
यहां रावण दहन पारंपरिक दशहरे के दिन करने के बजाय चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।

### 5. इस आयोजन के दौरान बिसाऊ में कौन सी विशेष मिठाइयां बनाई जाती हैं?
रामलीला से लेकर दीपावली तक बिसाऊ में विशेष रूप से तिलंगनी और सैंठोली नाम की पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं।

### 6. इस मंचन में सामाजिक सौहार्द की क्या मिसाल देखने को मिलती है?
मुस्लिम समुदाय के ईल्लाही समाज के लोग पूरी श्रद्धा से इसमें शामिल होते हैं और मंचन के दौरान बजने वाले ढोल-नगाड़ों में उनकी प्रमुख भागीदारी होती है।

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