# ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले राजस्थान केसरी की वीर गाथा और बारहठ परिवार का अमर बलिदान

> स्वाधीनता संग्राम के महान नायक केसरी सिंह बारहठ की पुण्यतिथि पर जानिए कैसे उनके पूरे परिवार ने अंग्रेजों के खिलाफ सर्वस्व न्योछावर कर दिया और साहित्य को क्रांति का हथियार बनाया।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-08-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/britisha-hukumata-ki-ninva-hilane-vale-rajasthan-kesari-ki-vira-gatha-aura-barhath-parivara-ka-amara-balidana-16589 · **Language:** Hindi
**Tags:** केसरी सिंह बारहठ, राजस्थान केसरी, प्रताप सिंह बारहठ, जोरावर सिंह बारहठ, स्वाधीनता संग्राम, चेतावनी रा चूंगट्या, कोटा, शाहपुरा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे महान नायकों की गाथाओं से भरा हुआ है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। इन्हीं विरले महानायकों में राजस्थान के महान स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारहठ का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने न केवल स्वयं अंग्रेजों के अत्याचारों और दमनकारी नीतियों का डटकर मुकाबला किया, बल्कि अपने पूरे परिवार को राष्ट्र सेवा की ज्वाला में समर्पित कर दिया। अपनी धारदार लेखनी से सोए हुए देशवासियों को जगाने वाले और ब्रिटिश हुकूमत के सामने कभी न झुकने वाले इस अमर सेनानी की पुण्यतिथि पर आज पूरा देश उनके अद्वितीय त्याग, क्रांतिकारी संघर्ष और साहित्यिक अवदान को अत्यंत श्रद्धा के साथ याद कर रहा है।

 

## वर्धा में मिली 'राजस्थान केसरी' की सम्मानित पहचान

केसरी सिंह बारहठ का स्वाधीनता आंदोलन में संघर्ष अत्यंत लंबा और कठिन रहा। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लगातार गतिविधियों के कारण उन्हें लंबे समय तक कारावास की यातनाएं झेलनी पड़ीं। जेल से रिहा होने के बाद वे महाराष्ट्र के वर्धा पहुंचे। उस कालखंड में प्रसिद्ध राष्ट्रवादी उद्योगपति और स्वतंत्रता सेनानी जमनालाल बजाज देश भर के प्रमुख राष्ट्रभक्तों को वर्धा में आमंत्रित कर रहे थे। वर्धा प्रवास के दौरान केसरी सिंह बारहठ के सम्मान में एक विशेष दीपावली अंक का प्रकाशन किया गया, जिसमें उनके जीवन संघर्ष, त्याग और देशभक्ति को प्रमुखता के साथ रेखांकित किया गया। इसी ऐतिहासिक अवसर पर उन्हें **'राजस्थान केसरी'** की उपाधि से विभूषित किया गया। इसके उपरांत यह सम्मानजनक नाम पूरे देश में उनकी स्थायी पहचान बन गया और लोग उन्हें इसी नाम से जानने लगे।

 

## साहित्य को बनाया क्रांति और जनजागरण का सशक्त माध्यम

केसरी सिंह बारहठ केवल एक कुशल रणनीतिकार और निडर क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के साहित्यकार भी थे। वे भली-भांति समझते थे कि ब्रिटिश शासन से मुकाबला करने के लिए हथियारों के साथ-साथ विचारों की क्रांति भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अपनी ओजस्वी लेखनी का उपयोग जनता के भीतर आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति की अलख जगाने के लिए किया। उनकी रचनाओं ने उस दौर में युवाओं और क्षत्रिय समाज को देश की आज़ादी के लिए आगे आने को प्रेरित किया।

उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली रचनाओं में **'चेतावनी रा चूंगट्या'** का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इन ऐतिहासिक दोहों के माध्यम से उन्होंने मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह को ब्रिटिश दरबार की दासता स्वीकार करने से रोका। जब महाराणा फतेह सिंह दिल्ली दरबार में शामिल होने जा रहे थे, तब केसरी सिंह बारहठ के इन तीखे दोहों ने उनके स्वाभिमान को झकझोर कर रख दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने दिल्ली दरबार में न जाने का निर्णय लिया। इसके अतिरिक्त उनकी एक अन्य चर्चित रचना **'कुसुमांजलि'** थी। इसमें उन्होंने लॉर्ड कर्जन और ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों पर बेहद चतुर द्विअर्थी शैली में तीखा व्यंग्य किया। ऊपर से देखने पर यह रचना प्रशंसात्मक प्रतीत होती थी, परंतु इसके भीतर अंग्रेजी शासन के प्रति तीखा विरोध और आक्रोश छिपा हुआ था। इस प्रकार उन्होंने अपनी साहित्यिक क्षमता को जनजागरण का एक शक्तिशाली हथियार बना दिया।

 

## चांदनी चौक में लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमला और बारहठ परिवार की भूमिका

ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध सशरीर क्रांति के मोर्चे पर भी केसरी सिंह बारहठ का परिवार सदैव अग्रिम पंक्ति में रहा। उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ स्वतंत्रता संग्राम के एक अत्यंत प्रमुख और साहसी क्रांतिकारी थे। 23 दिसंबर 1912 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक मोड़ साबित हुआ, जब दिल्ली के चांदनी चौक में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर एक भीषण बम हमला किया गया। इस ऐतिहासिक और साहसी योजना को अंजाम देने में जोरावर सिंह बारहठ ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इस क्रांतिकारी योजना के तार महान स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस सहित देश के कई अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों से जुड़े हुए थे। केसरी सिंह के पुत्र प्रताप सिंह बारहठ भी इस तरह की क्रांतिकारी गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय थे। चांदनी चौक में हुए इस बम धमाके ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी और अंग्रेजी प्रशासन में खलबली मचा दी थी। इस घटना के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर धरपकड़ और दमन चक्र चला दिया। बारहठ परिवार अंग्रेजों की सीधी निगरानी और निशाने पर आ गया। शासन की ओर से परिवार के सदस्यों पर मानसिक और आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता चला गया, लेकिन इस परिवार का मनोबल रत्ती भर भी कम नहीं हुआ।

 

## बरेली जेल में प्रताप सिंह की शहादत और अंग्रेजों को ऐतिहासिक जवाब

केसरी सिंह बारहठ के सुपुत्र प्रताप सिंह बारहठ भी अपने पिता और चाचा के पदचिन्हों पर चलते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उत्तर प्रदेश की बरेली जेल भेज दिया। बरेली जेल में ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने उन पर अमानवीय अत्याचार किए ताकि वे अपने अन्य क्रांतिकारी सहयोगियों और गुप्त योजनाओं के बारे में जानकारी उगल दें।

ब्रिटिश अधिकारी चार्ल्स क्लीवलैंड ने प्रताप सिंह बारहठ को मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए। क्लीवलैंड ने उन्हें बताया कि उनके पिता केसरी सिंह पहले से ही जेल में बंद हैं, उनकी पारिवारिक संपत्ति अंग्रेजों द्वारा जब्त की जा चुकी है और उनकी मां अपने बेटे के वियोग में दिन-रात रोती रहती हैं। क्लीवलैंड ने प्रताप सिंह को प्रलोभन दिया कि यदि वे अपने साथी क्रांतिकारियों के नाम और ठिकानों की जानकारी दे देंगे, तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाएगा और उनके परिवार पर से सभी पाबंदियां हटा ली जाएंगी।

परंतु भारत माता के इस वीर सपूत ने अपनी मातृभूमि के साथ तनिक भी विश्वासघात करने से साफ इंकार कर दिया। प्रताप सिंह बारहठ ने उस समय जो उत्तर दिया, वह आज भी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर है। उन्होंने निडरता से कहा

> “मैं अपनी एक मां को हंसाने के लिए देश की सैकड़ों माताओं को नहीं रुला सकता।”

इस ऐतिहासिक जवाब के बाद अंग्रेजों ने उन पर यातनाओं का दौर और तेज़ कर दिया। परंतु प्रताप सिंह ने अंतिम सांस तक अपने साथियों का भेद उजागर नहीं किया और जेल की भयानक यातनाएं सहते हुए अपने प्राण देश की वेदी पर न्योछावर कर दिए।

 

## संपूर्ण परिवार का स्वाधीनता यज्ञ में अद्वितीय त्याग

केसरी सिंह बारहठ ने अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत सुख, वैभव और पारिवारिक मोह से ऊपर उठकर केवल राष्ट्र की सेवा के लिए तैयार किया था। यही कारण है कि उनका पूरा कुनबा देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा। उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ, अमर शहीद पुत्र प्रताप सिंह बारहठ, दूसरे पुत्र रणजीत सिंह बारहठ और उनके दामाद ईश्वरदान आशिया सभी स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम योद्धा बने।

अंग्रेजी हुकूमत द्वारा परिवार की समस्त संपत्ति जब्त कर ली गई, घर-बार कुर्क कर दिया गया और परिवार के लोगों को लगातार जेलों में ठूंसकर यातनाएं दी गईं। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बारहठ परिवार का कोई भी सदस्य अपने पथ से विचलित नहीं हुआ। उनके लिए व्यक्तिगत जीवन और सुख-सुविधाओं की तुलना में देश की आज़ादी और राष्ट्रधर्म सर्वोपरि था। भारत के इतिहास में ऐसा विरला ही उदाहरण मिलता है जहां एक ही परिवार के सभी पुरुषों ने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया हो।

 

## शाहपुरा के देवपुरा से कोटा के माणक भवन तक की जीवन यात्रा

केसरी सिंह बारहठ का जन्म शाहपुरा रियासत के अंतर्गत आने वाली उनकी पैतृक जागीर के गांव देवपुरा में हुआ था। बचपन से ही उनके संस्कार देशभक्ति और समाज सेवा से ओतप्रोत थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र के पुनरुत्थान और स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित कर दिया। जीवन भर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष, लंबी जेल यात्राओं और शारीरिक यातनाओं को झेलने के पश्चात अपने जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने राजस्थान के कोटा शहर में व्यतीत किए।

14 अगस्त 1941 को कोटा स्थित माणक भवन में इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने अपनी अंतिम सांस ली। केसरी सिंह बारहठ का जीवन राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत के इतिहास में त्याग, अदम्य साहस, साहित्यिक प्रखरता और राष्ट्रभक्ति का एक अनूठा प्रतीक है। उन्होंने अपनी लेखनी से चेतना की नई अलख जगाई, क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया और अपने पूरे परिवार को देश की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** केसरी सिंह बारहठ और उनके परिवार का अमर त्याग हमें सिखाता है कि देश की आज़ादी और अखंडता के लिए स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रधर्म को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

- **राजस्थान में:** राज्य की युवा पीढ़ी के लिए बारहठ परिवार की वीर गाथा स्वाभिमान, भाषाई गौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण की एक कालजयी मिसाल है।

## सवाल-जवाब

### 1. केसरी सिंह बारहठ कौन थे और उन्हें क्या उपाधि मिली थी?
केसरी सिंह बारहठ भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और साहित्यकार थे। उन्हें वर्धा में सम्मानपूर्वक 'राजस्थान केसरी' की उपाधि दी गई थी।

### 2. लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले में बारहठ परिवार की क्या भूमिका थी?
23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले में केसरी सिंह के भाई जोरावर सिंह बारहठ ने मुख्य भूमिका निभाई थी और उनके पुत्र प्रताप सिंह भी इसमें शामिल थे।

### 3. केसरी सिंह बारहठ की प्रमुख साहित्यिक रचनाएं कौन सी हैं?
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना 'चेतावनी रा चूंगट्या' (दोहे) है जिसने महाराणा फतेह सिंह को दिल्ली दरबार जाने से रोका था, तथा 'कुसुमांजलि' जिसमें ब्रिटिश शासन पर द्विअर्थी व्यंग्य किया गया था।

### 4. प्रताप सिंह बारहठ का प्रसिद्ध कथन क्या था?
बरेली जेल की यातनाओं के दौरान अंग्रेजों को जवाब देते हुए उन्होंने कहा था: 'मैं अपनी एक मां को हंसाने के लिए देश की सैकड़ों माताओं को नहीं रुला सकता।'

### 5. केसरी सिंह बारहठ का निधन कब और कहां हुआ था?
उनका निधन 14 अगस्त 1941 को राजस्थान के कोटा स्थित माणक भवन में हुआ था।

## प्रेरणा और सबक
- **राष्ट्रहित सर्वोपरि:** व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और पारिवारिक मोह से ऊपर उठकर देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना।

- **विचारों की शक्ति:** लेखनी और साहित्य को अन्याय के खिलाफ जनजागरण का सबसे बड़ा और प्रभावी माध्यम बनाना।

- **अडिग निष्ठा:** कठिन से कठिन परिस्थितियों और यातनाओं के बावजूद अपने सिद्धांतों और भारत माता के प्रति निष्ठा से कभी समझौता न करना।

- **पारिवारिक संस्कार:** आने वाली पीढ़ी में देशभक्ति, नैतिक मूल्यों और स्वाभिमान के संस्कार रोपित करना।

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