चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित आठवीं सदी के प्राचीन गज लक्ष्मी मंदिर में दीपोत्सव पर उमड़ा आस्था का सैलाब दीपावली के पावन अवसर पर चित्तौड़गढ़ दुर्ग का ऐतिहासिक गज लक्ष्मी मंदिर रोशनी और फूलों से जगमगा उठा, जहाँ सुख और समृद्धि की प्रार्थना के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे। विश्व धरोहर स्थल के रूप में विख्यात और शौर्य गाथाओं के लिए प्रसिद्ध चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर स्थित सदियों पुराना गज लक्ष्मी मंदिर इन दिनों श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। देवी मां लक्ष्मी को समर्पित यह पावन देवालय अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, बेजोड़ स्थापत्य शैली और जनमानस में प्रचलित धार्मिक आस्था के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। आमतौर पर यहाँ पूरे वर्ष ही श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है, परंतु दीपोत्सव के पावन अवसर पर यहाँ का दृश्य अत्यंत भक्तिमय और विहंगम हो उठता है। फूलों की महक और विद्युत झालरों से जगमगाया दुर्ग परिसर इस वर्ष दीपावली के महापर्व को लेकर मंदिर परिसर में विशेष साज-सज्जा की गई है। पूरे मंदिर भवन को प्राकृतिक फूलों की मनभावन लड़ियों और बहुरंगी विद्युत रोशनी से सजाया गया है। रात्रि के समय जगमगाती रोशनी में नहाया हुआ यह मंदिर दूर से ही अलौकिक दिखाई देता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के ऊंचे परकोटे पर स्थित इस मंदिर की रोशनी पूरे किले के वातावरण को उत्सव के रंग में रंग देती है, जिसे निहारने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और सैलानी पहुंच रहे हैं। आठवीं सदी की दुर्लभ प्रतिमा और जलाभिषेक का धार्मिक महत्व इस पवित्र धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित मां गज लक्ष्मी की मनोहारी मूर्ति है। आठवीं शताब्दी के इस ऐतिहासिक मंदिर में देवी लक्ष्मी की जो विग्रह स्थापित है, उसके दोनों ओर गज यानी हाथी अपनी सूंड उठाए उनका जलाभिषेक करते दिखाई देते हैं। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, हाथियों द्वारा देवी का यह अभिषेक अतुलनीय वैभव, संपन्नता, सुख और समृद्धि का प्रत्यक्ष प्रतीक माना जाता है। चित्तौड़गढ़ सहित पूरे मेवाड़ अंचल के निवासियों का इस मंदिर से अटूट भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव है। जनश्रुति है कि इस पवित्र गर्भगृह में सच्चे मन से की गई हर प्रार्थना पूर्ण होती है और देवी अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करती हैं। महालक्ष्मी पूजन के बाद महा-आरती का भव्य आयोजन दीपोत्सव की श्रृंखला में विशेष रूप से महालक्ष्मी पूजन के शुभ मुहूर्त के उपरांत मंदिर में भव्य महा-आरती का आयोजन किया जाता है। इस आलौकिक आरती के दर्शन करने और पुण्य लाभ कमाने के लिए चित्तौड़गढ़ शहर के साथ-साथ सुदूर ग्रामीण और पड़ोसी क्षेत्रों से भी भारी भीड़ दुर्ग पर पहुंचती है। शंखध्वनि, घंटियों की गूंज और मां लक्ष्मी के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठता है। श्रद्धालु घंटों कतारों में खड़े रहकर इस महा-आरती की एक झलक पाने का इंतजार करते हैं, क्योंकि इस आरती में सम्मिलित होना अत्यंत फलदायी माना गया है। सुरक्षा और सुगम दर्शन के व्यापक प्रबंध दीपावली के अवसर पर परिवार के उत्तम स्वास्थ्य, आरोग्य, आर्थिक तरक्की और ऐश्वर्य की कामना लेकर श्रद्धालु यहाँ विशेष पूजा-अर्चना कर रहे हैं। भारी भीड़ के प्रबंधन और दर्शनार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय पुलिस बल और मंदिर व्यवस्थापकों ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। दुर्ग की चढ़ाई से लेकर मंदिर के निकास द्वार तक सुगम आवागमन की योजना बनाई गई है, जिससे किसी भी भक्त को असुविधा का सामना न करना पड़े। ऐतिहासिक धरोहर की आभा और मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा ने मिलकर इस बार के दीपोत्सव को चित्तौड़गढ़ के लिए बेहद यादगार बना दिया है। इसका आप पर असर चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर दीपोत्सव के अवसर पर उमड़ रही भारी भीड़ के कारण दर्शन व्यवस्था और यातायात प्रबंधन में व्यापक बदलाव किए गए हैं। • राजस्थान में: चित्तौड़गढ़ दुर्ग आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा तथा कतार प्रबंधन के सख्त नियम लागू किए गए हैं। दर्शनार्थियों को सुगम दर्शन के लिए निर्धारित मार्गों का पालन करने की सलाह दी गई है। • चित्तौड़गढ़ में: दुर्ग परिसर और आसपास के रास्तों पर वाहनों के दबाव को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं को सलाह दी गई है कि वे महा-आरती के समय समय पूर्व पहुंचें ताकि भीड़भाड़ से बचा जा सके। • श्रद्धालुओं के लिए: मंदिर में महालक्ष्मी पूजन के उपरांत आयोजित होने वाली महा-आरती में भाग लेने के लिए पूर्व योजना बनाना आवश्यक है। लंबी कतारों को देखते हुए वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। • पर्यटन पर प्रभाव: रोशनी और फूलों से सजे दुर्ग की सुंदरता को देखने के लिए पर्यटकों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। किले के आसपास के स्थानीय गाइडों और छोटे व्यापारियों की गतिविधियों में भी तेजी आई है। ऐसा क्यों हुआ चित्तौड़गढ़ के प्राचीन गज लक्ष्मी मंदिर में दीपोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने के मुख्य धार्मिक और ऐतिहासिक कारण रहे हैं। • समृद्धि का प्रतीक विग्रह: मंदिर में आठवीं शताब्दी की गज लक्ष्मी की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसमें हाथी अपनी सूंड से मां लक्ष्मी का अभिषेक करते दिखते हैं। यह स्वरूप सनातन परंपरा में सुख, वैभव और आर्थिक संपन्नता का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। • मेवाड़ की ऐतिहासिक आस्था: सदियों से चित्तौड़गढ़ और पूरे मेवाड़ क्षेत्र के निवासियों का इस देवालय से गहरा धार्मिक लगाव रहा है। लोगों का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से की गई मनौती निश्चित रूप से फलदायी होती है। • दीपावली का पावन मुहूर्त: शास्त्रों के अनुसार दीपावली की रात महालक्ष्मी पूजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। पूजन के तुरंत बाद होने वाली अलौकिक महा-आरती के दर्शन को अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है, जिससे दुर्ग पर भक्तों का सैलाब उमड़ता है। सवाल-जवाब 1. चित्तौड़गढ़ का गज लक्ष्मी मंदिर कितना पुराना है? यह मंदिर लगभग आठवीं शताब्दी का है और चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक देवालय है। 2. गज लक्ष्मी स्वरूप की क्या विशेषता है? यहाँ स्थापित प्रतिमा में मां लक्ष्मी के दोनों ओर हाथी अपनी सूंड से उनका जलाभिषेक करते दिखाई देते हैं, जो समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक है। 3. दीपावली के अवसर पर मंदिर में क्या विशेष आयोजन होता है? महालक्ष्मी पूजन के शुभ मुहूर्त के उपरांत मंदिर में भव्य महा-आरती का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। 4. दीपावली पर मंदिर की सजावट किस प्रकार की गई है? मंदिर परिसर को प्राकृतिक फूलों और रंग-बिरंगी विद्युत झालरों से विशेष रूप से सजाया गया है जिससे पूरा दुर्ग जगमगा उठा है। 5. श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए क्या प्रबंध किए गए हैं? मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस ने भीड़ नियंत्रण, सुगम आवाजाही और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुख्ता बंदोबस्त किए हैं। https://trendkia.com/rajasthan/chittorgarh-durga-sthita-athavin-sadi-ke-prachina-gaj-laxmi-mndira-men-dipotsava-para-umara-astha-ka-sailaba-57879 TrendKia — Har trend, sabse pehle.