दशहरे के लिए आबूरोड में बांस से गढ़े जा रहे 35 फीट तक के रावण, 15 सदस्यों का परिवार दिन-रात जुटा सिरोही जिले के मानपुर में एक ही परिवार के 15 सदस्य दशहरे के लिए 4 से 35 फीट ऊंचे रावण के पुतले तैयार कर रहे हैं, जिनकी कीमत 500 से 35 हजार रुपये तक है। राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित आबूरोड के मानपुर इलाके में विजयदशमी पर्व को लेकर तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रावण दहन के लिए इस बार कारीगर बड़े पैमाने पर पुतलों के निर्माण में जुटे हैं। मानपुर में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के करीब 15 सदस्य दिन-रात मेहनत करके दो दर्जन से अधिक छोटे-बड़े पुतलों को आकार दे रहे हैं। पर्व नजदीक आते ही आसपास के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लोग इन पुतलों को देखने और उनकी अग्रिम बुकिंग के लिए पहुंचने लगे हैं। बांस के ढांचे से लेकर वाटरप्रूफ फिनिशिंग तक की कला पुतला निर्माण की यह प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली होती है। कारीगरों के अनुसार सबसे पहले मजबूत बांस की खपच्चियों की सहायता से रावण के शरीर और उसके दस सिरों का कंकाल तैयार किया जाता है। इसके बाद उस ढांचे पर रद्दी अखबारों और विशेष कागजों की कई परतें गोंद की मदद से चढ़ाई जाती हैं, ताकि पुतला मजबूत रहे और हवा के दबाव को झेल सके। कागजी ढांचा सूखने के बाद उस पर चटकीले रंगों और वाटरप्रूफ पेंट से चेहरे के भाव, मुकुट और वस्त्रों की नक्काशी की जाती है। बाजार में हर वर्ग की जरूरत और जेब को ध्यान में रखकर पुतले बनाए जा रहे हैं। सबसे छोटे पुतले की ऊंचाई 4 फीट है, जिसे बच्चे और छोटी सोसायटियां आसानी से खरीद सकती हैं। वहीं सबसे बड़ा पुतला 35 फीट ऊंचा तैयार किया जा रहा है, जिसे बड़े मैदानों और सार्वजनिक आयोजनों में दहन के लिए उपयोग में लाया जाता है। ग्राहकों की मांग और पुतलों के आकार के आधार पर इनकी कीमतें 500 रुपये से लेकर अधिकतम 35,000 रुपये तक तय की गई हैं। कई ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार ऑर्डर देकर विशेष रंग-रूप के पुतले भी बनवा रहे हैं। एक दशक से जारी है कारीगरों की यह पारिवारिक परंपरा क्यारियां जोड़ क्षेत्र की जोगी कॉलोनी के निवासी भंवरलाल और किरण कुमार ने बताया कि उनका परिवार पिछले 10 वर्षों से लगातार बांस की लकड़ियों से रावण के आकर्षक पुतले बनाने का काम कर रहा है। विजयदशमी से करीब दो महीने पहले ही परिवार के सभी 15 लोग इस काम में जुट जाते हैं, जिसमें महिलाएं और बुजुर्ग भी सहयोग करते हैं। यह परिवार केवल मौसमी पुतलों पर ही निर्भर नहीं रहता, बल्कि साल के बाकी महीनों में भी अपनी आजीविका चलाने के लिए बांस की खूबसूरत झोपड़ियां, घरेलू उपयोग की टोकरियां, धार्मिक ध्वज लगाने के लिए डंडे और तरह-तरह की पारंपरिक हस्तशिल्प कलाकृतियां बनाता है। मौसम की अनिश्चितता और सरकारी उपेक्षा का दोहरा संकट इस हुनर के पीछे कारीगरों का भारी जोखिम और आर्थिक दर्द भी छिपा हुआ है। कारीगर भंवरलाल के अनुसार, वे अपनी जीवनभर की जमापूंजी और बाजार से उधार लेकर पुतलों के लिए बांस, कागज, कपड़े और रंग खरीदते हैं। इतनी भारी लागत लगाने के बाद भी उनके सिर पर मौसम की मार का खतरा मंडराता रहता है। पिछले वर्ष का अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि दशहरे के ठीक दिन अचानक मूसलाधार बारिश हो गई थी। खुले आसमान के नीचे रखे अधिकांश पुतले भीगकर नष्ट हो गए, जिससे परिवार को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था और लागत तक नहीं निकल पाई थी। इसके अलावा स्थानीय कारीगरों को प्रशासन या सरकार की ओर से कोई प्रोत्साहन या वित्तीय सुरक्षा नहीं मिलती है। कारीगरों का कहना है कि दूसरे राज्यों में हस्तशिल्पियों के लिए कई सरकारी कल्याणकारी योजनाएं, बीमा और रियायती दरों पर ऋण की व्यवस्था होती है, लेकिन यहां उन्हें कोई बुनियादी सहायता नहीं दी जाती। यदि कोई पुतला बिकने से रह जाए या भीग जाए, तो सारा नुकसान कारीगर को ही अपनी जेब से भरना पड़ता है। इन तमाम चिंताओं के बीच इस बार आसमान साफ रहने की उम्मीद ने कारीगरों का हौसला बढ़ाया है। उन्हें पूरा विश्वास है कि तैयार किए गए सभी 24 से ज्यादा पुतले समय रहते बिक जाएंगे और परिवार को अच्छी आय होगी। इसका आप पर असर यह खबर सीधे तौर पर उन नागरिकों, आवासीय सोसायटियों और स्थानीय उत्सव समितियों को प्रभावित करती है जो विजयदशमी के अवसर पर रावण दहन की योजना बना रहे हैं। • खरीदारों के लिए विकल्प: उत्सव आयोजक अपनी पसंद और बजट के अनुसार 4 फीट से लेकर 35 फीट तक के छोटे-बड़े पुतले चुन सकते हैं। इसके लिए शुरुआती कीमत 500 रुपये रखी गई है, जबकि बड़े सार्वजनिक आयोजनों के लिए अधिकतम दाम 35,000 रुपये है। • आबूरोड और सिरोही में: स्थानीय आयोजकों को अन्य शहरों से महंगे पुतले मंगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि मानपुर में ही दो दर्जन से अधिक पुतले उपलब्ध हैं। ग्राहक समय रहते मानपुर की जोगी कॉलोनी पहुंचकर अपनी मनपसंद डिजाइन का पुतला सीधे कारीगरों से अग्रिम बुक करा सकते हैं। • स्थानीय अर्थव्यवस्था को समर्थन: स्थानीय कारीगरों से सीधे खरीदारी करने पर पारंपरिक हस्तशिल्प और बांस के काम से जुड़े 15 सदस्यों के परिवार को प्रत्यक्ष आर्थिक संबल मिलता है। इससे बिचौलियों का कमीशन बचता है और जरूरतमंद कारीगरों की सालभर की आजीविका सुरक्षित होती है। • मौसम से सुरक्षा: कारीगर इस बार वाटरप्रूफ पेंट का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि हल्की नमी या ओस से पुतलों की चमक खराब न हो। हालांकि यदि भारी बारिश का अंदेशा हो, तो आयोजकों को समय रहते पुतले को तिरपाल से ढकने का अग्रिम प्रबंध करना होगा। ऐसा क्यों हुआ दशहरे के लिए पुतला निर्माण का यह मौसमी कार्य पारंपरिक आस्था, आजीविका की जरूरत और स्थानीय बाजार की मांग के चलते हर साल आयोजित होता है। • पर्व की पारंपरिक मांग: विजयदशमी पर रावण दहन भारतीय लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है, जिसके कारण छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक पुतलों की भारी मांग रहती है। इसी मौसमी जरूरत को पूरा करने के लिए कारीगर परिवार दो महीने पहले से निर्माण शुरू कर देते हैं। • पारिवारिक कौशल और आजीविका: जोगी कॉलोनी का यह परिवार पिछले 10 वर्षों से बांस शिल्प में महारत रखता है। सालभर बांस की टोकरियां और झोपड़ियां बनाने के बाद दशहरे का समय इनके लिए अतिरिक्त नकद आय जुटाने का मुख्य अवसर होता है। • पिछली आपदा से सीख: पिछले वर्ष विजयदशमी के दिन अचानक हुई भारी बारिश ने बने-बनाए पुतले बर्बाद कर दिए थे, जिससे परिवार कर्ज और नुकसान में डूब गया था। इस साल कारीगर मौसम साफ रहने की उम्मीद के साथ नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से अधिक उत्साह से काम कर रहे हैं। सवाल-जवाब 1. आबूरोड में रावण के पुतले कहां बनाए जा रहे हैं? सिरोही जिले के आबूरोड स्थित मानपुर क्षेत्र के क्यारियां जोड़ की जोगी कॉलोनी में कारीगर इन पुतलों का निर्माण कर रहे हैं। 2. तैयार किए जा रहे रावण के पुतलों की ऊंचाई कितनी है? इस बार कारीगरों द्वारा 4 फीट से लेकर 35 फीट तक की ऊंचाई के छोटे-बड़े पुतले बनाए जा रहे हैं। 3. इन पुतलों की शुरुआती और अधिकतम कीमत क्या रखी गई है? पुतलों की कीमत उनके आकार और बनावट के आधार पर 500 रुपये से लेकर अधिकतम 35,000 रुपये तक तय की गई है। 4. पुतला निर्माण में किन मुख्य सामग्रियों का उपयोग किया जाता है? पुतलों का बुनियादी ढांचा बांस की खपच्चियों से बनाया जाता है, जिस पर कागज की परतें चढ़ाकर वाटरप्रूफ रंगों से सजावट की जाती है। 5. यह कारीगर परिवार साल के बाकी महीनों में क्या काम करता है? दशहरे के अलावा यह परिवार पूरे साल बांस की झोपड़ियां, टोकरियां, झंडे लगाने वाली लकड़ियां और हस्तशिल्प कलाकृतियां बनाने का काम करता है। 6. पिछले साल कारीगरों को किस कारण से नुकसान उठाना पड़ा था? पिछले वर्ष दशहरे के दिन अचानक तेज बारिश हो गई थी, जिससे खुले में रखे पुतले भीगकर खराब हो गए और कारीगरों को भारी आर्थिक क्षति हुई। https://trendkia.com/rajasthan/dashahare-ke-lie-abu-road-men-bansa-se-garhe-ja-rahe-35-phita-taka-ke-ravan-15-sadasyon-ka-parivara-dina-rata-juta-48523 TrendKia — Har trend, sabse pehle.