दशहरे पर रावण के बदले जलता है महिषासुर, बिजयनगर के शक्तिपीठ में निभाई जाती है अनोखी रीत राजस्थान के ब्यावर जिले में स्थित श्री बाड़ी माता मंदिर में विजयादशमी पर रावण की जगह 41 फीट ऊंचे महिषासुर के पुतले का दहन करने की 25 साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है। आमतौर पर पूरे देश में विजयादशमी का पर्व रावण के पुतले के दहन के साथ मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान के ब्यावर जिले में एक ऐसा तीर्थ स्थल है जहां यह रवायत बिल्कुल अलग रूप में सामने आती है। बिजयनगर के निकट ब्यावर रोड पर मौजूद विख्यात शक्तिपीठ श्री बाड़ी माता मंदिर में शारदीय यानी आसोज नवरात्रि और दशहरे के पावन मौके पर रावण की जगह दैत्य महिषासुर के पुतले को अग्नि के हवाले किया जाता है। असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक स्वरूप राजस्थान में संभवतः यह पहला और एकमात्र ऐसा धार्मिक स्थल माना जाता है, जहां रावण के बजाय महिषासुर का दहन होता है। इस खास अवसर पर मंदिर परिसर में मां भगवती मर्दिनी के स्वरूप द्वारा 41 फीट ऊंचे विशालकाय महिषासुर के पुतले का सांकेतिक दहन संपन्न किया जाता है। ढाई दशक पहले चुन्नीलाल टांक ने रखी थी इस रीत की नींव श्री बाड़ी माता मंदिर ट्रस्ट से जुड़ी कृष्णा टांक के अनुसार, बाड़ी माता तीर्थ धाम में महिषासुर के पुतला दहन का यह अनूठा आयोजन पिछले 25 वर्षों से लगातार बिना रुके किया जा रहा है। जहां समूचे भारत और राज्य के कोने-कोने में विजयादशमी पर पारंपरिक रावण दहन की धूम रहती है, वहीं बिजयनगर का यह शक्तिपीठ अपनी इस बिल्कुल जुदा परंपरा के चलते देश भर में एक विशिष्ट पहचान बना चुका है। मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं का कहना है कि वर्षों पूर्व बाड़ी माता के अनन्य भक्त चुन्नीलाल टांक (स्मृतिशेष) ने इस अनोखी परंपरा की शुरुआत की थी। उनके द्वारा शुरू की गई यह परिपाटी आज भी उसी गहरी आस्था, श्रद्धा और भव्यता के साथ निभाई जा रही है। पौराणिक कथा और महिषासुर वध का प्रसंग धार्मिक मान्यताओं में इस बात का विस्तार से उल्लेख मिलता है कि महिषासुर एक बेहद क्रूर और उपद्रवी दैत्य था, जिसने चारों तरफ आतंक फैला रखा था। उस अत्याचारी राक्षस का अंत करने के लिए त्रिदेव यानी भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज के साथ ही समस्त देवी-देवताओं ने अपनी-अपनी अलौकिक शक्तियां और अस्त्र-शस्त्र मां भगवती को अर्पित किए थे। इसके उपरांत माता रानी सिंह पर सवार होकर अत्यंत विकराल रूप में प्रकट हुईं और महिषासुर के साथ उनका भयंकर संग्राम हुआ, जिसमें उन्होंने उस दैत्य का संहार कर दिया। इसी पौराणिक विजय गाथा और आद्यशक्ति की शक्ति के स्मरण में यहां महिषासुर दहन किया जाता है। विजयादशमी के इस पावन दिन पर मंदिर प्रांगण में एक विशाल मेले का आयोजन होता है और देवी-देवताओं की मनमोहक झांकियां भी सजाई जाती हैं। 185 फीट ऊंचा भव्य शिखर और सुरक्षा के कड़े इंतजाम श्री बाड़ी माता मंदिर का स्थापत्य भी बेहद भव्य है, जिसके मुख्य शिखर की ऊंचाई 185 फीट है। इस पवित्र धाम में अधिष्ठात्री बाड़ी माता के साथ-साथ भगवान भोलेनाथ, मां लक्ष्मी, धर्मराज, भगवान श्रीकृष्ण और राधा, श्रीराम दरबार, चारभुजानाथ, गंगा मैया, भगवान चित्रगुप्त, सूर्यनारायण, लोकदेवता बाबा रामदेवजी, गायत्री माता तथा शीतला माता सहित अनेक देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं। इस वर्ष भी वार्षिक मेले के साथ-साथ रात्रि में शानदार आतिशबाजी का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया है। धार्मिक उत्सव को शांतिपूर्ण, सुरक्षित और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने के उद्देश्य से बिजयनगर पुलिस थानाधिकारी राजवीर सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। इसका आप पर असर यह अनोखी परंपरा धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के लिहाज से स्थानीय श्रद्धालुओं और देश भर के तीर्थयात्रियों के लिए विशेष महत्व रखती है। • भारत में: देश भर के श्रद्धालुओं को दशहरे के पारंपरिक आयोजनों से अलग एक अनूठा सांस्कृतिक और धार्मिक अनुभव देखने का अवसर मिलता है। जो लोग शक्ति उपासना और देवी परंपराओं में रुचि रखते हैं, वे विजयादशमी पर इस दुर्लभ आयोजन को देखने पहुंच सकते हैं। • ब्यावर और बिजयनगर में: स्थानीय निवासियों और व्यापारियों के लिए यह विशाल मेला और आतिशबाजी उत्सव आर्थिक व सामाजिक उल्लास लेकर आता है। मेले और पुतला दहन के दौरान क्षेत्र में व्यापक पुलिस प्रबंध किए गए हैं, इसलिए आगंतुकों को प्रशासनिक सुरक्षा निर्देशों का पालन करना होगा। • दर्शन और उत्सव व्यवस्था: मंदिर प्रांगण में आने वाले भक्तों को 185 फीट ऊंचे भव्य शिखर वाले धाम में कई देवी-देवताओं के एक साथ दर्शन सुलभ होते हैं। 41 फीट ऊंचे पुतले के दहन और झांकियों के समय भारी भीड़ रहने की संभावना के चलते समय से पहले पहुंचना सुविधाजनक रहेगा। • सांस्कृतिक जागरूकता: यह आयोजन आम लोगों को महिषासुर मर्दिनी की पौराणिक गाथा और आद्यशक्ति की महत्ता से सीधे जोड़ता है। युवा पीढ़ी को यह जानने का अवसर मिलता है कि बुराई पर अच्छाई की विजय को कितने विविध रूपों में मनाया जाता है। ऐसा क्यों हुआ बाड़ी माता तीर्थ में विजयादशमी पर रावण की बजाय महिषासुर का दहन किए जाने के पीछे पौराणिक संदर्भ और एक भक्त की अनूठी पहल जुड़ी हुई है। • पौराणिक कारण: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए त्रिदेवों और अन्य देवी-देवताओं के तेज से मां भगवती प्रकट हुई थीं। देवी ने सिंह पर सवार होकर भीषण संग्राम में महिषासुर का वध किया था, जिसकी स्मृति में यहां शक्ति की विजय मनाई जाती है। • परंपरा की शुरुआत: मंदिर में इस रीत को करीब 25 साल पहले बाड़ी माता के परम भक्त स्वर्गीय चुन्नीलाल टांक ने आरंभ कराया था। उनका उद्देश्य शक्तिपीठ पर मां भगवती द्वारा किए गए असुर संहार के प्रसंग को विजयादशमी के उत्सव से जोड़ना था। • सत्य की विजय का प्रतीक: यद्यपि देश भर में रावण दहन के जरिए असत्य पर सत्य की विजय दिखाई जाती है, लेकिन शक्तिपीठ होने के नाते यहां आद्यशक्ति की अपनी विजय गाथा को प्राथमिकता दी गई। यही कारण है कि पिछले ढाई दशकों से यह परंपरा लगातार निष्ठापूर्वक जारी है। सवाल-जवाब 1. श्री बाड़ी माता मंदिर कहां स्थित है? यह मंदिर राजस्थान के ब्यावर जिले में बिजयनगर के निकट ब्यावर रोड पर स्थित है। 2. विजयादशमी पर यहां किसका पुतला जलाया जाता है? यहां दशहरे के दिन रावण के बजाय 41 फीट ऊंचे महिषासुर के पुतले का सांकेतिक दहन किया जाता है। 3. महिषासुर दहन की यह परंपरा कितने वर्षों से चली आ रही है? यह अनूठी परंपरा पिछले 25 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है। 4. इस अनूठी परंपरा की शुरुआत किसने की थी? इस परंपरा की शुरुआत वर्षों पहले बाड़ी माता के परम भक्त स्वर्गीय चुन्नीलाल टांक ने की थी। 5. मंदिर के मुख्य शिखर की ऊंचाई कितनी है? श्री बाड़ी माता मंदिर के विशाल मुख्य शिखर की ऊंचाई 185 फीट है। 6. सुरक्षा व्यवस्था की कमान किसके पास है? बिजयनगर पुलिस थानाधिकारी राजवीर सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। https://trendkia.com/rajasthan/dashahare-para-ravana-ke-badale-jalata-hai-mahishasura-bijainagar-ke-shaktipitha-men-nibhai-jati-hai-anokhi-rita-49409 TrendKia — Har trend, sabse pehle.