देसी घी की भरपूर चिकनाई से बनी बाड़मेर की बेसन मिठाई, अजीब नाम के पीछे छिपा है दिलचस्प किस्सा राजस्थान के बाड़मेर में जोधपुर मिष्टान्न भंडार की खास बेसन बर्फी अपने अनूठे नाम और देसी घी के शानदार स्वाद की वजह से दूर-दूर तक पहचानी जाती है। राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, अनूठे पहनावे और लोक कलाओं की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन यहां का पारंपरिक खान-पान भी अपनी एक अलग धमक रखता है। इसी सरहदी इलाके में एक ऐसी पारंपरिक मिठाई तैयार की जाती है, जिसका उच्चारण सुनकर पहली बार आने वाले लोग असमंजस में पड़ जाते हैं। स्थानीय बाजार में स्थित जोधपुर मिष्टान्न भंडार पर मिलने वाली यह मशहूर बेसन की चक्की अपने विचित्र नाम के साथ-साथ अपने लाजवाब स्वाद के लिए पूरे पश्चिमी राजस्थान में खास मुकाम रखती है। ग्राहक शुरुआत में भले ही इसका नाम लेने में संकोच करें, पर एक बार इसका टुकड़ा मुंह में घुलते ही सारी झिझक गायब हो जाती है। अनूठे नाम को लेकर क्यों झिझकते हैं सैलानी बाड़मेर घूमने आने वाले पर्यटकों या बाहरी खरीदारों के लिए इस मिठाई का नाम अक्सर कौतूहल और हैरानी का कारण बनता है। पहली मर्तबा जब कोई इसका नाम सुनता है, तो उसे लगता है कि शायद कोई अपशब्द या गाली बोली गई है। इसी गलतफहमी की वजह से कई लोग काउंटर पर खड़े होकर इस मिष्ठान्न का नाम पुकारने में शर्म महसूस करते हैं। दूसरी तरफ, स्थानीय निवासियों के बीच इस मिठाई की प्रतिष्ठा बेहद मजबूत है। बेसन, मावा और मीठे के संतुलित मेल से बनी यह बर्फी स्वाद के मामले में पश्चिमी राजस्थान की कई नामी और महंगी मिठाइयों को सीधी टक्कर देती है। जो व्यक्ति एक बार इसका स्वाद चख लेता है, वह नाम के संकोच को भूलकर बार-बार इसी की फरमाइश करता है। मारवाड़ी बोली से जुड़ा है इस नाम का इतिहास इस बेहद लजीज मिष्ठान्न के ऐसे असामान्य नामकरण के पीछे की कहानी काफी व्यावहारिक और क्षेत्रीय भाषा से जुड़ी है। इस चक्की को तैयार करते समय शुद्ध देसी घी का इतना प्रचुर इस्तेमाल होता है कि मिठाई के हर एक टुकड़े से घी लगातार टपकता रहता है। जब कोई इसे हाथ से उठाता है, तो उंगलियों पर घी की मोटी परत और चिकनाहट चिपक जाती है। ठेठ मारवाड़ी भाषा में घी या तेल के इस भारी चिपचिपेपन और चिकनाई को ‘चिंगट’ कहा जाता है। इसी ‘चिंगट’ शब्द के आधार पर शुरुआत में लोगों ने इसे ‘चिंगटी चक्की’ कहना शुरू किया था। समय बीतने के साथ आम बोलचाल के लहजे में यह शब्द बदलकर पहले ‘चुंटिया’ और फिर धीरे-धीरे ‘चुटिया चक्की’ के रूप में मशहूर हो गया। साफ है कि इस नाम का किसी भी तरह के अपशब्द से कोई वास्ता नहीं है, बल्कि यह केवल घी के भारी रिसाव और चिकनाई की पहचान है। दो घंटे की धीमी आंच पर तैयार होता है शाही मिश्रण इस पारंपरिक मिठाई को बनाने का तरीका काफी संयम और मेहनत की मांग करता है। जोधपुर मिष्टान्न भंडार के कमल सिंघल के अनुसार, इस पूरी चक्की को तैयार करने में लगभग दो घंटे का समय लग जाता है। इसके लिए शुद्ध देसी घी, बारीक बेसन, फीका मावा और शक्कर को मुख्य सामग्री के रूप में उपयोग में लाया जाता है। सबसे पहले एक बड़ी कड़ाही में शुद्ध घी डालकर बेसन को धीमी आंच पर चढ़ाया जाता है। हलवाई इसे बिना रुके लगातार करछी से चलाते रहते हैं ताकि बेसन तली में न चिपके और एक समान रूप से भुन सके। जब बेसन पूरी तरह पक जाता है और रसोई में उसकी सोंधी महक फैलने लगती है, तब उसमें फीका मावा और शक्कर का सही अनुपात मिलाया जाता है। घी की तरी और चांदी के वर्क से निखरता है रूप कड़ाही में मिश्रण के अच्छी तरह एकसार हो जाने के बाद उसे थाल में निकालकर ठंडा होने के लिए रखा जाता है। जब यह जम जाता है, तब इसे सलीके से चौकोर बर्फी यानी चक्की के आकार में काट लिया जाता है। तैयार होने पर मिठाई की बनावट ऐसी नजर आती है मानो वह शुद्ध देसी घी में तैर रही हो। इसकी बनावट को आकर्षक बनाने के लिए इसके ऊपर बारीक चांदी का वर्क भी लगाया जाता है। आम बोलचाल में भले ही इसे बेसन की चक्की कहा जाए, लेकिन इसका तरबतर रूप और अनूठी मारवाड़ी पहचान इसे हर मिठाई प्रेमी की पहली पसंद बना देती है। इसका आप पर असर यह पारंपरिक मिठाई राजस्थान की समृद्ध पाक कला और स्थानीय भाषा के अनोखे मेल को दर्शाती है, जिसे चखने के लिए सैलानी बाड़मेर का रुख करते हैं। • पर्यटकों और मिठाई प्रेमियों के लिए: बाड़मेर यात्रा के दौरान सैलानी इस अनूठी और घी से भरपूर स्थानीय बर्फी का प्रामाणिक स्वाद ले सकते हैं। दुकान पर बिना किसी झिझक के इस मारवाड़ी जायके का लुत्फ उठाया जा सकता है। • पारंपरिक कारीगरी के लिए: धीमी आंच पर दो घंटे तक भूनने की पारंपरिक तकनीक आधुनिक समय में भी पुरानी पाक विधियों को जीवित रखे हुए है। इससे स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक हलवाइयों के काम को सम्मान मिलता है। • भाषा और संस्कृति की समझ: यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे एक क्षेत्रीय मारवाड़ी शब्द समय के साथ बदल गया। इससे बाहरी लोगों को स्थानीय भाषा और बोलियों के सही संदर्भ को समझने में मदद मिलती है। • खान-पान के शौकीनों के लिए: बिना किसी मिलावट के शुद्ध घी और मावे से बनी मिठाइयों की तलाश करने वालों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है। इसे यात्रा के दौरान स्मृति या उपहार के तौर पर भी खरीदा जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ इस मिठाई का विचित्र नाम पड़ने और इसके खास स्वाद के पीछे पारंपरिक पाक विधि और स्थानीय मारवाड़ी बोली की सीधी भूमिका रही है। • देसी घी की अत्यधिक मात्रा: मिठाई के हर टुकड़े से शुद्ध देसी घी लगातार रिसता रहता है, जिससे हाथ पूरी तरह चिकने हो जाते हैं। स्थानीय मारवाड़ी भाषा में घी और तेल की इस अत्यधिक चिकनाहट को 'चिंगट' कहा जाता है। • बोलचाल में शब्द का क्रमिक बदलाव: 'चिंगट' की वजह से दुकानदारों और ग्राहकों ने इसे पहले 'चिंगटी चक्की' कहना शुरू किया था। समय के साथ स्थानीय बोली के उच्चारण में बदलाव आया और यह शब्द पहले 'चुंटिया' तथा बाद में 'चुटिया चक्की' बन गया। • धीमी आंच पर पारंपरिक तैयारी: हलवाई बेसन को धीमी आंच पर करीब दो घंटे तक लगातार भूनते हैं ताकि सोंधापन आ सके। इसके बाद फीका मावा और शक्कर मिलाकर इसे थाल में जमाया जाता है। • चांदी के वर्क से सजावट: स्वाद के साथ-साथ मिठाई को राजसी रूप देने के लिए उस पर चांदी का अर्क या वर्क लगाया जाता है। यही संयोजन इसे पश्चिमी राजस्थान में बेहद लोकप्रिय बनाए हुए है। सवाल-जवाब 1. बाड़मेर में यह खास चक्की किस दुकान पर तैयार की जाती है? यह प्रसिद्ध बेसन चक्की बाड़मेर स्थित जोधपुर मिष्टान्न भंडार पर बनाई और बेची जाती है। 2. इस मिठाई का नाम 'चुटिया चक्की' कैसे पड़ा? देसी घी के रिसाव और चिकनाई को मारवाड़ी में 'चिंगट' कहा जाता है, जिससे बिगड़कर पहले इसका नाम 'चिंगटी' और बाद में 'चुटिया चक्की' पड़ा। 3. इस चक्की को बनाने में किन मुख्य सामग्रियों का इस्तेमाल होता है? इसे तैयार करने के लिए मुख्य रूप से बेसन, शुद्ध देसी घी, फीका मावा और शक्कर का प्रयोग किया जाता है। 4. जोधपुर मिष्टान्न भंडार के अनुसार इसे पकाने में कितना समय लगता है? दुकान के कमल सिंघल के मुताबिक, बेसन को भूनने और पूरी सामग्री तैयार करने में लगभग दो घंटे का समय लगता है। 5. मिठाई की सुंदरता बढ़ाने के लिए इस पर क्या लगाया जाता है? चक्की को आकर्षक और शाही रूप देने के लिए इसके ऊपर चांदी का वर्क (अर्क) लगाया जाता है। https://trendkia.com/rajasthan/desi-ghi-ki-bharapura-chikanai-se-bani-barmer-ki-besana-mithai-ajiba-nama-ke-pichhe-chhipa-hai-dilachaspa-kissa-41713 TrendKia — Har trend, sabse pehle.