डेयरी पशुओं पर मानसून में तीन दिवसीय एफिमिरल फीवर का साया, जानिए कैसे बचाएं अपनी गाय और भैंस बरसात के मौसम में मच्छरों और मक्खियों के बढ़ने से गाय-भैंसों में तीन दिवसीय बुखार का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। बरसात का मौसम शुरू होते ही पशुपालकों के सामने अपने मवेशियों की सेहत को लेकर कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। इस मौसम में गाय और भैंसों में बार-बार बुखार, शरीर में अकड़न और लंगड़ाहट जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। दरअसल, यह तीन दिवसीय बुखार यानी एफिमिरल फीवर के लक्षण हो सकते हैं, जो मवेशियों में फैलने वाली एक बेहद आम वायरल बीमारी है। यह बीमारी खासतौर पर बारिश और उसके तुरंत बाद के उमस भरे मौसम में तेजी से फैलती है। इस अवधि में वातावरण में मक्खियों और मच्छरों की आबादी काफी बढ़ जाती है, जिससे संक्रमण के फैलने की रफ्तार दोगुनी हो जाती है। हालांकि, उचित देखभाल और सही समय पर इलाज मिलने से पशु आमतौर पर तीन दिन के भीतर पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। वायरस का संक्रमण और इसके फैलने का मुख्य कारण एफिमिरल फीवर एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो एक विशेष प्रकार के RNA वायरस के कारण होती है। राहत की बात यह है कि यह बीमारी सीधे संपर्क में आने से यानी एक मवेशी से दूसरे मवेशी में नहीं फैलती है। इस वायरस को एक शरीर से दूसरे शरीर तक पहुंचाने में खून चूसने वाले मच्छरों और मक्खियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब भी कोई संक्रमित मक्खी या मच्छर किसी स्वस्थ गाय या भैंस को काटता है, तो यह वायरस उस स्वस्थ पशु के रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाता है। बारिश के दिनों में जलजमाव के कारण इन कीड़े-मकोड़ों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होती है, जिसके चलते पशुओं के संक्रमित होने का जोखिम चरम पर पहुंच जाता है। रोग के प्रमुख लक्षण और शारीरिक तापमान में बढ़ोतरी इस बीमारी का सबसे पहला और स्पष्ट संकेत मवेशी के शरीर का तापमान अचानक से बहुत तेज हो जाना है। संक्रमण के दौरान पशु के शरीर का तापमान लगभग 104 से लेकर 107 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच सकता है। यह तेज बुखार आम तौर पर 24 से 48 घंटों तक बना रहता है और इसके बाद धीरे-धीरे शरीर का तापमान सामान्य होने लगता है। तापमान के इसी उतार-चढ़ाव वाले चक्र के कारण ही इस बीमारी को स्थानीय स्तर पर तीन दिवसीय बुखार कहा जाता है। इसके अलावा, बुखार के कारण पशुओं के जोड़ों में तेज दर्द और सूजन आ जाती है, जिससे उन्हें खड़े होने या चलने-फिरने में भारी कठिनाई होती है और वे स्पष्ट रूप से लंगड़ाने लगते हैं। दूध उत्पादन पर असर और मवेशियों में सुस्ती संक्रमण के प्रभाव से मवेशी पूरी तरह से सुस्त और बेजान नजर आने लगते हैं। वे सामान्य रूप से चारा खाना छोड़ देते हैं और उनकी जुगाली करने की प्रक्रिया भी या तो बहुत धीमी हो जाती है या पूरी तरह बंद हो जाती है। दुधारू पशुओं के मामले में यह बीमारी पशुपालकों को सीधा आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, क्योंकि पीड़ित गाय या भैंस का दूध उत्पादन अचानक से बेहद कम हो जाता है या कुछ दिनों के लिए पूरी तरह से रुक जाता है। इसके साथ ही, बीमार पशु की नाक और आंखों से लगातार पानी या हल्का बलगम बहने लगता है। बीमारी के शुरुआती चरणों में कई पशुओं को कब्ज की शिकायत भी हो सकती है। बीमार मवेशी की देखभाल और प्राथमिक उपचार जैसे ही पशु में इस तरह के लक्षण दिखाई दें, पशुपालकों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। सबसे पहले पीड़ित पशु को किसी भी फिसलन वाले कंक्रीट के फर्श से हटाकर साफ, सूखी और खुली हवादार जगह पर स्थानांतरित करना चाहिए, ताकि वहां मक्खियों और मच्छरों का प्रकोप कम हो सके। संक्रमित गाय या भैंस को आसानी से पचने वाला ताजा हरा चारा और स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पशुपालकों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वे बुखार, दर्द या जोड़ों की सूजन के लिए खुद से कोई दवा न दें। ऐसी स्थिति में तुरंत अपने नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। बचाव के उपाय और रोकथाम की रणनीतियां इस नुकसानदेह बीमारी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका सही समय पर सावधानी बरतना है। पशुपालकों को मानसून की बारिश शुरू होने से ठीक पहले पशु चिकित्सक की सलाह लेकर अपने सभी मवेशियों को एफिमिरल फीवर का सुरक्षात्मक टीका जरूर लगवाना चाहिए। इसके अलावा, मवेशियों के रहने के स्थान यानी पशुशाला और उसके आसपास के वातावरण में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। बाड़े के आसपास कहीं भी गंदा पानी जमा न होने दें, क्योंकि यही पानी मच्छरों के पनपने का मुख्य जरिया बनता है। मच्छरों और मक्खियों की रोकथाम के लिए सुरक्षित कीटनाशकों या जालीदार दरवाजों का उपयोग करें, जिससे पशुओं को इस पीड़ादायक संक्रमण से बचाया जा सके और पशुपालकों को किसी भी प्रकार की आर्थिक हानि से सुरक्षित रखा जा सके। इसका आप पर असर यह जानकारी पशुपालकों को मानसून के दौरान अपने मवेशियों को वायरल संक्रमण से बचाने और दूध उत्पादन में होने वाली भारी गिरावट से आर्थिक नुकसान को रोकने में मदद करती है। • दूध उत्पादन की सुरक्षा: समय पर इलाज और मक्खी-मच्छरों पर नियंत्रण से दूध उत्पादन में होने वाली अचानक गिरावट को रोका जा सकता है। इससे पशुपालकों की दैनिक आय सुरक्षित रहती है और बाजार में दूध की आपूर्ति बाधित नहीं होती है। • पशु चिकित्सा खर्च में कमी: बारिश का मौसम शुरू होने से पहले टीकाकरण कराने से गंभीर संक्रमण का खतरा बेहद कम हो जाता है। इससे पशुपालकों को बाद में महंगी दवाओं और आपातकालीन डॉक्टर की फीस पर होने वाले खर्च से राहत मिलती है। • पशुशाला की स्वच्छता: बाड़े को सूखा और हवादार रखने से बुखार से पीड़ित मवेशियों को फिसलने और चोट लगने का डर नहीं रहता। इसके साथ ही मवेशियों के आसपास बीमारी फैलाने वाले मच्छरों और मक्खियों का पनपना भी बंद हो जाता है। • मवेशियों का स्वास्थ्य सुधार: बीमार पशुओं को समय पर अलग और आरामदायक स्थान पर रखने से उनके जोड़ों के दर्द और शारीरिक कमजोरी में राहत मिलती है। इससे मवेशी जल्द ठीक होते हैं और तीन दिनों के भीतर दोबारा सामान्य रूप से चारा खाना शुरू कर देते हैं। ऐसा क्यों हुआ इस मौसम में मवेशियों में एफिमिरल फीवर का फैलना मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन और जैविक संचरण चक्र के कारण होता है। मानसून के दौरान पर्यावरणीय परिस्थितियां इन वायरसवाहक कीटों के तेजी से पनपने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करती हैं। • वायरल रोगज़नक़: यह बीमारी एक विशेष प्रकार के RNA वायरस के कारण होती है जो मवेशियों के रक्तप्रवाह और जोड़ों को प्रभावित करता है। हालांकि यह वायरस शरीर में तीव्र सूजन और तेज बुखार पैदा करता है, लेकिन यह एक मवेशी से दूसरे मवेशी में सीधे संपर्क से नहीं फैलता है। • कीटों की आबादी में वृद्धि: मानसून की भारी बारिश और उसके बाद होने वाले जलभराव से मच्छरों और मक्खियों को अंडे देने के लिए अनुकूल जगह मिलती है। ये कीट इस वायरस के मुख्य वाहक हैं, इसलिए इनकी संख्या बढ़ते ही संक्रमण का प्रसार बहुत तेजी से होने लगता है। • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता: बारिश के दिनों में बाड़ों में रहने वाली नमी और उमस के कारण मवेशियों की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। इसके साथ ही अस्वच्छ और फिसलन भरे फर्श के कारण बीमार पशुओं का शारीरिक तनाव और जोड़ों की अकड़न और अधिक बढ़ जाती है। सवाल-जवाब 1. गाय और भैंसों में एफिमिरल फीवर का क्या कारण है? यह एक RNA वायरस के कारण होता है जो खून चूसने वाले मच्छरों और मक्खियों के काटने से पशुओं में फैलता है। 2. क्या एफिमिरल फीवर सीधे एक बीमार पशु से दूसरे स्वस्थ पशु में फैल सकता है? नहीं, यह बीमारी सीधे संपर्क से नहीं फैलती है और इसके प्रसार के लिए मच्छर या मक्खी का काटना जरूरी होता है। 3. इस बीमारी को आम तौर पर तीन दिवसीय बुखार क्यों कहा जाता है? इसमें पशु को आने वाला तेज बुखार आमतौर पर 24 से 48 घंटे तक रहता है और उचित देखभाल से पशु तीन दिन में ठीक हो जाता है। 4. मवेशियों में एफिमिरल फीवर के मुख्य लक्षण क्या हैं? इसके मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार (104 से 107 डिग्री फॉरेनहाइट), जोड़ों में दर्द, सूजन, लंगड़ाहट, सुस्ती और दूध उत्पादन में कमी शामिल हैं। 5. पशुपालक अपने मवेशियों को इस संक्रमण से कैसे बचा सकते हैं? पशुपालकों को मानसून से पहले मवेशियों का टीकाकरण कराना चाहिए, बाड़े में सफाई रखनी चाहिए और जलजमाव को रोककर मच्छरों पर नियंत्रण पाना चाहिए। https://trendkia.com/rajasthan/deyari-pashuon-para-manasuna-men-tina-divasiya-ephemeral-fever-ka-saya-janie-kaise-bachaen-apani-gaya-aura-bhainsa-33241 TrendKia — Har trend, sabse pehle.