धौलपुर के ग्रामीण इलाकों में वरदान बनी सरपत्ता घास, पशु चारे से लेकर स्वरोजगार तक का जरिया धौलपुर में खेतों की मेड़ों और नदी-नालों के किनारे उगने वाली सरपत्ता घास पशुओं के लिए पौष्टिक चारे, पारंपरिक छप्पर और रोजगार का एक मजबूत साधन बनकर उभरी है। धौलपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों की मेड़ों, रास्तों के किनारे, नदी-नालों और जलभराव वाले स्थानों पर प्राकृतिक रूप से उगने वाली सरपट या सरपत्ता घास को सामान्य तौर पर लोग एक साधारण खरपतवार मान लेते हैं। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह वनस्पति आज भी किसी अमूल्य निधि से कम नहीं है। ग्रामीण इलाकों में इस हरी घास का इस्तेमाल केवल पशुओं के चारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मजबूत रस्सियां, झाड़ू और घरों के छप्पर बनाने जैसे ढेरों जरूरी काम निपटाए जाते हैं। धौलपुर की स्थानीय बोलचाल में इस विशेष घास को सरपत्ता या सरपत्तो के नाम से पुकारा जाता है। स्थानीय निवासी विशंभर दयाल शर्मा के अनुसार, यह एक बेहद टिकाऊ और मजबूत हरी घास होती है, जो मुख्य रूप से उन जगहों पर बहुतायत में पनपती है जहां पानी की उपलब्धता अधिक होती है। सरपत्ता घास की शारीरिक संरचना और पशु आहार के रूप में महत्व इस वनस्पति की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती और तेजी से बढ़ने की क्षमता है। सरपत्ता घास अमूमन सात से आठ फीट तक की लंबाई हासिल कर लेती है। इसकी जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं और बेहद मजबूत होती हैं, जिसके कारण एक बार स्थापित होने के बाद यह घास बहुत कम समय में अपने आसपास के पूरे इलाके में फैल जाती है। जब यह घास पूरी तरह हरी और ताजी होती है, तब किसान इसे काटकर चरी, कासनी और बरसी जैसे पारंपरिक पशु चारे के साथ मिलाकर अपने मवेशियों को खिलाते हैं। इस प्रकार यह घास पशुपालकों के लिए चारे के एक बड़े और सस्ते विकल्प के रूप में काम आती है, जिससे मवेशियों को पौष्टिक और हरा चारा आसानी से मिल जाता है। आज भी गांव के कई पशुपालक इस घास पर निर्भर हैं। पारंपरिक आवासों का निर्माण और ऐतिहासिक उपयोग ग्रामीण जीवन में इस घास का उपयोग दशकों पुराना है। विशंभर दयाल शर्मा बताते हैं कि करीब सत्तर साल पहले गांवों में पक्के मकान नहीं हुआ करते थे, तब कच्चे घरों की छतों को ढकने के लिए इसी सरपत्ता घास का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता था। इस घास से बनाई जाने वाली झोपड़ियां और छप्पर बेहद कारगर होते थे, जो भीषण गर्मी के दिनों में घरों को ठंडा रखते थे और मूसलाधार बारिश के पानी को भी अंदर आने से रोकते थे। हालांकि वर्तमान समय में गांवों में भी पक्के और कंक्रीट के मकान बनाने का चलन काफी ज्यादा बढ़ गया है, लेकिन इसके बावजूद कई दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग आज भी छप्पर बनाने के लिए इस पारंपरिक घास का सहारा लेते हैं। घरेलू उपयोग, झाड़ू निर्माण और महिलाओं की आय घर की छतों के अलावा, सरपत्ता घास का उपयोग घरेलू स्तर पर कई उपयोगी वस्तुएं बनाने में किया जाता है। जब यह घास सूख जाती है, तो स्थानीय महिलाएं इसे इकट्ठा करके बेहद मजबूत झाड़ू तैयार करती हैं। इन झाड़ूओं का उपयोग ग्रामीण घरों में साफ-सफाई के लिए तो होता ही है, साथ ही कई महिलाएं इन्हें व्यावसायिक रूप से तैयार कर बाजार में बेचती हैं। इससे उन्हें घर बैठे अतिरिक्त आमदनी का एक अच्छा जरिया मिल जाता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। रस्सी निर्माण, बाजार मूल्य और पर्यावरण को लाभ इस घास की उपयोगिता यहीं खत्म नहीं होती। सूखे हुए सरपत्ते से बेहद मजबूत रस्सियां भी बनाई जाती हैं। इन रस्सियों का इस्तेमाल पशुओं को खूंटे से बांधने, खेतों में फसलों को सहारा देने और घरों में सोने वाली खाट यानी चारपाई बुनने के लिए किया जाता है। बाजार में इसके आर्थिक मूल्य की बात करें तो सूखने के बाद इस सरपत्ता घास के एक बंडल की कीमत पंद्रह से बीस रुपये तक मिल जाती है। यही कारण है कि यह घास ग्रामीण जीवन और वहां की अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। यदि इस प्राकृतिक संसाधन का व्यवस्थित तरीके से संरक्षण किया जाए, तो यह गांवों में रोजगार के नए द्वार खोल सकता है। इसके अलावा, यह घास पर्यावरण के अनुकूल है और अपनी मजबूत जड़ों के कारण नदियों और नालों के किनारों पर मिट्टी के कटाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार, कम लागत में मिलने वाली यह वनस्पति केवल एक बेकार घास नहीं, बल्कि गांवों की वास्तविक और उपयोगी प्राकृतिक संपत्ति है। इसका आप पर असर • भारत में: देश के ग्रामीण इलाकों में पाई जाने वाली स्थानीय प्राकृतिक वनस्पतियों के संरक्षण से ग्रामीण आजीविका को बेहतर बनाने और मिट्टी के कटाव को रोकने के रास्ते खुल सकते हैं। • धौलपुर में: धौलपुर जिले के ग्रामीणों के लिए सरपत्ता घास का व्यावसायिक उपयोग जैसे झाड़ू और रस्सी बनाना, स्वरोजगार तथा अतिरिक्त आय का एक सुलभ साधन बना रहेगा। सवाल-जवाब 1. सरपत्ता घास क्या है और यह धौलपुर में कहां उगती है? सरपत्ता, जिसे स्थानीय भाषा में सरपट भी कहा जाता है, एक मजबूत और लंबी हरी घास है जो धौलपुर में खेतों की मेड़ों, सड़कों के किनारे और नदी-नालों के पास प्राकृतिक रूप से उगती है। 2. सरपत्ता घास का उपयोग पशु चारे के रूप में कैसे किया जाता है? जब यह घास हरी होती है, तब इसे काटकर चरी, कासनी और बरसी जैसे पारंपरिक चारे के साथ मिलाकर पशुओं को खिलाया जाता है। 3. ग्रामीण सूखे हुए सरपत्ते से कौन-सी चीजें बनाते हैं? ग्रामीण सूखे सरपत्ते का उपयोग मवेशियों को बांधने और खाट बुनने के लिए मजबूत रस्सियां बनाने तथा घर की सफाई के लिए टिकाऊ झाड़ू बनाने में करते हैं। 4. सूखे सरपत्ता घास के एक बंडल की बाजार में क्या कीमत है? स्थानीय बाजारों में सूखे सरपत्ता घास का एक बंडल करीब 15 से 20 रुपये में बिकता है। 5. सरपत्ता घास से पर्यावरण को क्या फायदा होता है? अपनी बेहद मजबूत और गहरी जड़ों के कारण सरपत्ता घास मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करती है, खासकर नदी और नालों के किनारों पर। https://trendkia.com/rajasthan/dholpur-ke-gramina-ilakon-men-varadana-bani-sarpatta-ghasa-pashu-chare-se-lekara-svarojagara-taka-ka-jariya-10510 TrendKia — Har trend, sabse pehle.