धौलपुर में चंबल नदी के रेतीले टापुओं पर फिर लौटे दुर्लभ इंडियन स्कीमर पक्षी वैश्विक स्तर पर 2 हजार से कम बची आबादी वाले इंडियन स्कीमर धौलपुर में चंबल नदी पर लौट आए हैं, जहां वन विभाग ने उनके घोंसलों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम शुरू किए हैं। धौलपुर जिले से होकर बहने वाली चंबल नदी के रेतीले टापुओं पर संकटग्रस्त प्रजाति के इंडियन स्कीमर पक्षियों का नया जत्था पहुंच गया है। मॉनसून की शुरुआत पर जून महीने में इस इलाके से विदा हुए ये दुर्लभ परिंदे आमतौर पर अक्टूबर अथवा नवंबर के पहले हफ्ते तक वापस आते हैं। इस मौसम में नदी के शांत जलप्रवाह और बीच में उभरे टापुओं पर इनका बसेरा दोबारा सजने लगा है, जिससे शीतकालीन चंबल सफारी पर आने वाले सैलानियों को इस अनोखे जलीय शिकारी के दीदार का मौका मिल रहा है। स्थानीय बोली में पनचीरा पुकारे जाने वाले और चंबल के मोती के उपनाम से प्रसिद्ध ये पक्षी उड़ान के दौरान अपनी खास चोंच से पानी की ऊपरी सतह को चीरते हुए छोटी मछलियों को पकड़ते हैं। वैश्विक आबादी का बड़ा हिस्सा चंबल के भरोसे पूरी दुनिया में इंडियन स्कीमर की कुल तादाद अब 2 हजार से भी नीचे सिमट गई है। इस अत्यंत सीमित आबादी के चलते चंबल नदी का जलीय तंत्र इनके अस्तित्व के लिए सबसे अहम शरणगाह साबित हो रहा है। पूरी दुनिया में जितने भी इंडियन स्कीमर जीवित हैं, उनमें से लगभग 80 फीसदी परिंदे हर साल अपने वार्षिक प्रवास के तहत चंबल के किनारों पर डेरा जमाते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासी यह पक्षी भारत के अलावा पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में भी कुछ जगहों पर पाए जाते हैं। इनकी लगातार कम होती संख्या के कारण ही इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने इस पक्षी को अपनी रेड लिस्ट में दर्ज किया हुआ है। वन्यजीव विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी मिलकर इनके बचाव के लिए कई स्तरों पर प्रयास कर रहे हैं। प्रजनन के तौर तरीके और प्राकृतिक खतरे पक्षी प्रेमी राजीव तोमर के अनुसार इंडियन स्कीमर नदियों के बीच बने एकांत रेतीले टापुओं पर अपने घोंसले तैयार करते हैं और वहीं अंडे देते हैं। इनका प्रजनन काल मार्च से शुरू होकर जून तक चलता है। चंबल नदी का स्वच्छ प्रवाह और उसमें भरपूर मात्रा में उपलब्ध छोटी मछलियां इन परिंदों को हर साल यहां खींच लाती हैं। हालांकि इनकी रिहाइश पूरी तरह खतरों से मुक्त नहीं रही है। नदी के पर्यावरण में हो रहे बदलाव, गैरकानूनी खनन, टापुओं पर आवारा कुत्तों का आतंक और जंगली जानवरों की आवाजाही इनके अंडों तथा घोंसलों को अक्सर भारी नुकसान पहुंचाती रही है। खनन पर रोक और वन विभाग के सुरक्षा इंतजाम इस मर्तबा चंबल में अवैध बजरी खनन पर लगी सख्त रोक से इन प्रवासी पक्षियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। टापुओं पर मशीनों के शोर और इंसानी दखलंदाजी में कमी आने से पक्षी सुरक्षित माहौल में रह सकेंगे। चंबल सेंचुरी के डीएफओ विष्णु पाटिल तेजस ने स्पष्ट किया है कि नदी के उथले रेतीले द्वीप इन परिंदों के लिए सबसे अनुकूल ठिकाने हैं। पिछले वर्ष विभाग ने टापुओं के चारों तरफ तारबंदी और मजबूत फेंसिंग लगाकर अंडों को नष्ट होने से बचाया था, जिसके चलते काफी तादाद में चूजों ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी थी। धौलपुर जिले के राजघाट, अंडवा पुरैनी, डांग बसई और मौरौली जैसे संवेदनशील इलाकों में इन पक्षियों की निगरानी लगातार जारी है और नए प्रजनन चक्र को सुरक्षित बनाने के लिए वन विभाग ने कमर कस ली है। इसका आप पर असर इंडियन स्कीमर की सुरक्षित वापसी चंबल नदी के जल और पर्यावरण की सेहत सुधरने का सीधा प्रमाण है। • भारत में: देश में जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण पर्यटन को इससे बड़ा बढ़ावा मिलता है। देशभर के पक्षी प्रेमी और पर्यावरणविद चंबल में इस दुर्लभ पक्षी की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं। • धौलपुर में: चंबल सफारी पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी जिससे स्थानीय गाइड और नाविकों की आमदनी बढ़ेगी। अवैध खनन पर लगी रोक से स्थानीय जलस्रोतों का संरक्षण होगा और कटाव की समस्या कम होगी। • पर्यटकों के लिए: नवंबर से शुरू होकर गर्मियों तक सफारी के दौरान इन दुर्लभ पक्षियों को प्राकृतिक रूप से शिकार करते देखने का मौका मिलेगा। बर्ड वॉचर्स को राजघाट और मौरौली के पास शांत तटों पर फोटोग्राफी के बेहतरीन अवसर मिलेंगे। • पर्यावरण संरक्षण में: नदी के टापुओं की सुरक्षा से चंबल के समूचे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलन मिलेगा। घोंसलों की सुरक्षा के लिए की जाने वाली तारबंदी से अन्य जलीय जीवों और अंडों को भी प्राकृतिक संरक्षण हासिल होगा। ऐसा क्यों हुआ चंबल नदी का शांत प्रवाह, प्रचुर जलीय आहार और मानवीय दखल में कमी पक्षियों को सुरक्षित प्रजनन के लिए यहां खींच लाती है। • मौसमी प्रवास चक्र: मॉनसून के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर ये पक्षी सुरक्षित इलाकों की ओर चले जाते हैं। अक्टूबर-नवंबर में जलस्तर कम होने और रेतीले टापू बाहर आने पर वे घोंसले बनाने लौटते हैं। • खनन गतिविधियों पर रोक: नदी क्षेत्र में अवैध बजरी खनन थमने से रेतीले टापुओं पर शांति बहाल हुई है। इंसानी गतिविधियों और भारी वाहनों का शोर खत्म होने से परिंदों को घोंसले बनाने के लिए सुरक्षित माहौल मिला है। • भोजन और स्वच्छ जल की उपलब्धता: चंबल का साफ पानी और उसमें मौजूद छोटी मछलियां इंडियन स्कीमर के भोजन की प्राथमिक जरूरत हैं। अपनी विशिष्ट चोंच की बनावट के कारण वे इसी तरह के उथले और साफ पानी में शिकार कर पाते हैं। • विभागीय सुरक्षा उपाय: वन विभाग द्वारा टापुओं की फेंसिंग और कड़े पहरे के कारण पिछले वर्ष अंडों और चूजों को नुकसान नहीं हुआ था। इसी सुरक्षित इतिहास के चलते पक्षी बार-बार इसी नदी घाटी का रुख करते हैं। सवाल-जवाब 1. इंडियन स्कीमर को स्थानीय भाषा में किस नाम से जाना जाता है? स्थानीय लोग इसे पनचीरा कहते हैं, जबकि इसे चंबल का मोती भी कहा जाता है। 2. दुनियाभर में इंडियन स्कीमर की अनुमानित संख्या कितनी है? विश्व स्तर पर इस दुर्लभ पक्षी की कुल आबादी 2 हजार से भी कम बची है। 3. इंडियन स्कीमर का प्रजनन काल कब से कब तक रहता है? इन पक्षियों का प्रजनन काल मार्च से शुरू होकर जून महीने तक चलता है। 4. चंबल नदी में इन पक्षियों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? वन विभाग ने संवेदनशील टापुओं पर फेंसिंग लगाई है और राजघाट तथा मौरौली जैसे क्षेत्रों में विशेष निगरानी शुरू की है। 5. इंडियन स्कीमर भारत के अलावा किन देशों में पाया जाता है? यह पक्षी पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों में भी पाया जाता है। https://trendkia.com/rajasthan/dholpur-men-chambal-nadi-ke-retile-tapuon-para-phira-laute-durlabha-indian-skimmer-pakshi-55742 TrendKia — Har trend, sabse pehle.