# डिग्रियों के बाद भी विरासत से नाता अटूट, कोटा के चित्रकार ने मांडणा कला को बनाया जीवन का मिशन

> ड्राइंग और पेंटिंग में एमए और बीएड करने वाले कोटा के युवा कलाकार अंकित बनवाड़िया आधुनिक दौर में राजस्थान की पारंपरिक मांडणा लोक कला को सहेजने में जुटे हैं। प्राकृतिक तत्वों और वैज्ञानिक आधार से जुड़ी इस कला को वे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प निभा रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/digriyon-ke-bada-bhi-virasata-se-nata-atuta-kota-ke-chitrakara-ne-mandana-kala-ko-banaya-jivana-ka-mishana-56820 · **Language:** Hindi
**Tags:** मांडणा कला, अंकित बनवाड़िया, कोटा, राजस्थान लोक कला, पारंपरिक चित्रकला, संस्कृति संरक्षण

राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोक कलाओं का विशेष स्थान रहा है, जहाँ मांगलिक अवसरों, तीज त्योहारों और वैवाहिक समारोहों में घरों के आंगनों को मांडणा कला से सजाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। समय के तेजी से बदलते चक्र और आधुनिक जीवनशैली के बीच यह प्राचीन कला अपनी मूल पहचान बचाने की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे दौर में राजस्थान के कोटा शहर के युवा चित्रकार अंकित बनवाड़िया इस पारंपरिक विधा को सहेजने, जीवित रखने और समाज के बीच इसकी महत्ता को पुनर्स्थापित करने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। बचपन से ही मांडणे बनाने का शौक रखने वाले अंकित अब आम लोगों के बीच इस कला के प्रति चेतना और सम्मान जगाने के लिए लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

## गोबर और चूने की सौंधी महक में छिपा वैज्ञानिक आधार
अंकित बनवाड़िया का स्पष्ट मानना है कि मांडणा केवल दीवारों या फर्श को सजाने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन का सीधे तौर पर प्रकृति के साथ जुड़ाव दर्शाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार राजस्थान के गांवों में घरों की लिपाई और मांडणे बनाने के लिए गाय के गोबर और चूने जैसी शुद्ध व प्राकृतिक सामग्रियों का ही इस्तेमाल होता आया है। इस परंपरा के पीछे गहरा वैज्ञानिक तर्क मौजूद है। गोबर में स्वाभाविक रूप से जीवाणु-रोधी यानी एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो वातावरण को शुद्ध रखते हैं। दूसरी ओर, चूने का लेप भी सूक्ष्म बैक्टीरिया को खत्म करने में बेहद असरदार साबित होता है।

पुराने समय में जब अधिकांश घर कच्चे हुआ करते थे, तब ग्रामीण दिवाली और अन्य बड़े त्योहारों के मौके पर चाव से मांडणे उकेरते थे। इन आकृतियों में धार्मिक और मांगलिक प्रतीकों का खास महत्व होता था। स्वास्तिक का पावन चिन्ह और देवी के आशीर्वाद के रूप में माताजी के पगले जैसी पवित्र आकृतियां आंगनों और चौखटों पर बनाई जाती थीं, जो घर में सुख, शांति और समृद्धि के आगमन का प्रतीक मानी जाती थीं।

## रेडीमेड रंगोलियों का चलन और लुप्त होती प्राकृतिक सामग्री
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और समय की भारी कमी के चलते लोगों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। त्योहारों के मौके पर मेहनत से मांडणा बनाने की जगह अब बाजारों में मिलने वाली रेडीमेड प्लास्टिक या कागज की छपी हुई रंगोलियों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इन रेडीमेड सजावटी उत्पादों में कई तरह के हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके कारण इनमें न तो हाथ से बने पारंपरिक मांडणों जैसी आत्मीय चमक दिखती है और न ही वह मांगलिक भाव महसूस होता है।

इसके अलावा समाज में बढ़ते एकल परिवारों के चलन और बहुमंजिला इमारतों में रहने की मजबूरी ने भी इस कला को नुकसान पहुँचाया है। कंक्रीट के आधुनिक फ्लैटों में रहने वाले लोगों के लिए ग्रामीण परिवेश की तरह गाय का गोबर या शुद्ध चूना जुटाना लगभग नामुमकिन हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों की इस अनुपलब्धता ने शहरी आबादी को अपनी ही लोक परंपराओं और पर्यावरण से काफी दूर कर दिया है।

## संस्कृति का खात्मा नहीं, लेकिन संरक्षण की दरकार
अपनी सांस्कृतिक जड़ों के भविष्य को लेकर अंकित बनवाड़िया का नजरिया बेहद यथार्थवादी है। उनका कहना है कि हमारी लोक संस्कृति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में इसका ह्रास जरूर हो रहा है। आज का इंसान हर काम में तात्कालिक परिणाम और कम से कम समय में तैयार होने वाले विकल्पों की तलाश में रहता है, जिससे पारंपरिक कलाएं हाशिए पर चली जाती हैं। हमारे पूर्वजों ने जिन परंपराओं की नींव रखी थी, वे किसी न किसी रूप में विज्ञान, पर्यावरण संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा के संचार से जुड़ी थीं। भले ही मांडणा कला का कोई विधिवत लिखित दस्तावेज या इतिहास मौजूद न हो, लेकिन मौखिक और व्यावहारिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस लोक परंपरा को बचाना आज बेहद जरूरी हो गया है।

## विरासत को बचाने के व्यावहारिक सुझाव
लोक कला को दोबारा जन-जन की दिनचर्या में शामिल करने के लिए अंकित बनवाड़िया ने कई महत्वपूर्ण रास्ते सुझाए हैं, जिन पर अमल करके इस धरोहर को नया जीवन दिया जा सकता है

- **प्राकृतिक साधनों की जानकारी:** नई पीढ़ी के बच्चों और युवाओं को मांडणा में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक सामग्रियों और उनके पर्यावरणीय महत्व के बारे में विस्तार से बताया जाना चाहिए, ताकि वे अपनी जड़ों पर गर्व कर सकें।
- **कलाकारों को साझा मंच:** प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सांस्कृतिक महोत्सवों और प्रदर्शनियों का आयोजन होना चाहिए, जिससे लोक कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिले और आम लोगों में कला के प्रति समझ विकसित हो।
- **रासायनिक रंगों से दूरी:** त्योहारों पर घरों में हाथ से ही मांडणे बनाने की कोशिश की जाए और बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त सिंथेटिक रंगों के उपयोग को पूरी तरह बंद या कम से कम किया जाए।
- **आंगनों और चबूतरों का उपयोग:** घरों के प्रवेश द्वार, चबूतरों और खुले आंगनों में पारंपरिक आकृतियां बनाने की आदत को जीवित रखा जाए, जिससे परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहे।

## कौन हैं युवा चित्रकार अंकित बनवाड़िया?
अंकित बनवाड़िया राजस्थान के एक समर्पित युवा कलाकार हैं, जिन्होंने कला की दुनिया में औपचारिक उच्च शिक्षा भी हासिल की है। उन्होंने ड्राइंग एंड पेंटिंग विषय से एम.ए. की पढ़ाई पूरी की है और इसके साथ ही बी.एड. की डिग्री भी हासिल की है। उच्च शिक्षित होने के बावजूद उन्होंने अपनी मिट्टी की कला को नहीं छोड़ा। अंकित बताते हैं कि जब वे पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ते थे, तभी से उनके मन में मांडणा कला के प्रति गहरा लगाव पैदा हो गया था और वे बचपन से ही इसे बनाते आ रहे हैं।

मांडणा और रंगोली के पारंपरिक रूपों के अलावा अंकित राजस्थानी पारंपरिक चित्र शैली में दीवारों पर सुंदर चित्रकारी (वॉल पेंटिंग) भी करते हैं। वे लोगों से लगातार यही अपील करते हैं कि यदि हमें अपनी इस अनमोल लोक विरासत को आने वाले कल के लिए बचाना है, तो हमें स्वयं अपनी प्रकृति और संस्कृति से जुड़ना होगा। हाथों से प्यार और निष्ठा से उकेरे गए मांडणे ही इस सदियों पुरानी राजस्थानी परंपरा की असली आत्मा हैं।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण और आधुनिक घरों में प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग से आम नागरिकों की जीवनशैली पर सीधा असर पड़ता है।

- **भारत में:** आधुनिक घरों में प्लास्टिक और केमिकल युक्त रेडीमेड रंगोलियों की जगह पारंपरिक हस्तनिर्मित कला को अपनाने से हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती मिलती है। यह बदलाव घरों के भीतर हानिकारक रसायनों के संपर्क को कम करके पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देता है।
- **कोटा और राजस्थान में:** स्थानीय लोक कलाकारों को सम्मान मिलने से पारंपरिक चित्रकला और मांडणा कला से जुड़े युवाओं को नए अवसर प्राप्त होते हैं। इससे राज्य की सदियों पुरानी ग्रामीण धरोहर शहरी क्षेत्रों में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने में सफल होती है।
- **त्योहारों की तैयारी में:** बाजार से कृत्रिम उत्पाद खरीदने के बजाय परिवार के साथ मिलकर मांडणे बनाने से पारिवारिक जुड़ाव और सकारात्मक माहौल बनता है। इसके जरिए आने वाली पीढ़ी को अपनी पैतृक कलाओं को व्यवहार में सीखने और समझने का प्रत्यक्ष मौका मिलता है।
- **स्वास्थ्य और स्वच्छता में:** गोबर और चूने जैसी एंटीबैक्टीरियल सामग्रियों का उपयोग कीटाणुओं से बचाव कर घर के आंगनों को स्वच्छ रखने की स्वाभाविक व्यवस्था देता है। हालांकि शहरों में इसका विकल्प सीमित है, फिर भी प्राकृतिक रंगों का चयन कई एलर्जी और त्वचा संबंधी जोखिमों से बचाता है।

## ऐसा क्यों हुआ
मांडणा जैसी समृद्ध लोक कला के घटते चलन के पीछे आधुनिक जीवन की व्यस्तता, शहरी आवासीय बनावट और बाजार की रेडीमेड संस्कृति जैसे कई मिले-जुले कारण जिम्मेदार हैं।

- **समय की भारी कमी:** आधुनिक शहरी जीवन की भागदौड़ भरी दिनचर्या के कारण लोगों के पास पारंपरिक मांडणा बनाने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता है। यही वजह है कि लोग बाजारों में सुलभ केमिकल युक्त रेडीमेड रंगोलियों और स्टिकर्स की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
- **आवासीय संरचना में बदलाव:** संयुक्त परिवारों के टूटने और बहुमंजिला कंक्रीट के फ्लैटों के विस्तार ने पारंपरिक कच्चे आंगनों को समाप्त कर दिया है। शहरी परिवेश में गाय के गोबर और चूने जैसी पारंपरिक व प्राकृतिक सामग्रियों की अनुपलब्धता ने भी इस कला को दूर कर दिया है।
- **लिखित इतिहास का अभाव:** मांडणा कला का कोई औपचारिक या व्यवस्थित लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं है और यह मुख्य रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक अभ्यास पर निर्भर रही है। इसके चलते आधुनिक पीढ़ी तक इसका वैज्ञानिक और पारंपरिक महत्व स्पष्ट रूप से नहीं पहुँच सका।

## सवाल-जवाब

### 1. मांडणा लोक कला क्या है और यह कहाँ प्रसिद्ध है?
मांडणा राजस्थान की एक सदियों पुरानी पारंपरिक लोक कला है, जिसे तीज-त्योहारों, विवाह और मांगलिक अवसरों पर घरों के आंगनों व चबूतरों पर बनाया जाता है।

### 2. अंकित बनवाड़िया कौन हैं?
अंकित बनवाड़िया कोटा के एक युवा चित्रकार हैं, जिन्होंने ड्राइंग एंड पेंटिंग में एम.ए. और बी.एड. किया है और वे मांडणा लोक कला को बचाने का अभियान चला रहे हैं।

### 3. पारंपरिक मांडणा बनाने में किन प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग होता है?
पारंपरिक मांडणा बनाने में मुख्य रूप से गाय के गोबर और चूने का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें प्राकृतिक रूप से बैक्टीरिया रोधी गुण होते हैं।

### 4. मांडणा कला में कौन से प्रमुख मांगलिक प्रतीक उकेरे जाते हैं?
इस कला में विशेष रूप से स्वास्तिक का पावन चिन्ह और देवी के आशीर्वाद के रूप में माताजी के पगले जैसे शुभ प्रतीक बनाए जाते हैं।

### 5. आज के दौर में मांडणा कला के घटते क्रेज का मुख्य कारण क्या है?
समय की कमी, बाजार की केमिकल युक्त रेडीमेड रंगोलियों का बढ़ता चलन और फ्लैट संस्कृति के कारण गोबर जैसी प्राकृतिक चीजों की अनुपलब्धता इसका प्रमुख कारण है।

### 6. अंकित बनवाड़िया कब से इस कला से जुड़े हुए हैं?
अंकित बनवाड़िया पहली और दूसरी कक्षा से यानी अपने बचपन के दिनों से ही मांडणा बनाने की कला से गहराई से जुड़े हुए हैं।

### 7. मांडणा के अलावा अंकित बनवाड़िया किस प्रकार की चित्रकारी करते हैं?
मांडणा और रंगोली के अतिरिक्त वे पारंपरिक राजस्थानी चित्र शैली में दीवारों पर सुंदर चित्रकारी (वॉल पेंटिंग) भी करते हैं।

### 8. लोक कला को बचाने के लिए अंकित ने क्या प्रमुख सुझाव दिए हैं?
उन्होंने नई पीढ़ी में जागरूकता फैलाने, कलाकारों को मंच देने, केमिकल रंगों का उपयोग बंद करने और घरों के आंगनों में हाथ से मांडणे बनाने का सुझाव दिया है।

## प्रेरणा और सबक
अंकित बनवाड़िया का जीवन यह साबित करता है कि उच्च शैक्षणिक योग्यता हासिल करने के बाद भी अपनी पैतृक जड़ों और लोक संस्कृति से जुड़े रहा जा सकता है।

- **संस्कृति के प्रति निष्ठा:** ड्राइंग और पेंटिंग में एमए और बीएड जैसी उच्च डिग्रियां हासिल करने के बाद भी अपनी पारंपरिक कला को न छोड़ना यह सिखाता है कि आधुनिक शिक्षा हमें अपनी जड़ों से अलग करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें संवारने के लिए है।
- **बचपन के शौक को मिशन बनाना:** पहली और दूसरी कक्षा से शुरू हुए मांडणा बनाने के शौक को जीवन का उद्देश्य बनाना यह दर्शाता है कि निरंतरता और सच्चा समर्पण किसी भी कला को पुनर्जीवित कर सकता है।
- **प्रकृति से गहरा जुड़ाव:** रसायनों के दौर में गोबर और चूने जैसी पर्यावरण अनुकूल सामग्रियों के वैज्ञानिक महत्व को समझना और समझाना हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देता है।
- **सक्रिय समाज निर्माण:** केवल स्वयं कला का अभ्यास करने तक सीमित न रहकर कार्यशालाओं और सुझावों के माध्यम से समाज को जागरूक करना यह सीख देता है कि विरासत का संरक्षण केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समुदाय का साझा उत्तरदायित्व है।

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