# दीपावली पर पशुओं के श्रृंगार की अनूठी रीत, राजस्थान के करौली में सजी मवेशियों के गहनों की खास मंडी

> दीपावली के पर्व पर राजस्थान के करौली स्थित सर्राफा बाजार में पशुधन के आभूषणों की विशेष दुकानें सजी हैं, जहां किसान गाय, भैंस और बैलों के लिए पारंपरिक आभूषण खरीद रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/dipavali-para-pashuon-ke-shrringara-ki-anuthi-rita-rajasthan-ke-karauli-men-saji-maveshiyon-ke-gahanon-ki-khasa-mndi-55816 · **Language:** Hindi
**Tags:** करौली, राजस्थान, पशुधन आभूषण, दीपावली, सर्राफा बाजार, ग्रामीण परंपरा, पशु श्रृंगार

दीपावली के त्योहार के दौरान जहां आम तौर पर लोग अपने लिए नए वस्त्र, सोने-चांदी के जेवर और घर की सजावट की चीजें खरीदते हैं, वहीं राजस्थान के करौली जिले में एक बिल्कुल अलग सांस्कृतिक परंपरा देखने को मिलती है। यहां के प्रसिद्ध सर्राफा बाजार में मवेशियों के श्रृंगार के लिए खास दुकानें लगाई जाती हैं। इस बाजार में इंसान नहीं, बल्कि गाय, भैंस और बैलों को सजाने के लिए पारंपरिक आभूषणों की व्यापक बिक्री होती है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े किसान और पशुपालक दूर-दूर से अपने पशुओं को संवारने के लिए इन दुकानों पर खरीदारी करने पहुंचते हैं।

## साल में केवल सात दिनों के लिए सजती हैं दुकानें
करौली के सर्राफा बाजार में यह रौनक पूरे बारह महीने नहीं रहती। यह विशेष बाजार केवल दीपावली के उत्सव के दौरान महज सात दिनों की अवधि के लिए ही संचालित होता है। ग्रामीण इलाकों में जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए मवेशी केवल दूध उत्पादन या खेतों में हल जोतने का जरिया भर नहीं हैं, बल्कि वे उनकी आजीविका और आर्थिक मजबूती की मुख्य धुरी माने जाते हैं। खेती और दैनिक जीवन में पशुधन के इस अमूल्य योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किसान दीपावली का चयन करते हैं। ग्रामीण परंपरा के अनुसार, लक्ष्मी पूजन संपन्न होने के बाद पशुपालक अपने मवेशियों को साफ पानी से नहलाते हैं, उनका विधि-विधान से पूजन करते हैं और फिर नए आभूषण पहनाकर उनका सुंदर श्रृंगार करते हैं। किसानों की यह दृढ़ मान्यता है कि यदि घर का पशुधन स्वस्थ और प्रसन्न रहेगा, तो पूरे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास बना रहेगा।

## मालाओं, घंटियों और घुंघरुओं की विस्तृत श्रृंखला
जिस प्रकार महिलाओं के सौंदर्य को निखारने के लिए बाजार में तरह-तरह के हार, कंगन, झुमके और पायल उपलब्ध होते हैं, ठीक उसी तर्ज पर इस बाजार में पशुओं के लिए भी पारंपरिक आभूषणों की विस्तृत किस्में तैयार की जाती हैं। मवेशियों के श्रृंगार के लिए दुकानों पर गले में बांधी जाने वाली रंग-बिरंगी मालाएं, पीतल व लोहे की घंटियां, खनकते घुंघरू और माथे पर सजाए जाने वाले कई पारंपरिक सजावटी उत्पाद सजाए गए हैं। पशुपालक अपने जानवरों की बनावट, व्यक्तिगत पसंद और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार इन वस्तुओं का चयन करते हैं।

## दस रुपये से लेकर हजारों रुपये तक के विकल्प
पशुओं के इन आभूषणों का मूल्य उनकी सामग्री, नक्काशी और कारीगरी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। साधारण सजावटी वस्तुएं बेहद मामूली दरों पर मिल जाती हैं, जबकि खास कारीगरी और नक्काशी वाले जटिल आभूषणों का दाम काफी ऊपर तक जाता है। स्थानीय व्यापारी पंकज गुप्ता के अनुसार, दीपावली के इस सात दिवसीय बाजार में मवेशियों के जेवर 10 रुपये से शुरू होकर हजार रुपये और उससे भी अधिक तक की कीमत में बिकते हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से बाजार में आने वाले किसान प्रायः एक से अधिक गहने पसंद करते हैं, ताकि वे अपने पूरे पशुधन का भव्य श्रृंगार कर सकें।

## इसका आप पर असर
यह अनोखा बाजार ग्रामीण संस्कृति में पशुधन के आर्थिक और आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है, जिससे किसानों के लिए अपने मवेशियों के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा जीवित रहती है।

- **भारत में:** ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक आस्था में मवेशियों के प्रति सम्मान की प्राचीन भारतीय परंपराओं को इससे बढ़ावा मिलता है। यह दर्शाता है कि आधुनिक दौर में भी त्योहारों पर कृषि संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं।
- **करौली में:** स्थानीय सर्राफा बाजार के छोटे व्यापारियों और कारीगरों को दीपावली पर सात दिनों का अतिरिक्त मौसमी रोजगार और आय मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले किसान दस रुपये से लेकर हजारों रुपये तक के बजट में अपनी पसंद के आभूषण आसानी से खरीद पाते हैं।
- **पशुपालकों के लिए:** किसान लक्ष्मी पूजन के बाद अपने पशुओं को नहलाकर और सजाकर विधि-विधान से पूजा संपन्न कर सकते हैं। मान्यता के अनुसार यह प्रथा परिवारों में संपन्नता और मवेशियों की खुशहाली सुनिश्चित करती है।
- **हस्तशिल्प और कारीगरी:** मवेशियों के पारंपरिक आभूषण जैसे घुंघरू, घंटियां और मालाएं बनाने वाले स्थानीय कारीगरों को सीधा बाजार मिलता है। इससे लुप्त होती ग्रामीण हस्तकलाओं को जीवंत रखने में मदद मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
करौली में यह अनोखा बाजार सदियों पुरानी ग्रामीण कृषि संस्कृति और दीपावली के धार्मिक संस्कारों के सीधे समन्वय के कारण आयोजित होता है।

- **पशुधन के प्रति कृतज्ञता:** ग्रामीण भारत में गाय, बैल और भैंस किसानों की आजीविका और दैनिक कृषि कार्यों की रीढ़ होते हैं। दीपावली के अवसर पर किसान साल भर की मेहनत के लिए अपने मवेशियों के प्रति आभार व्यक्त करने के उद्देश्य से उनका श्रृंगार करते हैं।
- **लक्ष्मी पूजन से जुड़ा धार्मिक विश्वास:** मान्यताओं के अनुसार पशुधन को साक्षात घर की समृद्धि और लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। लक्ष्मी पूजन के उपरांत पशुओं को नहलाने, पूजने और नए आभूषण पहनाने से घर में सुख और संपन्नता बनी रहने का विश्वास इस परंपरा को बल देता है।
- **सीमित अवधि की मौसमी मांग:** चूंकि मवेशियों का विशेष श्रृंगार केवल दीपावली के त्योहार के दौरान ही किया जाता है, इसलिए व्यापारी पूरे साल के बजाय इसे केवल सात दिनों के लिए ही लगाते हैं। इस सीमित अवधि में आसपास के दर्जनों गांवों से किसान अपनी खरीदारी पूरी करते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. राजस्थान के करौली में दीपावली पर किस प्रकार का विशेष बाजार लगता है?
करौली के सर्राफा बाजार में दीपावली के मौके पर गाय, भैंस और बैलों के पारंपरिक आभूषणों और श्रृंगार सामग्री की विशेष दुकानें लगती हैं।

### 2. पशुओं के आभूषणों का यह बाजार कितने दिनों तक संचालित होता है?
यह बाजार पूरे साल नहीं लगता, बल्कि केवल दीपावली के पर्व पर महज सात दिनों के लिए ही खुलता है।

### 3. करौली के इस बाजार में पशुओं के गहनों की कीमतें क्या हैं?
व्यापारी पंकज गुप्ता के अनुसार यहां पशुओं के आभूषण 10 रुपये से शुरू होकर एक हजार रुपये और उससे अधिक तक बिकते हैं।

### 4. इस बाजार में मवेशियों के लिए कौन-कौन से आभूषण मिलते हैं?
दुकानों पर गले की मालाएं, घंटियां, घुंघरू और माथे व शरीर को सजाने वाले पारंपरिक आभूषण उपलब्ध रहते हैं।

### 5. किसान दीपावली पर अपने मवेशियों का श्रृंगार क्यों करते हैं?
किसान खेती और आजीविका में पशुधन के योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने के लिए उनका पूजन व श्रृंगार करते हैं।

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