{
  "type": "article",
  "title": "गले के कैंसर से उबरकर रामसिंह ने साथियों संग 250 बीघा बंजर भूमि पर उगाया घना जंगल",
  "summary": "हरियाणा सीमा के समीप बसे कुलोठ कलां में गले की गंभीर बीमारी से जंग जीतने वाले रामसिंह लखेरा ने बुजुर्ग साथियों के साथ मिलकर 250 बीघा सूखी जमीन पर 2 हजार पेड़ खड़े कर दिए हैं।",
  "content": "जीवन की सांझ में जब अधिकांश लोग विश्राम और शांत दिनचर्या चुनते हैं, उस उम्र में कुछ बुजुर्गों ने अपने हाथों से धरती का भूगोल बदलने की ठान ली। हरियाणा की सीमा से लगे कुलोठ कलां में वरिष्ठ नागरिकों के एक छोटे से समूह ने अपनी अटूट मेहनत से वह कर दिखाया जिसकी मिसाल कम ही मिलती है। जिस सूखी और वीरान पड़ी जोहड़ की जमीन पर कभी धूल उड़ती थी, आज वहां 250 बीघा क्षेत्र में दूर-दूर तक घनी हरियाली छा चुकी है। यहां लगाए गए लगभग 2 हजार पौधे अब विशालकाय वृक्ष बनकर पक्षियों को बसेरा और राहगीरों को ठंडी छांव दे रहे हैं।\n\nगंभीर बीमारी पर विजय और जीवन को मिला नया संकल्प\nइस अनूठी पर्यावरणीय क्रांति की नींव 71 वर्षीय रामसिंह लखेरा के व्यक्तिगत संघर्ष से जुड़ी है। उन्हें गले का कैंसर हो गया था, जिसके चलते उन्हें लंबे समय तक कठोर चिकित्सीय उपचार से गुजरना पड़ा। वर्ष 2008 में जब उन्होंने इस जानलेवा बीमारी को परास्त किया, तो परिवार वालों का सुझाव था कि अब वे पूरी तरह विश्राम करें और किसी भी श्रमसाध्य कार्य से दूर रहें। रामसिंह का मानना अलग था। जीवनदान मिलने के बाद उन्होंने शेष आयु को प्रकृति और सामाजिक कल्याण के लिए समर्पित करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। उन्होंने दादा केशव महाराज मंदिर से सटे जोहड़ की पथरीली बंजर भूमि को संवारने का बीड़ा उठाया और पीपल, बड़ तथा नीम के पौधे लगाने आरंभ किए।\n\nशुरुआती दौर में यह पूरी यात्रा एकाकी थी। रामसिंह स्वयं बाल्टियों से पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाते, उनकी सुरक्षा के प्रबंध करते और कड़ी धूप में भी उनकी सार-संभाल में लगे रहते। कुछ समय पश्चात जब उस शुष्क धरातल पर हरी कोपलें फूटने लगीं, तो उनके संकल्प को और अधिक संबल मिला।\n\nवरिष्ठ नागरिकों की संगठित शक्ति से खड़ा हुआ जन-आंदोलन\nरामसिंह की निस्वार्थ तपस्या देखकर गांव के अन्य वरिष्ठ जन भी धीरे-धीरे इस कार्य से जुड़ने लगे। वर्ष 2011 आते-आते यह प्रयास एक सामूहिक अभियान में रूपांतरित हो गया। उस समय 82 वर्षीय चिरंजीलाल स्वामी, 76 वर्ष के रामनिवास शर्मा, 72 वर्ष के प्रकाशचंद मेचू, 71 वर्षीय हरिसिंह मेचू, 65 वर्ष के शेर सिंह जांगिड़, 54 वर्षीय रघुवीर शर्मा तथा 50 वर्षीय ईश्वर मेघवाल ने आगे आकर कमान संभाली।\n\nइन बुजुर्गों ने आपसी तालमेल से जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया। किसी ने गड्ढे खोदकर नए पौधे लगाने का काम संभाला, तो किसी ने आवारा पशुओं से उनकी बाड़ लगाकर रक्षा की, जबकि अन्य साथियों ने प्रतिदिन पानी देने का दायित्व निभाया। वरिष्ठ नागरिकों की इस सम्मिलित लगन का परिणाम यह निकला कि देखते ही देखते करीब 2 हजार पौधे रोपे गए। आज नीम, पीपल और बड़ के वे पौधे फल-फूलकर सघन वटवृक्ष बन चुके हैं, जहां दिनभर पक्षियों का कलरव सुनाई देता है।\n\nग्रामीण भामाशाह का सहयोग और मूक प्राणियों की सुध\nबुजुर्गों की इस निस्वार्थ साधना को देखकर क्षेत्र के एक भामाशाह का दिल भी पसीज उठा। उन्होंने सिंचाई की गंभीर समस्या को दूर करने के लिए मंदिर परिसर के निकट एक नलकूप लगवाया। इस बोरिंग के चालू होने से पेड़ों की नियमित सिंचाई का संकट पूरी तरह समाप्त हो गया।\n\nपर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इन बुजुर्गों ने मूक पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने का भी प्रबंध किया। मंदिर के समीप बने पक्के जलाशय को नियमित रूप से पानी से लबालब रखा जाता है, ताकि भीषण गर्मी में वन्य जीवों और मवेशियों को भटकना न पड़े।\n\nकेश राणी जोहड़ी तक पहुंचा हरियाली का विस्तार\nइस टोली का उत्साह 250 बीघा की उस पहली जमीन तक सीमित नहीं रहा। अपने अभियान का दायरा बढ़ाते हुए उन्होंने गांव की एक अन्य बंजर भूमि केश राणी जोहड़ी का रुख किया। लगभग 25 बीघा में फैली इस बंजर भूमि पर भी उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से बड़, नीम और पीपल के पौधे रोपने शुरू किए। नियमित सार-संभाल के चलते यह इलाका भी अब तेजी से हरे-भरे रूप में तब्दील हो रहा है।\n\nकुलोठ कलां के इन वरिष्ठ नागरिकों ने यह प्रमाणित कर दिखाया है कि कुदरत को लौटाने के लिए किसी प्रशासनिक पद अथवा विपुल संसाधनों की अनिवार्यता नहीं होती, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और निरंतर पसीना बहाना ही सबसे बड़ा संबल होता है।\n\nइसका आप पर असर\nगांव के बुजुर्गों का यह प्रयास सामुदायिक बंजर भूमि को पुनर्जीवित करने और स्थानीय जल व जैव-विविधता संकट से निपटने का व्यावहारिक रास्ता दिखाता है।\n\n• स्थानीय स्तर पर कुलोठ कलां में: करीब 275 बीघा बंजर क्षेत्र में घने पेड़ तैयार होने से भूजल स्तर और मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा। भीषण गर्मी के दिनों में स्थानीय मवेशियों और पक्षियों को पक्के जलाशय से पीने का पानी और छायादार आश्रय निरंतर मिलता रहेगा।\n• भारत भर के ग्रामीण क्षेत्रों में: यह मुहिम साबित करती है कि बिना सरकारी बजट पर निर्भर रहे ग्रामीण समुदाय अपनी बंजर पंचायतों को सघन वनों में बदल सकते हैं। बड़, पीपल और नीम जैसे देशी वृक्ष स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सबसे टिकाऊ उपाय हैं।\n• स्वास्थ्य और पुनर्वास के संदर्भ में: गंभीर बीमारी से ठीक होने वाले मरीजों के लिए यह अनुभव दिखाता है कि सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों में सक्रियता मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को नई ताकत देती है। परिवार और समाज वरिष्ठ नागरिकों की क्षमता को केवल घर तक सीमित न रखकर ऐसे प्रयासों में उनका सहयोग कर सकते हैं।\n• जलवायु अनुकूलन में: मरुस्थलीय और शुष्क इलाकों के समीपवर्ती गांवों में ऐसे जन-वन लू के थपेड़ों को रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं। स्थानीय युवा और नागरिक संगठन अपने क्षेत्रों में भी बंजर जोहड़ों को इसी तरह गोद ले सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह बड़ा बदलाव एक व्यक्ति द्वारा गंभीर बीमारी से उबरने के बाद अपने जीवन को लोकहित में समर्पित करने और फिर गांव के बुजुर्गों के संगठित सहयोग से संभव हुआ।\n\n• बीमारी से उबरने का संकल्प: वर्ष 2008 में गले के कैंसर पर विजय पाने के बाद रामसिंह लखेरा ने शेष जीवन को समाज और प्रकृति सेवा में लगाने का व्यक्तिगत निर्णय लिया। परिवार की ओर से आराम करने की सलाह मिलने के बावजूद उन्होंने मंदिर के पास वीरान पड़ी जमीन पर अकेले पौधे लगाना शुरू किया।\n• सामूहिक भागीदारी का जुड़ाव: जब बंजर जमीन पर पहली बार हरियाली उभरी, तो गांव के अन्य वरिष्ठ जन भी उनकी लगन से प्रभावित होकर 2011 में इस मुहिम में शामिल हो गए। उन्होंने पौधे रोपने, बाड़ लगाने और सिंचाई का काम आपस में बांट लिया।\n• बुनियादी संसाधन की उपलब्धता: बुजुर्गों की निस्वार्थ मेहनत देखकर एक स्थानीय दानदाता ने बोरिंग करवा दी, जिससे पानी की पुरानी किल्लत दूर हुई। सिंचाई की सुविधा सुगम होने से पौधों के जीवित रहने की दर बढ़ गई और वे समय के साथ विशाल पेड़ बन गए।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह प्रेरणादायक अभियान किस गांव में चलाया जा रहा है?\nयह अभियान हरियाणा सीमा के समीप स्थित कुलोठ कलां गांव में चलाया जा रहा है।\n\n2. वृक्षारोपण की इस मुहिम की शुरुआत किसने और कब की थी?\nइसकी शुरुआत 71 वर्षीय रामसिंह लखेरा ने वर्ष 2008 में गले के कैंसर से उबरने के बाद की थी।\n\n3. बुजुर्गों ने कितनी बंजर जमीन को हरा-भरा बनाया है?\nबुजुर्गों ने जोहड़ की 250 बीघा और इसके अतिरिक्त केश राणी जोहड़ी की करीब 25 बीघा बंजर जमीन को हरा-भरा किया है।\n\n4. इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कौन से पौधे लगाए गए हैं और उनकी संख्या कितनी है?\nयहां बड़, पीपल और नीम के लगभग 2 हजार पौधे लगाए गए हैं जो अब बड़े पेड़ बन चुके हैं।\n\n5. इस अभियान में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख बुजुर्ग कौन हैं?\nवर्ष 2011 में चिरंजीलाल स्वामी, रामनिवास शर्मा, प्रकाशचंद मेचू, हरिसिंह मेचू, शेर सिंह जांगिड़, रघुवीर शर्मा और ईश्वर मेघवाल इस अभियान से जुड़े।\n\n6. पौधों की सिंचाई और पानी की व्यवस्था कैसे की गई?\nएक स्थानीय भामाशाह ने मंदिर के पास बोरिंग लगवाई जिससे पेड़ों की सिंचाई और पशु-पक्षियों के लिए बने पक्के जलाशय में पानी भरा जाता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nरामसिंह और उनके बुजुर्ग साथियों की यह पहल साबित करती है कि दृढ़ संकल्प और साझा सहयोग किसी भी विपरीत परिस्थिति को नई उम्मीद में बदल सकता है।\n\n• संकट को उद्देश्य में बदलना: जीवन की गंभीर से गंभीर बीमारी भी मनुष्य की इच्छाशक्ति को समाप्त नहीं कर सकती। जीवन में आने वाली रुकावटों के बाद भी व्यक्ति एक नया और बड़ा लक्ष्य चुनकर समाज को दिशा दे सकता है।\n• उम्र केवल एक संख्या है: 70 से 82 वर्ष की उम्र में भारी शारीरिक श्रम करके इन बुजुर्गों ने दिखाया कि सेवा भाव के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती। अपनी ऊर्जा का सही उपयोग किसी भी पड़ाव पर किया जा सकता है।\n• शुरुआत अकेले से ही होती है: किसी बड़े बदलाव के लिए हमेशा विशाल भीड़ की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती। एक व्यक्ति की निष्ठावान शुरुआत अंततः कारवां बना देती है।\n• साझे प्रयास की ताकत: जब सामान्य लोग बिना किसी स्वार्थ के एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होते हैं, तो बंजर जमीन भी उपजाऊ जंगल में बदल जाती है।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/gale-ke-kainsara-se-ubarakara-ramsingh-ne-sathiyon-snga-250-bigha-bnjara-bhumi-para-ugaya-ghana-jngala-56425",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-11-04",
  "tags": [
    "झुंझुनूं",
    "कुलोठ कलां",
    "रामसिंह लखेरा",
    "पर्यावरण संरक्षण",
    "वृक्षारोपण",
    "वरिष्ठ नागरिक",
    "प्रेरणादायक"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "गांव के बुजुर्गों का यह प्रयास सामुदायिक बंजर भूमि को पुनर्जीवित करने और स्थानीय जल व जैव-विविधता संकट से निपटने का व्यावहारिक रास्ता दिखाता है।\n\n• स्थानीय स्तर पर कुलोठ कलां में: करीब 275 बीघा बंजर क्षेत्र में घने पेड़ तैयार होने से भूजल स्तर और मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा। भीषण गर्मी के दिनों में स्थानीय मवेशियों और पक्षियों को पक्के जलाशय से पीने का पानी और छायादार आश्रय निरंतर मिलता रहेगा।\n• भारत भर के ग्रामीण क्षेत्रों में: यह मुहिम साबित करती है कि बिना सरकारी बजट पर निर्भर रहे ग्रामीण समुदाय अपनी बंजर पंचायतों को सघन वनों में बदल सकते हैं। बड़, पीपल और नीम जैसे देशी वृक्ष स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सबसे टिकाऊ उपाय हैं।\n• स्वास्थ्य और पुनर्वास के संदर्भ में: गंभीर बीमारी से ठीक होने वाले मरीजों के लिए यह अनुभव दिखाता है कि सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों में सक्रियता मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को नई ताकत देती है। परिवार और समाज वरिष्ठ नागरिकों की क्षमता को केवल घर तक सीमित न रखकर ऐसे प्रयासों में उनका सहयोग कर सकते हैं।\n• जलवायु अनुकूलन में: मरुस्थलीय और शुष्क इलाकों के समीपवर्ती गांवों में ऐसे जन-वन लू के थपेड़ों को रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं। स्थानीय युवा और नागरिक संगठन अपने क्षेत्रों में भी बंजर जोहड़ों को इसी तरह गोद ले सकते हैं।",
  "whyItHappened": "यह बड़ा बदलाव एक व्यक्ति द्वारा गंभीर बीमारी से उबरने के बाद अपने जीवन को लोकहित में समर्पित करने और फिर गांव के बुजुर्गों के संगठित सहयोग से संभव हुआ।\n\n• बीमारी से उबरने का संकल्प: वर्ष 2008 में गले के कैंसर पर विजय पाने के बाद रामसिंह लखेरा ने शेष जीवन को समाज और प्रकृति सेवा में लगाने का व्यक्तिगत निर्णय लिया। परिवार की ओर से आराम करने की सलाह मिलने के बावजूद उन्होंने मंदिर के पास वीरान पड़ी जमीन पर अकेले पौधे लगाना शुरू किया।\n• सामूहिक भागीदारी का जुड़ाव: जब बंजर जमीन पर पहली बार हरियाली उभरी, तो गांव के अन्य वरिष्ठ जन भी उनकी लगन से प्रभावित होकर 2011 में इस मुहिम में शामिल हो गए। उन्होंने पौधे रोपने, बाड़ लगाने और सिंचाई का काम आपस में बांट लिया।\n• बुनियादी संसाधन की उपलब्धता: बुजुर्गों की निस्वार्थ मेहनत देखकर एक स्थानीय दानदाता ने बोरिंग करवा दी, जिससे पानी की पुरानी किल्लत दूर हुई। सिंचाई की सुविधा सुगम होने से पौधों के जीवित रहने की दर बढ़ गई और वे समय के साथ विशाल पेड़ बन गए।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "यह प्रेरणादायक अभियान किस गांव में चलाया जा रहा है?",
      "answer": "यह अभियान हरियाणा सीमा के समीप स्थित कुलोठ कलां गांव में चलाया जा रहा है।"
    },
    {
      "question": "वृक्षारोपण की इस मुहिम की शुरुआत किसने और कब की थी?",
      "answer": "इसकी शुरुआत 71 वर्षीय रामसिंह लखेरा ने वर्ष 2008 में गले के कैंसर से उबरने के बाद की थी।"
    },
    {
      "question": "बुजुर्गों ने कितनी बंजर जमीन को हरा-भरा बनाया है?",
      "answer": "बुजुर्गों ने जोहड़ की 250 बीघा और इसके अतिरिक्त केश राणी जोहड़ी की करीब 25 बीघा बंजर जमीन को हरा-भरा किया है।"
    },
    {
      "question": "इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कौन से पौधे लगाए गए हैं और उनकी संख्या कितनी है?",
      "answer": "यहां बड़, पीपल और नीम के लगभग 2 हजार पौधे लगाए गए हैं जो अब बड़े पेड़ बन चुके हैं।"
    },
    {
      "question": "इस अभियान में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख बुजुर्ग कौन हैं?",
      "answer": "वर्ष 2011 में चिरंजीलाल स्वामी, रामनिवास शर्मा, प्रकाशचंद मेचू, हरिसिंह मेचू, शेर सिंह जांगिड़, रघुवीर शर्मा और ईश्वर मेघवाल इस अभियान से जुड़े।"
    },
    {
      "question": "पौधों की सिंचाई और पानी की व्यवस्था कैसे की गई?",
      "answer": "एक स्थानीय भामाशाह ने मंदिर के पास बोरिंग लगवाई जिससे पेड़ों की सिंचाई और पशु-पक्षियों के लिए बने पक्के जलाशय में पानी भरा जाता है।"
    }
  ],
  "inspiration": "रामसिंह और उनके बुजुर्ग साथियों की यह पहल साबित करती है कि दृढ़ संकल्प और साझा सहयोग किसी भी विपरीत परिस्थिति को नई उम्मीद में बदल सकता है।\n\n• संकट को उद्देश्य में बदलना: जीवन की गंभीर से गंभीर बीमारी भी मनुष्य की इच्छाशक्ति को समाप्त नहीं कर सकती। जीवन में आने वाली रुकावटों के बाद भी व्यक्ति एक नया और बड़ा लक्ष्य चुनकर समाज को दिशा दे सकता है।\n• उम्र केवल एक संख्या है: 70 से 82 वर्ष की उम्र में भारी शारीरिक श्रम करके इन बुजुर्गों ने दिखाया कि सेवा भाव के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती। अपनी ऊर्जा का सही उपयोग किसी भी पड़ाव पर किया जा सकता है।\n• शुरुआत अकेले से ही होती है: किसी बड़े बदलाव के लिए हमेशा विशाल भीड़ की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती। एक व्यक्ति की निष्ठावान शुरुआत अंततः कारवां बना देती है।\n• साझे प्रयास की ताकत: जब सामान्य लोग बिना किसी स्वार्थ के एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होते हैं, तो बंजर जमीन भी उपजाऊ जंगल में बदल जाती है।"
}