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  "title": "हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव में अनोखा मुकाबला, सरपंच पद की रेस में आमने-सामने दो सगी बहनें",
  "summary": "नागौर के बरणगांव में पंचायत चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है, जहां सरपंच की कुर्सी के लिए दो सगी बहनें और रिश्ते में सांसद हनुमान बेनीवाल की भाभियां आमने-सामने हैं। इस दिलचस्प मुकाबले में कुल सात महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी हैं।",
  "content": "नागौर जिले के बरणगांव में सरपंच पद के चुनाव ने इन दिनों पूरे इलाके का राजनीतिक ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सांसद हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव में होने जा रहे इस पंचायत चुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है, क्योंकि चुनावी मैदान में उतरी सात महिला प्रत्याशियों में से दो मुख्य दावेदार आपस में सगी बहनें हैं। इस अनोखे और कड़े मुकाबले ने स्थानीय राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, और हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि गांव की जनता आखिर किस उम्मीदवार के सिर पर ताज सजाएगी।\n\nरणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बरणगांव की सियासत\nयह पूरा चुनावी किस्सा नागौर के बरणगांव से जुड़ा हुआ है, जिसे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो और सांसद हनुमान बेनीवाल का पैतृक गांव माना जाता है। इस ग्रामीण सीट पर सरपंच पद के लिए कुल सात महिलाएं अपनी किस्मत आजमा रही हैं। हालांकि, चर्चा का मुख्य केंद्र एक ही परिवार की दो महिलाओं की आपसी टक्कर है। हनुमान बेनीवाल के बड़े भाई रामप्रसाद बेनीवाल की पत्नी मीरा बेनीवाल और उनके दूसरे बड़े भाई प्रेमसुख बेनीवाल की पत्नी राजबाला बेनीवाल इस चुनाव में आमने-सामने खड़ी हैं। सबसे खास बात यह है कि मीरा और राजबाला दोनों सगी बहनें हैं, जिसके कारण इस चुनाव का रंग पूरी तरह से बदल गया है।\n\nराजनीतिक विरासत और पारिवारिक समीकरणों का दौर\nएक तरफ जहां मीरा बेनीवाल अपनी राजनीतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ मैदान में हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी बहन राजबाला बेनीवाल भी मतदाताओं को लुभाने में जुटी हैं। दोनों के सामने लक्ष्य एक ही है, लेकिन पारिवारिक और राजनीतिक रिश्ते इस मुकाबले को बेहद पेचीदा बना रहे हैं। बरणगांव की राजनीति में रामप्रसाद बेनीवाल लंबे समय तक काफी सक्रिय रहे थे और करीब पच्चीस साल पहले वह गांव के सरपंच भी रह चुके थे। अब उनकी पत्नी मीरा उसी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए चुनावी मैदान में उतरी हैं, जबकि राजबाला भी पूरी ताकत से अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं। मतदाता अब पुराने राजनीतिक अनुभव, स्थानीय विकास के मुद्दों और पारिवारिक समीकरणों के बीच अपनी पसंद तय करने की कोशिश कर रहे हैं।\n\nमतदाताओं की संख्या और अन्य उम्मीदवार\nभले ही यह मुकाबला मुख्य रूप से दो बहनों के बीच चर्चा का विषय बना हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मैदान में कुल सात महिला प्रत्याशी ताल ठोक रही हैं। बरणगांव और उससे जुड़े बूढ़ी व अर्जुनपुरा क्षेत्र के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे चुनावी क्षेत्र में कुल 2,970 मतदाता दर्ज हैं। इन सभी मतदाताओं का भरोसा जीतना और गांव की तमाम बुनियादी समस्याओं का समाधान करने का विश्वास दिलाना हर उम्मीदवार के लिए जरूरी होगा। चुनावी मैदान में उतरीं सातों महिलाओं को जनता के बीच जाकर अपनी बात रखनी होगी, जिससे यह मुकाबला और अधिक रोचक हो गया है।\n\nबेनीवाल परिवार के पुराने चुनावी पन्ने\nबरणगांव का यह चुनाव केवल एक गांव की पंचायत का मामला नहीं है, बल्कि इसके साथ बेनीवाल परिवार के पिछले राजनीतिक घटनाक्रम भी जुड़े हुए हैं। बीते विधानसभा चुनाव के दौरान मीरा बेनीवाल की बेटी डॉ. अनीता बेनीवाल ने सीधे तौर पर हनुमान बेनीवाल के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इसके अलावा, हनुमान बेनीवाल की पत्नी कनिका बेनीवाल को भी खींवसर विधानसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इन तमाम पुराने और चर्चित राजनीतिक घटनाक्रमों की वजह से बरणगांव का यह सरपंच चुनाव एक बार फिर से परिवार के भीतर के सियासी समीकरणों को सतह पर ले आया है।\n\nसांसद हनुमान बेनीवाल की भूमिका पर सबकी नजर\nइस पूरे चुनावी घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि सांसद हनुमान बेनीवाल का इस पूरे मामले में क्या रुख रहेगा। क्या वह परिवार के इस मुकाबले में किसी एक प्रत्याशी का समर्थन करते हुए नजर आएंगे, या फिर वह इस पूरी चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह दूरी बनाए रखेंगे। फिलहाल उनके समर्थन को लेकर किसी भी तरह के स्पष्ट रुख की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, जिसके चलते हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में उनकी क्या भूमिका रहती है। फिलहाल बरणगांव की जनता के हाथों में फैसला है कि वह किसे अपना नया सरपंच चुनती है और क्या इस चुनाव का कोई बड़ा असर बेनीवाल परिवार की राजनीति पर भी पड़ता है या नहीं।\n\nइसका आप पर असर\nयह स्थानीय चुनाव बरणगांव के प्रशासनिक और विकास कार्यों की दिशा तय करेगा, जिसका सीधा असर वहां के आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: यह चुनाव इस बात का उदाहरण है कि कैसे ग्रामीण भारत के स्थानीय चुनावों में भी पारिवारिक और राजनीतिक समीकरण राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बन जाते हैं।\n• बरणगांव में: बरणगांव, बूढ़ी और अर्जुनपुरा क्षेत्र के 2,970 मतदाताओं को अपने आगामी सरपंच का चुनाव करते समय स्थानीय विकास और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nबरणगांव का यह सरपंच चुनाव पारंपरिक राजनीतिक विरासत और परिवार के भीतर के पिछले चुनावी मतभेदों के कारण चर्चा में आया है।\n\n• राजनीतिक विरासत: स्व. रामप्रसाद बेनीवाल करीब पच्चीस साल पहले इस गांव के सरपंच रह चुके हैं, और उनकी पत्नी का इस पद के लिए मैदान में उतरना पुरानी सियासी विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।\n• पारिवारिक पृष्ठभूमि: परिवार की पिछली राजनीतिक घटनाओं और आपसी चुनावी प्रतिस्पर्धाओं के कारण इस ग्राम पंचायत चुनाव में आम जनता और राजनीतिक जानकारों की विशेष रुचि बनी हुई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बरणगांव में सरपंच पद के चुनाव में कुल कितनी महिला उम्मीदवार मैदान में हैं?\nबरणगांव में सरपंच पद के लिए कुल सात महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ रही हैं।\n\n2. सरपंच पद की रेस में चर्चा का मुख्य केंद्र कौन सी दो महिलाएं हैं?\nमीरा बेनीवाल और राजबाला बेनीवाल इस चुनाव में मुख्य चर्चा का केंद्र हैं, जोसगी बहनें हैं।\n\n3. मीरा बेनीवाल और राजबाला बेनीवाल का सांसद हनुमान बेनीवाल से क्या रिश्ता है?\nदोनों महिलाएं रिश्ते में सांसद हनुमान बेनीवाल की भाभियां हैं।\n\n4. बरणगांव और उससे जुड़े क्षेत्रों में कुल कितने मतदाता हैं?\nबरणगांव, बूढ़ी और अर्जुनपुरा क्षेत्र के आंकड़ों के मुताबिक यहां कुल 2,970 मतदाता हैं।\n\n5. स्व. रामप्रसाद बेनीवाल का बरणगांव की राजनीति से क्या संबंध रहा है?\nस्व. रामप्रसाद बेनीवाल करीब 25 साल पहले बरणगांव के सरपंच रह चुके थे।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-24",
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