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  "type": "article",
  "title": "जेईई-नीट की तैयारी और डमी स्कूलों का जाल, जानिए कैसे काम करता है यह पूरा फर्जीवाड़ा",
  "summary": "केंद्रीय सूचना आयोग ने सीबीएसई से डमी स्कूलों पर सख्त कार्रवाई करने की सिफारिश की है, जहां छात्र बिना क्लास जाए सिर्फ कागजों पर दाखिला लेते हैं।",
  "content": "देशभर में इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं जैसे जेईई और नीट की तैयारी के नाम पर फल-फूल रहे डमी स्कूलों का तंत्र अब सरकारी एजेंसियों के गंभीर निशाने पर आ गया है। केंद्रीय सूचना आयोग ने सीबीएसई से कहा है कि वह अपने स्कूलों में औचक निरीक्षण अभियान चलाए ताकि नियमों का खुलेआम उल्लंघन रुक सके। इस व्यवस्था के कारण 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति का नियम बेमानी साबित हो रहा है और फर्जी पासिंग सर्टिफिकेट धड़ल्ले से जारी किए जा रहे हैं।\n\nआरटीआई खुलासे के बाद सामने आया पूरा मामला\nयह पूरा मामला भोपाल के निजी शिक्षण संस्थानों के खिलाफ दायर एक आरटीआई याचिका के बाद उजागर हुआ था। उस याचिका से यह बात सामने आई थी कि कैसे छात्र बिना एक दिन भी कक्षा में आए दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हो जाते हैं। दरअसल, देश के लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और कोचिंग संस्थानों की भागदौड़ के बीच नियमित स्कूल जाना छोड़ देते हैं। वे केवल कागजी दस्तावेजों पर किसी स्कूल के विद्यार्थी बने रहते हैं। इस स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था की वैधता और बच्चों के भविष्य पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।\n\nक्या होते हैं डमी स्कूल और कैसे चलता है इनका नेटवर्क\nडमी स्कूल ऐसे मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान होते हैं जो विद्यार्थियों को नियमित कक्षाओं में उपस्थित हुए बिना सीधे परीक्षा में बैठने की छूट देते हैं। इन्हें सामान्य बोलचाल में नॉन-अटेंडिंग स्कूल भी कहा जाता है। छात्र कोटा, सीकर या दिल्ली जैसे दूरदराज के शैक्षिक हब में रहकर पढ़ाई करते हैं, जबकि उनका पंजीकरण किसी स्थानीय स्कूल के रजिस्टर में रहता है। स्कूल प्रबंधन तय शुल्क लेकर कागजों में उनकी उपस्थिति नियमित रूप से दर्ज करता रहता है। छात्र सीधे प्रायोगिक या अंतिम बोर्ड परीक्षा के समय ही संस्थान का मुंह देखते हैं।\n\nकानूनी रूप से क्या है डमी स्कूलों की स्थिति\nकानूनी लिहाज से डमी स्कूलों का संचालन पूरी तरह से गैर-कानूनी और अवैध माना जाता है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और देश के अन्य राज्य शिक्षा बोर्डों के पास स्पष्ट और कड़े दिशा-निर्देश हैं कि हर विद्यार्थी के लिए बोर्ड परीक्षा में बैठने हेतु न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है। डमी व्यवस्था बोर्ड के संबद्धता उपनियमों का सीधा और खुला उल्लंघन है। इसी कारण से हाल के महीनों में सीबीएसई ने औचक निरीक्षण तेज किए हैं और देश भर के ऐसे कई डमी संस्थानों की मान्यता रद्द कर दी है जो केवल कागजों के सहारे चल रहे थे।\n\nकौन लेते हैं एडमिशन और कैसे होती है पढ़ाई\nग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के वे छात्र जो आईआईटी-जेईई, नीट या अन्य कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे होते हैं, वे डमी स्कूलों का रुख करते हैं। उनका मानना होता है कि नियमित स्कूल जाने से उनका कीमती समय बर्बाद होगा और वे कोचिंग की पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित नहीं कर पाएंगे। उनकी पूरी शैक्षणिक तैयारी केवल कोचिंग संस्थानों, ऑनलाइन एप्लीकेशन या निजी ट्यूशन के कंधों पर टिकी होती है। ये विद्यार्थी स्कूल की पाठ्यपुस्तकों और बोर्ड के पाठ्यक्रम को कोचिंग के साथ ही खुद से मैनेज करते हैं।\n\nडमी कल्चर के फायदे और समय की बचत\nविद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के दृष्टिकोण से देखें तो इस व्यवस्था का सबसे बड़ा आकर्षण समय की बचत है। छह से आठ घंटे स्कूल की चारदीवारों में बिताने के बजाय छात्र उस बहुमूल्य समय को प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगाते हैं। इसके अलावा उन्हें स्कूल के भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स, असेंबली, यूनिफॉर्म और अटेंडेंस के मनोवैज्ञानिक दबाव से भी मुक्ति मिल जाती है। कई मामलों में छात्रों को अपने राज्य का डोमिसाइल यानी राज्य कोटा सुरक्षित रखने के लिए भी अपने गृह राज्य के डमी स्कूल में प्रवेश लेना पड़ता है।\n\nमानसिक स्वास्थ्य और समग्र विकास पर बुरा असर\nहालांकि डमी स्कूलों से समय की बचत जरूर हो जाती है, लेकिन इसके कारण बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास को भारी क्षति पहुंचती है। पंद्रह से सोलह साल की नाज़ुक उम्र में स्कूल का परिसरीय माहौल अनुशासन, टीम वर्क, आपसी दोस्ती और भावनात्मक मजबूती सिखाता है। लगातार कोचिंग संस्थानों के कमरों में बंद रहने के कारण छात्र अकेलेपन और गंभीर डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। इसके अलावा खेलकूद और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों से दूर रहने के कारण उनका व्यक्तित्व एकतरफा बनकर रह जाता है, जिससे आगे चलकर कॉलेज जीवन में उन्हें समायोजन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।\n\nइसका आप पर असर\nडमी स्कूलों पर शिकंजा कसे जाने से देश भर के छात्रों और अभिभावकों की चयन प्रक्रिया और स्कूल व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।\n\n• छात्रों पर असर: औचक निरीक्षण और सख्ती बढ़ने से छात्रों को अपनी उपस्थिति को लेकर सावधान रहना होगा और नियमित कक्षाओं में लौटना पड़ सकता है।\n• कोचिंग संस्थानों पर प्रभाव: डमी संस्कृति पर रोक लगने से कोटा और सीकर जैसे शैक्षिक केंद्रों पर चल रहे अनधिकृत मॉडल पर सीधा असर पड़ेगा।\n• अभिभावकों की चिंता: अभिभावकों को अब अपने बच्चों के लिए कोचिंग और नियमित स्कूल के बीच बेहतर संतुलन बिठाने की नई चुनौती का सामना करना होगा।\n• बोर्ड नियमों का पालन: सीबीएसई की सख्ती के बाद स्कूलों को 75 प्रतिशत उपस्थिति के नियम का कड़ाई से पालन कराना अनिवार्य होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nडमी स्कूलों के इस अनियंत्रित नेटवर्क के फैलने के पीछे मुख्य रूप से अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं का दबाव और पारंपरिक स्कूलों की समय-सापेक्ष अनिवार्यताएं हैं।\n\n• प्रतियोगिता का दबाव: जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में सफलता हासिल करने की होड़ ने छात्रों को पारंपरिक कक्षाओं से दूर करने का मुख्य कारण पैदा किया है।\n• कानूनी खामियों का लाभ: सख्त निगरानी के अभाव में कुछ निजी स्कूलों ने व्यावसायिक लाभ के लिए कागजी छात्रों का यह अवैध नेटवर्क खड़ा कर लिया।\n• आरटीआई का हस्तक्षेप: भोपाल के स्कूलों के खिलाफ दायर आरटीआई याचिका ने इस छिपे हुए फर्जीड़े को आधिकारिक दस्तावेजों के जरिए पहली बार सार्वजनिक किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डमी स्कूल किसे कहा जाता है?\nडमी स्कूल ऐसे मान्यता प्राप्त संस्थान होते हैं जो छात्रों को बिना कक्षा में आए केवल कागजों पर उपस्थिति दर्ज कर परीक्षा में बैठने की छूट देते हैं।\n\n2. केंद्रीय सूचना आयोग ने क्या सिफारिश की है?\nआयोग ने सीबीएसई से अपने स्कूलों में औचक निरीक्षण करने की सिफारिश की है ताकि डमी दाखिलों और फर्जी पासिंग सर्टिफिकेट्स पर रोक लगाई जा सके।\n\n3. बोर्ड परीक्षाओं के लिए न्यूनतम उपस्थिति कितनी अनिवार्य है?\nसीबीएसई और अन्य शिक्षा बोर्डों के नियमों के अनुसार बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है।\n\n4. यह मामला सबसे पहले कहां से सामने आया?\nयह पूरा मामला भोपाल के निजी स्कूलों के खिलाफ दायर एक आरटीआई याचिका के बाद उजागर हुआ था।\n\n5. डमी संस्कृति से छात्रों पर क्या बुरा असर पड़ता है?\nलगातार कोचिंग की चारदीवारों में बंद रहने से छात्रों में अकेलापन, डिप्रेशन और ऑलराउंड डेवलपमेंट में कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-16",
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