आईआईटी जोधपुर का बड़ा शोध, रोबोट और एआई अब करेंगे सोनोग्राफी और फ्रैक्चर की पहचान आईआईटी जोधपुर की मेडिकल एआई सिस्टम्स लैब में तीन नई तकनीकों पर काम चल रहा है, जिनमें रोबोटिक सोनोग्राफी, एआई द्वारा पसलियों के फ्रैक्चर की पहचान और डिजिटल सर्जरी ट्रेनिंग शामिल हैं। इन प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व डॉ. दीपक मिश्रा कर रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य जांच की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आने वाला है, क्योंकि देश के प्रमुख संस्थानों में अब उन्नत तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया जा रहा है। मेडिकल जांच के तरीकों से लेकर सर्जरी की ट्रेनिंग तक को पूरी तरह आधुनिक बनाने की दिशा में काम शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में जोधपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की एक विशेष लैब में अत्याधुनिक तकनीकों पर तेजी से काम किया जा रहा है। इस पूरी पहल का मुख्य उद्देश्य चिकित्सा परीक्षणों को अधिक सटीक बनाना, रिपोर्टिंग में लगने वाले लंबे समय को घटाना और मेडिकल के छात्रों को बेहतर व व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना है। इन सभी शोध परियोजनाओं की कमान संस्थान के कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक मिश्रा के हाथों में है, जिनकी देखरेख में विशेषज्ञ टीम लगातार नए आयाम स्थापित कर रही है। रोबोटिक तकनीक से आसान होगी दिल की सोनोग्राफी दिल की स्थिति का पता लगाने के लिए की जाने वाली अल्ट्रासाउंड जांच यानी इकोकार्डियोग्राफी के दौरान सही तस्वीर पाना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस प्रक्रिया में अक्सर प्रोब को बिल्कुल सटीक दिशा और सही स्थान पर रखना होता है, जो पूरी तरह से जांच करने वाले डॉक्टर या तकनीशियन के अनुभव पर निर्भर करता है। इस प्रक्रिया को अधिक सटीक और आसान बनाने के लिए एक खास रोबोटिक प्रणाली को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इस नई व्यवस्था में रोबोट खुद प्रॉब को संभालेगा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई उसे बिल्कुल सही स्थान पर रखने में लगातार मार्गदर्शन प्रदान करेगा। इस तकनीक के आ जाने से स्कैनिंग के दौरान मिलने वाली तस्वीरों की गुणवत्ता में सुधार होगा और अलग-अलग मौकों पर होने वाली जांचों में एकरूपता बनी रहेगी, जिससे निदान करना डॉक्टरों के लिए काफी आसान हो जाएगा। एआई स्कैन की मदद से पकड़े जाएंगे पसलियों के फ्रैक्चर मेडिकल एआई सिस्टम्स लैब के भीतर केवल रोबोटिक्स तक ही काम सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल इमेजिंग के गहरे विश्लेषण पर भी बड़ा शोध चल रहा है। इसके अंतर्गत सीटी स्कैन, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी महत्वपूर्ण जांचों से मिलने वाली तस्वीरों का कम्प्यूटर के जरिए गहराई से विश्लेषण करने की तकनीक विकसित की जा रही है। एजेंटिक एआई के माध्यम से यह प्रणाली शरीर के नाजुक हिस्सों, विशेषकर पसलियों में होने वाले फ्रैक्चर की सटीक जगह, उसके प्रकार और तमाम बारीकियों को तुरंत पहचान लेगी। इस तकनीक के उपयोग से चिकित्सकों को जटिल जांच परिणामों को समझने और मरीजों के इलाज से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने में बहुत बड़ी सहायता मिलेगी, जिससे समय की बचत होगी और त्रुटियों की गुंजाइश कम हो जाएगी। कम्प्यूटर स्क्रीन पर सर्जरी का अभ्यास करेंगे मेडिकल छात्र शोध की तीसरी और बेहद महत्वपूर्ण दिशा सीधे तौर पर मेडिकल के विद्यार्थियों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मियों के प्रशिक्षण से जुड़ी हुई है। इसके लिए विशेष सिमुलेटर और सर्जरी के उन्नत वीडियो तैयार करने के साथ-साथ उनका विश्लेषण करने वाले आधुनिक टूल विकसित किए जा रहे हैं। इन उपकरणों की मदद से छात्र कम्प्यूटर पर ही वर्चुअल रूप से सर्जरी की जटिल प्रक्रियाओं का अभ्यास कर सकेंगे। वे अपने द्वारा दिए गए इनपुट और निर्देशों के आधार पर चिकित्सकीय प्रक्रियाओं में फेरबदल कर सकेंगे और स्क्रीन पर उनके संभावित प्रभावों का सीधा आकलन कर पाएंगे। हालांकि, इन सभी तकनीकों को देश के अस्पतालों में नियमित रूप से और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले उनका कड़ा चिकित्सकीय परीक्षण और वैज्ञानिक सत्यापन होना अनिवार्य होगा। इसका आप पर असर यह नई तकनीक भविष्य में अस्पताल जाने वाले मरीजों और मेडिकल छात्रों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती है। • राजस्थान में: जोधपुर स्थित संस्थान में विकसित हो रही ये तकनीकें सफल होने पर स्थानीय अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण और जांच का स्तर सुधार सकती हैं। आने वाले समय में इससे राज्य के चिकित्सा संस्थानों में मरीजों को अधिक सटीक और तेज रिपोर्ट मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी। • भारत में: देश भर के मेडिकल संस्थानों और अस्पतालों में ऐसी प्रणालियों के आने से दूरदराज के इलाकों में भी सटीक जांच और बेहतर सर्जरी प्रशिक्षण मिलना आसान हो जाएगा। इससे कुल मिलाकर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधरेगी और डॉक्टरों पर काम का दबाव कुछ कम होगा। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक मेडिकल जांच में मानवीय अनुभव की भिन्नता और सर्जरी के प्रशिक्षण में आने वाली व्यावहारिक सीमाओं के कारण इन आधुनिक तकनीकों की आवश्यकता महसूस की गई। • तकनीकी आवश्यकता: इकोकार्डियोग्राफी जैसी जांच में प्रोब की स्थिति बदलने से तस्वीरों की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसे ठीक करने के लिए एआई मार्गदर्शन जरूरी माना गया। • छवि विश्लेषण की जटिलता: सीटी और एमआरआई स्कैन के दौरान फ्रैक्चर जैसी बारीक चीजों को तुरंत और सटीक रूप से पहचानने के लिए एजेंटिक एआई की जरूरत महसूस की गई। • प्रशिक्षण के नए विकल्प: मेडिकल छात्रों को वास्तविक मरीजों पर जोखिम लेने से बचाने और वर्चुअल माध्यम से सुरक्षित अभ्यास कराने के उद्देश्य से ये सिमुलेटर विकसित किए जा रहे हैं। सवाल-जवाब 1. आईआईटी जोधपुर में इन शोध परियोजनाओं का नेतृत्व कौन कर रहा है? इन शोध परियोजनाओं का नेतृत्व कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक मिश्रा कर रहे हैं। 2. रोबोटिक प्रणाली का उपयोग किस जांच के लिए विकसित किया जा रहा है? रोबोटिक प्रणाली का उपयोग दिल की अल्ट्रासाउंड जांच यानी इकोकार्डियोग्राफी के दौरान प्रॉब को सही स्थान पर रखने के लिए किया जा रहा है। 3. एआई स्कैन किस प्रकार की चोट की पहचान करने में मदद करेगा? एआई स्कैन तकनीक सीटी, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड के जरिए पसलियों में होने वाले फ्रैक्चर की सटीक पहचान करने में मदद करेगी। 4. मेडिकल छात्र कम्प्यूटर पर क्या अभ्यास कर सकेंगे? मेडिकल छात्र कम्प्यूटर और सिमुलेटर की मदद से सर्जरी की विभिन्न प्रक्रियाओं का वर्चुअल अभ्यास कर सकेंगे। 5. इन तकनीकों को अस्पतालों में उपयोग करने से पहले क्या जरूरी होगा? अस्पतालों में नियमित इस्तेमाल से पहले इन तकनीकों का चिकित्सकीय परीक्षण और वैज्ञानिक सत्यापन होना जरूरी है। https://trendkia.com/rajasthan/iit-jodhpur-develops-ai-and-robotics-tech-for-ultrasound-and-rib-fracture-detection-48127 TrendKia — Har trend, sabse pehle.