# जालोर के खेतों से 15 मुल्कों तक पहुंचा किनोवा, 3500 टन पहुंचा सालाना कारोबार

> राजस्थान के जालोर जिले में कम पानी वाली किनोवा की खेती किसानों की किस्मत संवार रही है, जहां 100 टन से शुरू होकर उपज का कारोबार अब 3500 टन के पार निकल चुका है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/jalore-ke-kheton-se-15-mulkon-taka-pahuncha-quinoa-3500-tana-pahuncha-salana-karobara-35047 · **Language:** Hindi
**Tags:** जालोर, किनोवा, कृषि व्यापार, राजस्थान, निर्यात, खेती किसानी

राजस्थान के जालोर जिले की बंजर और कम पानी वाली जमीन पर अब एक नई कृषि क्रांति आकार ले रही है। पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले स्थानीय किसान अब किनोवा जैसी पौष्टिक फसल को अपनाकर खेती का दायरा बदल रहे हैं। कभी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंडियों में पहचानी जाने वाली यह फसल अब जालोर के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर उगाई जा रही है। कम सिंचाई में बेहतर पैदावार देने वाली इस फसल ने जिले के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।

## प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन से मिला बड़ा बाजार
जालोर के खेतों से कटाई के बाद किनोवा को सीधे मंडियों में नहीं बेचा जाता, बल्कि इसे व्यवस्थित तरीके से प्रसंस्कृत किया जाता है। खेतों से लाई गई उपज को आधुनिक प्रोसेसिंग इकाइयों में पहुंचाया जाता है, जहां सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के कई कड़े चरणों से गुजरने के बाद इसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद के रूप में पैक किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के चलते उत्पाद की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ती है और यह देश के प्रमुख महानगरों के साथ-साथ विदेशों के लिए भेजा जाता है।

## पोषण से भरपूर आहार के रूप में वैश्विक मांग
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किनोवा को एक अत्यंत पौष्टिक अनाज के तौर पर मान्यता मिली हुई है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन और फाइबर के साथ-साथ आयरन एवं मैग्नीशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। खानपान में विविधता पसंद करने वाले लोग इसे सलाद, खिचड़ी, पुलाव और अन्य कई तरह के सेहतमंद व्यंजनों में प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे इसके उपभोक्ता आधार में तेजी से विस्तार हुआ है।

## स्थानीय रोजगार और 3500 टन तक पहुंचा निर्यात
किनोवा उत्पादन ने केवल किसानों की आमदनी ही नहीं बढ़ाई, बल्कि स्थानीय युवाओं और श्रमिकों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खोले हैं। फसल की छंटाई, धुलाई, पैकेजिंग और आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी संख्या में लोगों को काम मिल रहा है। कभी महज 100 टन के शुरुआती स्तर से शुरू हुआ जालोर का यह कृषि उद्यम अब 3000 से 3500 टन के सालाना कारोबार तक पहुंच चुका है। आज यहां से तैयार होने वाला किनोवा दुनिया के 15 से अधिक देशों में निर्यात किया जा रहा है, जिसने जालोर को वैश्विक कृषि मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

## इसका आप पर असर
कम पानी में किनोवा की सफल खेती और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण से किसानों की आमदनी में सुधार हुआ है और युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा हुए हैं।

- **भारत में:** कम सिंचाई वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाकर किसान सूखे की मार से बच सकते हैं। इससे देश भर में पोषक अनाजों की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलती है।
- **जालोर में:** स्थानीय स्तर पर ग्रेडिंग और पैकेजिंग इकाइयां लगने से ग्रामीणों को अपने ही जिले में रोजगार मिल रहा है। किसान अब अपनी फसल को औने-पौने दामों में बेचने के बजाय प्रोसेस्ड उत्पाद के रूप में वैश्विक स्तर पर बेच पा रहे हैं।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** बाजार में स्थानीय रूप से तैयार पौष्टिक किनोवा मिलने से स्वास्थ्यवर्धक खानपान आसान हो जाता है। लोग इसे अपने दैनिक आहार में सलाद, खिचड़ी या पुलाव के विकल्प के तौर पर शामिल कर सकते हैं।
- **कृषि निर्यातकों के लिए:** अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रोसेसिंग होने से 15 देशों में भारतीय उत्पाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। इससे विदेशी व्यापार से जुड़े व्यापारियों को सीधे ग्रामीण क्षेत्रों से तैयार माल प्राप्त करने का सुरक्षित स्रोत मिलता है।

## ऐसा क्यों हुआ
जालोर में किनोवा का कारोबार 100 टन से बढ़कर 3500 टन तक पहुंचने के पीछे कम पानी की अनुकूलता, आधुनिक प्रोसेसिंग और बढ़ती वैश्विक मांग प्रमुख वजहें रही हैं।

- **कम पानी की आवश्यकता:** जालोर की शुष्क जलवायु में पारंपरिक फसलों को पर्याप्त पानी मिलना मुश्किल होता है। किनोवा कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देता है, जिससे किसानों ने इसे प्राकृतिक विकल्प के रूप में अपनाया।
- **स्थानीय प्रोसेसिंग और ग्रेडिंग:** फसल को सीधे खेत से बेचने के बजाय सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के जरिए मूल्यवर्धन किया गया। इस व्यवस्था ने उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाकर वैश्विक खरीदारों का भरोसा जीता।
- **वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता:** प्रोटीन, फाइबर, आयरन और मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण दुनिया भर में किनोवा की मांग बढ़ी है। इस बढ़ती मांग के कारण 15 से अधिक देशों में जालोर की उपज के लिए निर्यात के रास्ते खुल गए।

## सवाल-जवाब

### 1. जालोर में किनोवा की खेती किसानों के लिए क्यों फायदेमंद साबित हो रही है?
किनोवा कम पानी में तैयार होने वाली फसल है, जो जालोर जैसे इलाके के लिए उपयुक्त है और किसानों को पारंपरिक फसलों से अलग नया बाजार देती है।

### 2. खेत से कटाई के बाद किनोवा को कैसे तैयार किया जाता है?
फसल को सीधे बाजार भेजने के बजाय प्रोसेसिंग यूनिट में सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के बाद पैक किया जाता है।

### 3. किनोवा में कौन-कौन से मुख्य पोषक तत्व पाए जाते हैं?
किनोवा में प्रोटीन और फाइबर के साथ आयरन, मैग्नीशियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं।

### 4. किनोवा को खानपान में किन रूपों में उपयोग किया जाता है?
इसे सलाद, खिचड़ी, पुलाव और कई प्रकार के पौष्टिक एवं सेहतमंद व्यंजनों में तैयार करके खाया जा सकता है।

### 5. जालोर का किनोवा कारोबार कितने टन तक पहुंच चुका है?
100 टन से शुरू हुआ यह कारोबार अब बढ़कर करीब 3000 से 3500 टन सालाना तक पहुंच गया है।

### 6. जालोर से तैयार किनोवा कितने देशों में भेजा जा रहा है?
जालोर में प्रसंस्कृत किनोवा वर्तमान में 15 से अधिक देशों में निर्यात किया जा रहा है।

## प्रेरणा और सबक
जालोर के किसानों ने जल संकट को चुनौती मानकर किनोवा जैसी नई फसल अपनाई और स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन कर अंतरराष्ट्रीय सफलता हासिल की।

- **परंपरा से हटकर नवाचार अपनाना:** पानी की कमी से जूझते इलाकों में केवल पुरानी फसलों पर निर्भर रहने के बजाय नए विकल्पों को आजमाना फायदेमंद साबित होता है। जालोर के किसानों ने विदेशी फसल को अपनी जमीन पर उगाकर यह साबित किया।
- **मूल्यवर्धन से मुनाफा बढ़ाना:** खेत से सीधे कच्चा माल बेचने के बजाय सफाई, छंटाई और पैकेजिंग करने से उत्पाद का मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। इस मॉडल से स्थानीय स्तर पर युवाओं के लिए नए काम के अवसर भी बने।
- **वैश्विक बाजार तक सीधी पहुंच बनाना:** गुणवत्ता पर ध्यान देकर छोटे जिलों की उपज को भी दुनिया के 15 देशों तक पहुंचाया जा सकता है। सही योजना और कड़े मानकों से स्थानीय कारोबार को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है।

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