# जालोर में रबी सीजन की खास फसल ईसबगोल की बुवाई शुरू, 15 नवंबर तक का समय सबसे बेहतरीन

> कम पानी में तैयार होकर किसानों को बंपर मुनाफा देने वाली ईसबगोल की बुवाई जालोर में शुरू हो चुकी है। कृषि जानकारों और किसानों के मुताबिक 15 नवंबर तक का समय इसके लिए सबसे मुफीद है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/jalore-me-rabi-season-ki-khas-fasal-isabgol-ki-buwai-shuru-15-november-tak-ka-samay-sabse-behtarein-49832 · **Language:** Hindi
**Tags:** ईसबगोल खेती, जालोर कृषि, रबी सीजन, फसल बुवाई, कृषि समाचार

जालोर जिले के खेतों में रबी सीजन की एक बेहद महत्वपूर्ण और फायदेमंद फसल की बुवाई का दौर शुरू हो चुका है। कम पानी के इस्तेमाल से बंपर पैदावार और शानदार मुनाफा देने के लिए मशहूर ईसबगोल की खेती का सीजन आ गया है। स्थानीय किसान अक्टूबर के आखिरी हफ्ते से लेकर नवंबर के शुरुआती दो हफ्तों के बीच इसकी बुवाई कर सकते हैं। कृषि जानकारों के अनुसार करीब 15 नवंबर तक का समय ईसबगोल के बीज बोने के लिए सबसे आदर्श माना जाता है। जालोर इलाके में इस औषधीय फसल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, जिससे यहां के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

इसकी खेती के लिए प्रकृति ने जालोर की जलवायु को काफी अनुकूल बनाया है। हल्की बलुई दोमट मिट्टी और ठंडा व सूखा मौसम ईसबगोल के पौधों के विकास के लिए सबसे सही रहता है। हालांकि किसानों को इस बात का खास ख्याल रखना पड़ता है कि खेत में पानी का जमाव न हो या लगातार बारिश न हो, क्योंकि ऐसी स्थिति में फसल को भारी नुकसान पहुंच सकता है। जालोर के किसान सोहनलाल के मुताबिक ईसबगोल की बेहतरीन पैदावार हासिल करने के लिए खेत की जुताई और तैयारी बहुत ही करीने से की जानी चाहिए ताकि मिट्टी में नमी का संतुलन सही रहे।

तय समय पर बुवाई करने से पौधों का विकास तेजी से और सही दिशा में होता है। बीज डालने के बाद पहली सिंचाई हमेशा फव्वारा विधि के जरिए की जानी चाहिए, ताकि खेत के हर कोने में पानी की मात्रा एक समान पहुंचे। चूंकि यह कम पानी की खपत वाली फसल है, इसलिए इसमें अन्य रबी फसलों की तुलना में पानी की बहुत कम जरूरत पड़ती है। मौसम और मिट्टी की स्थिति के मुताबिक ईसबगोल की पूरी फसल आमतौर पर लगभग 100 से 125 दिनों के भीतर पूरी तरह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। फव्वारा सिंचाई के इस्तेमाल से पानी की बचत होती है और पौधे स्वस्थ रहते हैं।

ईसबगोल का महत्व केवल खेती और पैदावार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके बीजों से निकलने वाली भूसी का उपयोग देश-दुनिया में पाचन तंत्र से जुड़े स्वास्थ्य उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर पेट की खराबी और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत पाने के लिए ईसबगोल की भूसी का घरेलू और चिकित्सीय इस्तेमाल बहुत आम है। इसके अलावा कई तरह के खाद्य पदार्थों और तमाम आयुर्वेदिक औषधीय उत्पादों के निर्माण में भी इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। जालोर के किसानों के लिए यह फसल इसलिए भी वरदान साबित होती है क्योंकि यहां की भौगोलिक परिस्थितियां इसके अनुकूल हैं और यह कम लागत में बंपर कमाई का जरिया बनती है।

## इसका आप पर असर
जालोर में ईसबगोल की बुवाई शुरू होने से कम पानी में खेती करने वाले किसानों को इस रबी सीजन में बेहतर और अतिरिक्त आमदनी का नया जरिया मिल गया है।

- **भारत में:** कम पानी में उगने वाली इस औषधीय फसल की मांग बढ़ने से किसानों को शुष्क और कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी नकदी फसल उगाने का ठोस विकल्प मिलता है। इससे देश के अन्य अर्ध-शुष्क इलाकों के किसानों को भी पानी की बचत करते हुए अपनी आय बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
- **जालोर में:** जिले के किसानों के लिए यह सीजन बलुई दोमट मिट्टी में ईसबगोल की बुवाई पूरी करके बंपर पैदावार सुनिश्चित करने का मुख्य अवसर है। स्थानीय किसानों को 15 नवंबर तक बुवाई का काम पूरा करना होगा ताकि पौधों का सही विकास हो सके और जलभराव से फसल को बचाया जा सके।

## ऐसा क्यों हुआ
जालोर क्षेत्र में ईसबगोल की खेती का मुख्य आधार यहां की भौगोलिक स्थिति और जलवायु है, जो इस विशेष फसल के विकास के अनुकूल बैठती है। समय पर बुवाई और उचित जल प्रबंधन इस फसल की सफलता के मुख्य कारक हैं।

- **अनुकूल जलवायु और मिट्टी:** हल्की बलुई दोमट मिट्टी के साथ ठंडा और सूखा मौसम ईसबगोल के पौधों की वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त प्राकृतिक स्थिति प्रदान करता है।
- **कम पानी की आवश्यकता:** यह फसल सीमित पानी और फव्वारा सिंचाई पद्धति पर आसानी से पनपती है, जिससे जल संकट वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए यह सबसे व्यावहारिक विकल्प बनती है।
- **बाजार की मांग:** इसके बीजों से तैयार होने वाली भूसी का पाचन संबंधी औषधियों और खाद्य उत्पादों में बड़े पैमाने पर उपयोग होना इसकी खेती को आर्थिक रूप से बेहद लाभकारी बनाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. जालोर में ईसबगोल की बुवाई का सबसे सही समय क्या है?
किसान अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर नवंबर के पहले या दूसरे सप्ताह तक बुवाई कर सकते हैं, और लगभग 15 नवंबर तक का समय इसके लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

### 2. ईसबगोल की खेती के लिए किस प्रकार की मिट्टी और मौसम की जरूरत होती है?
इसके लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी तथा ठंडा व सूखा मौसम सबसे अनुकूल माना जाता है।

### 3. ईसबगोल की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
मौसम और खेत की स्थिति के अनुसार ईसबगोल की फसल आमतौर पर करीब 100 से 125 दिन में पूरी तरह तैयार हो जाती है।

### 4. इस फसल में सिंचाई किस तरीके से की जाती है?
इसमें शुरुआती सिंचाई फव्वारा विधि से की जाती है ताकि खेत में पानी समान रूप से पहुंचे और जलभराव न हो।

### 5. ईसबगोल के बीजों और भूसी का मुख्य उपयोग कहां होता है?
इसके बीज से मिलने वाली भूसी का इस्तेमाल पाचन से जुड़े उत्पादों, कब्ज की समस्या के इलाज, खाद्य पदार्थों और कई औषधीय उत्पादों में किया जाता है।

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