झालावाड़ में तेरह वर्षों से अटका कैंसर केयर केंद्र, साढ़े चार करोड़ के फेर में दर-दर भटकने को मजबूर मरीज राजस्थान के झालावाड़ में कैंसर टर्शरी केयर सेंटर तेरह साल बाद भी अधूरा पड़ा है, जिससे स्थानीय और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती मरीजों को महानगरों की दौड़ लगानी पड़ रही है। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए अपने गृह जिले में समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना जीवनदान जैसा होता है, लेकिन राजस्थान के झालावाड़ में प्रशासनिक सुस्ती और वित्तीय बाधाओं ने ऐसी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। झालावाड़ मेडिकल कॉलेज परिसर में निर्माणाधीन कैंसर टर्शरी केयर सेंटर पिछले तेरह वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ है। कछुआ चाल से चल रहे निर्माण कार्य और बाद में वैश्विक महामारी के दौरान रुके कामकाज के कारण इस परियोजना की लागत निरंतर बढ़ती चली गई। अब भवन के शेष निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए चार करोड़ छियालीस लाख रुपये की अतिरिक्त राशि की दरकार है। इस जरूरी बजट के अभाव में निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है, जिसका सीधा खामियाजा झालावाड़ समेत सीमावर्ती मध्य प्रदेश के कई जिलों से आने वाले गंभीर कैंसर पीड़ितों को भुगतना पड़ रहा है। महानगरों के चक्कर काटने को विवश पीड़ित जिले में आधुनिक कैंसर चिकित्सा केंद्र तैयार न होने की वजह से मरीजों को कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और अन्य जटिल प्रक्रियाओं के लिए जयपुर, कोटा या फिर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े महानगरों का रुख करना पड़ता है। लंबी यात्राओं के कारण मरीजों को अत्यधिक शारीरिक पीड़ा तो झेलनी ही पड़ती है, साथ ही महानगरों के महंगे निजी अस्पतालों या रहने-खाने के खर्च से परिवारों की आर्थिक कमर भी टूट जाती है। सीमावर्ती मध्य प्रदेश के कई इलाकों के गरीब परिवार झालावाड़ को ही अपना निकटतम बड़ा चिकित्सा केंद्र मानते हैं, लेकिन यहां बुनियादी व्यवस्था न होने से उनकी उम्मीदें भी टूट रही हैं। समान नीति के अन्य केंद्र शुरू, झालावाड़ अब भी उपेक्षित इस पूरे मामले को लेकर खुद कैंसर से जूझ रहे पूर्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष रघुराज सिंह हाड़ा ने व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 की राष्ट्रीय नीति के तहत पूरे राज्य में कैंसर देखभाल व्यवस्था को मजबूत करने का खाका खींचा गया था। इसके तहत जयपुर में राज्य स्तरीय केंद्र और बीकानेर तथा झालावाड़ में टर्शरी कैंसर केयर सेंटर स्थापित करने के लिए धन आवंटित किया गया था। आज जयपुर और बीकानेर के कैंसर सेंटर पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं और वहां हजारों मरीजों का नियमित उपचार हो रहा है, जबकि झालावाड़ की फाइलें आज भी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। उन्होंने हाल ही में कोटा के लिए एक सौ उनचास करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत किए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि झालावाड़ के भवन में जरूरी मशीनों के लिए बजट जारी नहीं किया गया। लागत में भारी इजाफा और सार्वजनिक निजी भागीदारी की आशंका परियोजना में हुई अत्यधिक देरी ने सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ डाला है। रघुराज सिंह हाड़ा के अनुसार वर्ष 2013 में झालावाड़ मेडिकल कॉलेज को आधुनिक लीनियर एक्सीलेटर मशीन के लिए पंद्रह करोड़ रुपये और हाई डोज रेट ब्रेकीथेरेपी मशीन के लिए तीन करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे। समय बीतने के साथ इन मशीनों की अनुमानित लागत बढ़कर अब क्रमशः छत्तीस करोड़ रुपये और सात करोड़ रुपये के करीब पहुंच चुकी है। हाड़ा ने आरोप लगाया कि एक आधिकारिक बैठक में तेरह वर्षों से भवन अधूरा रहने का हवाला देते हुए इन मशीनों को सार्वजनिक निजी भागीदारी यानी पीपीपी मोड पर संचालित करने की योजना बनाई गई। उन्होंने चेताया कि अगर यह केंद्र पीपीपी मॉडल पर चला गया, तो आम और जरूरतमंद मरीजों के लिए इलाज बेहद खर्चीला हो जाएगा। चिकित्सकों के तबादले और दवाओं के बजट में कटौती का आरोप झालावाड़ में पहले से चल रहे डे-केयर कैंसर सेंटर की स्थिति पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। हाड़ा ने आरोप लगाया कि यहां स्वीकृत पद होने के बावजूद कैंसर रोग विशेषज्ञों को अन्यत्र भेज दिया गया और दो चिकित्सकों की नई पोस्टिंग गंगानगर कर दी गई। इसके साथ ही डे-केयर सेंटर में जीवनरक्षक दवाओं के बजट में भी कटौती की गई है, जिससे गरीबों को मिलने वाली निःशुल्क दवाइयों की आपूर्ति बाधित हो रही है। उन्होंने मांग की कि इस अटके हुए कैंसर अस्पताल को पूरा करने के लिए स्थानीय सांसद और विधायक को अपने क्षेत्रीय विकास कोष से वित्तीय मदद देने की तत्काल पहल करनी चाहिए ताकि इलाके के लोगों को राहत मिल सके। प्रशासनिक स्थिति और छह माह में पूरा करने का दावा निर्माण की स्थिति और बजट संकट पर झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और नियंत्रक डॉ संजय पोरवाल ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने स्वीकार किया कि कोरोना काल में काम रुकने और धीमी गति के कारण परियोजना की लागत में वृद्धि हुई है। डॉ पोरवाल के अनुसार मुख्य भवन का सिविल निर्माण कार्य काफी हद तक पूरा किया जा चुका है, लेकिन फिनिशिंग और बाकी तकनीकी काम निपटाने के लिए बजट में चार करोड़ छियालीस लाख रुपये का इजाफा हो गया है। इस अतिरिक्त धनराशि की मंजूरी के लिए राज्य सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजा जा चुका है। उनका कहना है कि जैसे ही सरकार से वित्तीय स्वीकृति मिलेगी, निर्माण एजेंसी राजस्थान राज्य सड़क विकास एवं निर्माण निगम यानी आरएसआरडीसी आगामी छह महीनों के भीतर भवन का काम मुकम्मल कर देगी। हालांकि जब तक यह प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होकर मशीनें स्थापित नहीं होतीं, तब तक मरीजों को इलाज के लिए अपनी जेबें ढीली करनी पड़ेंगी। इसका आप पर असर झालावाड़ में टर्शरी कैंसर केयर सेंटर का काम रुकने से हजारों गंभीर मरीजों को स्थानीय स्तर पर सस्ता और आधुनिक इलाज नहीं मिल पा रहा है। • भारत में: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों के तहत स्वीकृत क्षेत्रीय परियोजनाओं में देरी से देश के दूरदराज इलाकों में उन्नत कैंसर देखभाल पहुंचाने का लक्ष्य धीमा पड़ रहा है। ऐसे गतिरोधों के कारण बड़े शहरों के केंद्रीय सरकारी अस्पतालों पर गैर-जरूरी मरीज भार बढ़ता है। • झालावाड़ में: स्थानीय निवासियों और पास के मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के कैंसर पीड़ितों को उपचार के लिए जयपुर, कोटा या मुंबई जाना पड़ रहा है। हर महीने यात्रा, ठहरने और निजी अस्पतालों में हजारों रुपये खर्च होने से परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है। • मरीजों के लिए: सेंटर पूरा न होने से आधुनिक रेडिएशन और लीनियर एक्सीलेटर की सुविधा जिले में उपलब्ध नहीं है। इसके चलते नियमित थेरेपी कराने वाले कमजोर मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। • जनप्रतिनिधि पहल: स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों द्वारा सांसद व विधायक निधि से बजट जुटाने की मांग की जा रही है। अगर राज्य सरकार 4.46 करोड़ रुपये शीघ्र स्वीकृत करती है, तो आगामी छह माह में निर्माण पूरा हो सकेगा। ऐसा क्यों हुआ झालावाड़ के कैंसर टर्शरी केयर सेंटर का निर्माण पिछले तेरह वर्षों से प्रशासनिक देरी, महामारी के व्यवधान और लागत बढ़ने के कारण अटका हुआ है। • बजट की कमी: परियोजना के भवन को पूर्ण रूप देने के लिए 4 करोड़ 46 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि की जरूरत है, जिसकी मंजूरी अभी राज्य सरकार से लंबित है। इस बजट के बिना निर्माण एजेंसी काम आगे नहीं बढ़ा पा रही है। • कोविड महामारी का व्यवधान: मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार कोरोना काल के दौरान काम पूरी तरह थम गया था। इस लंबी रुकावट के चलते समय सीमा पार हो गई और निर्माण सामग्री व मजदूरी की लागत में भारी बढ़ोतरी हो गई। • मशीनों की बढ़ती लागत: वर्ष 2013 में मशीनों के लिए तय किया गया 18 करोड़ रुपये का बजट समय पर काम न होने के कारण अब बढ़कर 43 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। मशीनें खरीदने के लिए अलग से वित्तीय आवंटन न होने से भवन की उपयोगिता भी लटकी रही। • प्रशासनिक उपेक्षा के आरोप: तत्कालीन राष्ट्रीय नीति के तहत स्वीकृत जयपुर और बीकानेर के केंद्र समय पर पूरे होकर चालू हो गए, जबकि झालावाड़ में चिकित्सकों के पदों के तबादले और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के चलते योजना पिछड़ती चली गई। सवाल-जवाब 1. झालावाड़ कैंसर केयर सेंटर का निर्माण कितने समय से अटका हुआ है? इस केंद्र की परियोजना पिछले तेरह वर्षों से लंबित है और अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। 2. भवन का अधूरा काम पूरा करने के लिए कितने अतिरिक्त बजट की जरूरत है? झालावाड़ मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार शेष निर्माण कार्य निपटाने के लिए 4 करोड़ 46 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि चाहिए। 3. मशीनों की कीमतों में कितना अंतर आया है? साल 2013 में लीनियर एक्सीलेटर के लिए 15 करोड़ और ब्रेकीथेरेपी के लिए 3 करोड़ रुपये मंजूर थे, जिनकी कीमत अब बढ़कर क्रमशः करीब 36 करोड़ और 7 करोड़ रुपये हो गई है। 4. बजट मिलने के बाद निर्माण पूरा होने में कितना समय लगेगा? प्राचार्य डॉ संजय पोरवाल के मुताबिक वित्तीय स्वीकृति मिलने पर निर्माण एजेंसी आरएसआरडीसी इसे छह महीने में पूरा कर देगी। 5. इस केंद्र के न बनने से किन क्षेत्रों के मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित हैं? इससे झालावाड़ जिले के साथ-साथ पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के कैंसर मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। https://trendkia.com/rajasthan/jhalawar-men-teraha-varshon-se-ataka-cancer-care-kendra-sarhe-chara-karora-ke-phera-men-dara-dara-bhatakane-ko-majabura-marija-46928 TrendKia — Har trend, sabse pehle.