{
  "type": "article",
  "title": "झुंझुनूं के 246 साल पुराने सीताराम मंदिर में जब मूर्तियां चोरी हुईं तो 35 वर्षों तक कागज के चित्र की हुई पूजा",
  "summary": "सूरजगढ़ महल में 1780 में स्थापित ऐतिहासिक सीताराम मंदिर से जब अष्टधातु की प्रतिमाएं गायब हो गईं, तब श्रद्धालुओं ने साढ़े तीन दशक तक कागज की तस्वीर की आराधना कर अपनी अटूट आस्था को जीवित रखा।",
  "content": "राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित सूरजगढ़ कस्बे का ऐतिहासिक सीताराम मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के ढाई सदी पुराने इतिहास, राजपूताना शौर्य और जनमानस के अप्रतिम विश्वास का भी जीवंत दस्तावेज है। करीब 246 वर्ष पुराने इस पावन धाम की गाथा जितनी गौरवशाली है, उतनी ही हैरान करने वाली भी है। एक दौर ऐसा भी आया जब मंदिर के गर्भगृह से मूल देव प्रतिमाएं अचानक गायब हो गईं, लेकिन भक्तों का विश्वास तनिक भी नहीं डिगा। श्रद्धालुओं ने हार मानने के बजाय भगवान सीताराम के एक साधारण कागज के चित्र को ही साक्षात प्रभु का स्वरूप मान लिया और पूरे 35 सालों तक नियमित पूजा-अर्चना का क्रम जारी रखा।\n\n1780 में पंच पाना रियासत के शासक ने कराई थी स्थापना\nइस ऐतिहासिक मंदिर की नींव वर्ष 1780 में पंच पाना रियासत के तत्कालीन शासक ठाकुर सूरजमल ने रखी थी। ठाकुर सूरजमल भगवान श्रीराम और माता सीता के अनन्य भक्त थे। अपनी नित्य पूजा और राजपरिवार की आध्यात्मिक साधना के लिए उन्होंने सूरजगढ़ महल परिसर के भीतर ही एक भव्य देवालय का निर्माण कराया। मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीराम और माता जानकी की अत्यंत सुंदर अष्टधातु की प्रतिमाएं पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ स्थापित की गई थीं।\n\nमंदिर में देव सेवा का नियम अत्यंत कठोर और अनुशासित था। दिन के चारों पहर शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रभु की आरती, भोग और शृंगार की पुख्ता व्यवस्था की गई थी। इस अखंड सेवा कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए विशेष तौर पर एक पुजारी परिवार की नियुक्ति की गई थी, जिनकी पीढ़ियां मंदिर में प्रभु की सेवा करती रहीं।\n\n1975 में महल बिका और गायब हो गईं अष्टधातु की दुर्लभ प्रतिमाएं\nसूरजगढ़ महल और मंदिर के इतिहास में साल 1975 सबसे बड़ा मोड़ लेकर आया। इस वर्ष रियासत के पूर्व शासक परिवार के वंशजों ने सूरजगढ़ महल को बेच दिया। महल के निजी हाथों में जाने के तुरंत बाद मंदिर परिसर से सदियों पुरानी बेशकीमती अष्टधातु की दोनों मूर्तियां रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गईं। इस अप्रत्याशित घटना से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। महल की मिल्कियत बदलने की वजह से आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर तक पहुंचने के रास्ते में भी बाधाएं खड़ी हो गईं।\n\nस्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सबसे पहले मंदिर परिसर तक पहुंचने का मार्ग बहाल करवाने के लिए निरंतर प्रयास किए। जब मार्ग खुल गया, तब गर्भगृह में मूर्तियां न होने के बावजूद भक्तों ने पूजा बंद नहीं होने दी। भगवान सीताराम के एक कागज पर छपे चित्र को सिंहासन पर विराजमान किया गया और उसी को साक्षात देव विग्रह मानकर दैनिक आरती, भोग और वंदना का सिलसिला शुरू हुआ, जो लगातार 35 वर्षों तक बिना किसी रुकावट के चलता रहा।\n\n2010 में जयपुर से लाई गईं नई प्रतिमाएं, फिर लौटा गर्भगृह का वैभव\nकागज के चित्र के माध्यम से साढ़े तीन दशक तक चली यह अद्वितीय साधना साल 2010 में एक नए पड़ाव पर पहुंची। श्रद्धालुओं और स्थानीय समाज के साझा प्रयासों से राजस्थान की राजधानी जयपुर से भगवान श्रीराम और माता सीता की मनोहारी नई प्रतिमाएं तैयार करवाकर मंगवाई गईं। इसके पश्चात शुभ मुहूर्त में पूरे धार्मिक विधि-विधान, हवन और अनुष्ठान के साथ नई मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। वर्ष 2010 में प्रतिमाओं की पुनर्स्थापना के साथ ही मंदिर के गर्भगृह में एक बार फिर पाषाण विग्रह के रूप में विधिवत आराधना का दौर लौट आया।\n\nशक्ति साधना, शस्त्र पूजन और 10 हजार दीयों का भव्य दीपोत्सव\nसूरजगढ़ के इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह भी रही है कि यहां वैष्णव भक्ति के साथ-साथ शक्ति की उपासना और क्षत्रिय शौर्य परंपरा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता था। मंदिर के संस्थापक ठाकुर सूरजमल ने मां भवानी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए मंदिर प्रांगण में एक विशेष शिला पर मां शक्ति के हाथ का अंकन करवाकर उसकी प्रतिष्ठा कराई थी।\n\nआश्विन मास के शारदीय नवरात्र के पूरे नौ दिनों तक यहां मां भगवती की विशेष तांत्रिक और वैदिक रीति से पूजा होती थी। इसके उपरांत विजयादशमी यानी दशहरे के पावन पर्व पर राजसी अंदाज में शस्त्र पूजन का भव्य आयोजन किया जाता था। दशहरे के दिन शस्त्र पूजा संपन्न होते ही मंदिर में दीपोत्सव की तैयारियां जोर-शोर से आरंभ हो जाती थीं।\n\nविजयादशमी से ही मंदिर में घी के दीपक जलाने की परंपरा शुरू हो जाती थी और हर बीतते दिन के साथ प्रज्वलित दीपों की संख्या लगातार बढ़ाई जाती थी। कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली की रात पूरा मंदिर और महल प्रांगण 10 हजार से अधिक शुद्ध घी के दीपकों की अलौकिक रोशनी से जगमगा उठता था। इस भव्य आयोजन में राजपरिवार की रानियां और अन्य सदस्य भी विशेष रूप से उपस्थित रहकर दीपदान करते थे। दीप जलाने का यह महापर्व भैया दूज के दिन विशेष अनुष्ठान के साथ संपन्न होता था।\n\nवर्तमान में मनाए जाते हैं दो प्रमुख वार्षिक उत्सव\nमंदिर के व्यवस्थापक महेश कुमार (ढाणीवाले) ने बताया कि समय के थपेड़ों और महल के स्वरूप में बदलाव के कारण भले ही अब 10 हजार दीपों वाली वह प्राचीन दीपोत्सव परंपरा पहले जैसे व्यापक स्तर पर जारी नहीं है, लेकिन मंदिर का धार्मिक महत्व और भक्तों की आस्था आज भी अटूट बनी हुई है।\n\nवर्तमान समय में इस ऐतिहासिक मंदिर में वर्षभर में दो सबसे बड़े धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं। पहला प्रमुख आयोजन प्रतिवर्ष 23 जून को मूर्ति स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में होता है, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु भाग लेते हैं। वहीं दूसरा भव्य आयोजन चैत्र मास की रामनवमी पर आयोजित होता है, जब मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव पर विशेष पूजा-अर्चना, कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। करीब ढाई सौ साल का इतिहास समेटे यह देवालय आज भी राजस्थान के शेखावाटी अंचल में त्याग, तपस्या और अडिग श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है।\n\nइसका आप पर असर\nइस ऐतिहासिक मंदिर की कहानी आस्था, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय धरोहरों के संरक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलुओं को सामने लाती है।\n\n• धार्मिक विरासत: ऐतिहासिक मंदिरों की प्राचीन मूर्तियों और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए स्थानीय समितियों और प्रशासन को सतर्क निगरानी रखनी चाहिए। श्रद्धालु और शोधकर्ता शेखावाटी की इस अनूठी 246 साल पुरानी स्थापत्य व धार्मिक धरोहर के दर्शन कर सकते हैं।\n• राजस्थान में: झुंझुनूं और शेखावाटी अंचल में आने वाले पर्यटक और तीर्थयात्री सूरजगढ़ महल परिसर में इस अद्वितीय सीताराम मंदिर का भ्रमण कर सकते हैं। 23 जून को मूर्ति स्थापना दिवस और चैत्र रामनवमी पर होने वाले विशेष आयोजनों में श्रद्धालु सीधे सम्मिलित हो सकते हैं।\n• सांस्कृतिक जागरूकता: यह प्रसंग सिखाता है कि भौतिक प्रतिमाओं के अभाव में भी सामूहिक आस्था और सामुदायिक प्रयासों से ऐतिहासिक परंपराओं को दशकों तक जीवित रखा जा सकता है। स्थानीय निवासी अपनी क्षेत्रीय विरासत के दस्तावेजीकरण और संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।\n• उत्सव परंपरा: दशहरे से लेकर भैया दूज तक घी के दीये जलाने की प्राचीन परंपरा आज के परिवारों को अपनी पारंपरिक जड़ों और पर्यावरण-अनुकूल दीपोत्सव से जुड़ने की प्रेरणा देती है। लोग अपने घरों और देवालयों में इस तरह के सांस्कृतिक उत्सवों को पुनः जीवंत कर सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसूरजगढ़ के सीताराम मंदिर में कागज के चित्र की पूजा होने और परंपराओं में बदलाव आने की मुख्य वजहें ऐतिहासिक घटनाओं और संपत्ति हस्तांतरण से जुड़ी हैं।\n\n• 1975 में महल का विक्रय: रियासतकालीन व्यवस्थाएं समाप्त होने के बाद जब 1975 में तत्कालीन शासक परिवार के वंशजों ने सूरजगढ़ महल को बेचा, तो मंदिर का प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था अचानक प्रभावित हुई। इसी संक्रमण काल के दौरान मंदिर के गर्भगृह में स्थापित ऐतिहासिक अष्टधातु की प्रतिमाएं रहस्यमय तरीके से गायब हो गईं।\n• आस्था को बनाए रखने का संकल्प: मूर्तियां गायब होने और रास्ते की पाबंदियों के बावजूद स्थानीय श्रद्धालुओं ने पूजा बंद नहीं होने दी। गर्भगृह में कोई अन्य विकल्प न होने पर भक्तों ने कागज पर छपे चित्र को ही विग्रह मानकर 35 वर्षों तक नित्य अनुष्ठान जारी रखा।\n• 2010 में नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा: लंबे समय तक चित्र पूजन के बाद स्थानीय समाज और भक्तों के संयुक्त प्रयास से जयपुर से नई मूर्तियां बनवाई गईं। इसके बाद 2010 में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर पुनः शास्त्रीय स्वरूप में पूजा शुरू की गई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सूरजगढ़ के सीताराम मंदिर की स्थापना किसने और कब की थी?\nइस मंदिर की स्थापना पंच पाना रियासत के शासक ठाकुर सूरजमल ने वर्ष 1780 में अपनी नित्य पूजा-अर्चना के लिए सूरजगढ़ महल परिसर में की थी।\n\n2. मंदिर से अष्टधातु की प्रतिमाएं कब और कैसे गायब हुईं?\nवर्ष 1975 में जब शासक परिवार के वंशजों ने सूरजगढ़ महल बेच दिया, तब मंदिर से भगवान श्रीराम और माता सीता की अष्टधातु की मूर्तियां गायब हो गईं।\n\n3. प्रतिमाएं गायब होने के बाद मंदिर में पूजा कैसे जारी रही?\nभक्तों ने हार नहीं मानी और भगवान सीताराम के एक कागज के चित्र को ही देव विग्रह मानकर करीब 35 वर्षों तक नियमित रूप से पूजा-अर्चना जारी रखी।\n\n4. मंदिर में नई प्रतिमाओं की स्थापना कब की गई?\nवर्ष 2010 में जयपुर से भगवान श्रीराम और माता सीता की नई मूर्तियां लाकर विधि-विधान और वैदिक अनुष्ठान के साथ गर्भगृह में स्थापित की गईं।\n\n5. इस मंदिर की दीपोत्सव परंपरा की क्या विशेषता थी?\nविजयादशमी पर शस्त्र पूजन के बाद से दीपक जलाने का क्रम शुरू होता था और दीपावली पर मंदिर व महल परिसर में 10 हजार से अधिक शुद्ध घी के दीये जलाए जाते थे।\n\n6. वर्तमान में मंदिर में कौन से दो प्रमुख धार्मिक आयोजन होते हैं?\nमंदिर व्यवस्थापक महेश कुमार के अनुसार, हर साल 23 जून को मूर्ति स्थापना दिवस और चैत्र मास में रामनवमी पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/jhunjhunu-ke-246-sala-purane-sitaram-mndira-men-jaba-murtiyan-chori-huin-to-35-varshon-taka-kagaja-ke-chitra-ki-hui-puja-57866",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-11-08",
  "tags": [
    "सीताराम मंदिर",
    "सूरजगढ़",
    "झुंझुनूं",
    "ठाकुर सूरजमल",
    "अष्टधातु प्रतिमा",
    "राजस्थान मंदिर",
    "दीपोत्सव"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "इस ऐतिहासिक मंदिर की कहानी आस्था, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय धरोहरों के संरक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलुओं को सामने लाती है।\n\n• धार्मिक विरासत: ऐतिहासिक मंदिरों की प्राचीन मूर्तियों और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए स्थानीय समितियों और प्रशासन को सतर्क निगरानी रखनी चाहिए। श्रद्धालु और शोधकर्ता शेखावाटी की इस अनूठी 246 साल पुरानी स्थापत्य व धार्मिक धरोहर के दर्शन कर सकते हैं।\n• राजस्थान में: झुंझुनूं और शेखावाटी अंचल में आने वाले पर्यटक और तीर्थयात्री सूरजगढ़ महल परिसर में इस अद्वितीय सीताराम मंदिर का भ्रमण कर सकते हैं। 23 जून को मूर्ति स्थापना दिवस और चैत्र रामनवमी पर होने वाले विशेष आयोजनों में श्रद्धालु सीधे सम्मिलित हो सकते हैं।\n• सांस्कृतिक जागरूकता: यह प्रसंग सिखाता है कि भौतिक प्रतिमाओं के अभाव में भी सामूहिक आस्था और सामुदायिक प्रयासों से ऐतिहासिक परंपराओं को दशकों तक जीवित रखा जा सकता है। स्थानीय निवासी अपनी क्षेत्रीय विरासत के दस्तावेजीकरण और संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।\n• उत्सव परंपरा: दशहरे से लेकर भैया दूज तक घी के दीये जलाने की प्राचीन परंपरा आज के परिवारों को अपनी पारंपरिक जड़ों और पर्यावरण-अनुकूल दीपोत्सव से जुड़ने की प्रेरणा देती है। लोग अपने घरों और देवालयों में इस तरह के सांस्कृतिक उत्सवों को पुनः जीवंत कर सकते हैं।",
  "whyItHappened": "सूरजगढ़ के सीताराम मंदिर में कागज के चित्र की पूजा होने और परंपराओं में बदलाव आने की मुख्य वजहें ऐतिहासिक घटनाओं और संपत्ति हस्तांतरण से जुड़ी हैं।\n\n• 1975 में महल का विक्रय: रियासतकालीन व्यवस्थाएं समाप्त होने के बाद जब 1975 में तत्कालीन शासक परिवार के वंशजों ने सूरजगढ़ महल को बेचा, तो मंदिर का प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था अचानक प्रभावित हुई। इसी संक्रमण काल के दौरान मंदिर के गर्भगृह में स्थापित ऐतिहासिक अष्टधातु की प्रतिमाएं रहस्यमय तरीके से गायब हो गईं।\n• आस्था को बनाए रखने का संकल्प: मूर्तियां गायब होने और रास्ते की पाबंदियों के बावजूद स्थानीय श्रद्धालुओं ने पूजा बंद नहीं होने दी। गर्भगृह में कोई अन्य विकल्प न होने पर भक्तों ने कागज पर छपे चित्र को ही विग्रह मानकर 35 वर्षों तक नित्य अनुष्ठान जारी रखा।\n• 2010 में नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा: लंबे समय तक चित्र पूजन के बाद स्थानीय समाज और भक्तों के संयुक्त प्रयास से जयपुर से नई मूर्तियां बनवाई गईं। इसके बाद 2010 में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर पुनः शास्त्रीय स्वरूप में पूजा शुरू की गई।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "सूरजगढ़ के सीताराम मंदिर की स्थापना किसने और कब की थी?",
      "answer": "इस मंदिर की स्थापना पंच पाना रियासत के शासक ठाकुर सूरजमल ने वर्ष 1780 में अपनी नित्य पूजा-अर्चना के लिए सूरजगढ़ महल परिसर में की थी।"
    },
    {
      "question": "मंदिर से अष्टधातु की प्रतिमाएं कब और कैसे गायब हुईं?",
      "answer": "वर्ष 1975 में जब शासक परिवार के वंशजों ने सूरजगढ़ महल बेच दिया, तब मंदिर से भगवान श्रीराम और माता सीता की अष्टधातु की मूर्तियां गायब हो गईं।"
    },
    {
      "question": "प्रतिमाएं गायब होने के बाद मंदिर में पूजा कैसे जारी रही?",
      "answer": "भक्तों ने हार नहीं मानी और भगवान सीताराम के एक कागज के चित्र को ही देव विग्रह मानकर करीब 35 वर्षों तक नियमित रूप से पूजा-अर्चना जारी रखी।"
    },
    {
      "question": "मंदिर में नई प्रतिमाओं की स्थापना कब की गई?",
      "answer": "वर्ष 2010 में जयपुर से भगवान श्रीराम और माता सीता की नई मूर्तियां लाकर विधि-विधान और वैदिक अनुष्ठान के साथ गर्भगृह में स्थापित की गईं।"
    },
    {
      "question": "इस मंदिर की दीपोत्सव परंपरा की क्या विशेषता थी?",
      "answer": "विजयादशमी पर शस्त्र पूजन के बाद से दीपक जलाने का क्रम शुरू होता था और दीपावली पर मंदिर व महल परिसर में 10 हजार से अधिक शुद्ध घी के दीये जलाए जाते थे।"
    },
    {
      "question": "वर्तमान में मंदिर में कौन से दो प्रमुख धार्मिक आयोजन होते हैं?",
      "answer": "मंदिर व्यवस्थापक महेश कुमार के अनुसार, हर साल 23 जून को मूर्ति स्थापना दिवस और चैत्र मास में रामनवमी पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।"
    }
  ]
}