# झुंझुनूं के बख्तावरपुरा ने स्वच्छता, पूर्ण साक्षरता और पक्षी सेवा से पेश की मिसाल

> खेतड़ी रियासत काल में बसा राजस्थान के झुंझुनूं का बख्तावरपुरा गांव शत-प्रतिशत साक्षरता, स्वच्छता अभियानों और पक्षी संरक्षण की सौ साल पुरानी परंपरा के जरिए विकास का नया मॉडल बना हुआ है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/jhunjhunu-ke-bakhtawarpura-ne-svachchhata-purna-saksharata-aura-pakshi-seva-se-pesha-ki-misala-55071 · **Language:** Hindi
**Tags:** बख्तावरपुरा, झुंझुनूं, निर्मल गांव, एपीजे अब्दुल कलाम, जल संरक्षण, साक्षरता, राजस्थान

राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित बख्तावरपुरा गांव आधुनिक दौर में ग्रामीण विकास, स्वच्छता और सामाजिक चेतना का एक अनूठा उदाहरण पेश कर रहा है। करीब ढाई सौ साल पहले खेतड़ी रियासत के शासक राजा बख्तावर सिंह ने इस गांव की नींव रखी थी। कभी महज साधारण खेती-किसानी तक सीमित रहने वाले इस इलाके ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर शिक्षा और सफाई व्यवस्था में राज्य स्तर पर एक खास मुकाम हासिल किया है। वर्तमान में लगभग साढ़े चार हजार की आबादी वाले इस गांव की साक्षरता दर 100 प्रतिशत दर्ज की जाती है, जहां के बाशिंदे मुख्य रूप से कृषि कार्यों और सरकारी व निजी नौकरियों के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं।

## रियासतकालीन इतिहास और गांव का विस्तार
इतिहास के पन्नों और क्षेत्रीय बुजुर्गों की स्मृतियों के अनुसार रियासतकाल के दौरान खेतड़ी जागीर के अंतर्गत कुल 555 गांव आते थे, जिनमें बख्तावरपुरा भी प्रमुखता से शामिल था। इस गांव की बसावट की शुरुआती कड़ी खुडाना गांव के गढ़ से जुड़ी है, जहां से कटेवा परिवार के लोग आकर यहां बसे थे। प्रारंभ में इस परिवार ने यहां की उपजाऊ जमीन पर खेती करना शुरू किया। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य सामाजिक वर्गों और जातियों के लोग भी इस भूभाग पर बसते चले गए, जिससे गांव का सामाजिक दायरा लगातार बढ़ता गया। खेतड़ी के तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह के सम्मान में ही इस नई बस्ती का नाम बख्तावरपुरा रखा गया था। समय बीतने के साथ कटेवा परिवार ने न केवल कृषि क्षेत्र में प्रगति की, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई।

## स्वच्छता अभियान और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
बख्तावरपुरा के विकास पथ में सबसे बड़ा मोड़ स्वच्छता को लेकर चलाए गए जमीनी प्रयासों से आया। तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा के नेतृत्व में गांव की सूरत बदलने के लिए व्यापक स्तर पर निर्माण कार्य शुरू किए गए। गांव के हर घर में निजी शौचालयों का निर्माण कराया गया ताकि खुले में शौच से मुक्ति मिल सके। इसके साथ ही घरों से निकलने वाले गंदे पानी के व्यवस्थित निपटान के लिए सोखते गड्ढे तैयार किए गए, जिससे गलियों में जलभराव की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई। वर्षा जल के संचयन और सदुपयोग के लिए मजबूत व्यवस्थाएं स्थापित की गईं और प्रशासनिक कामकाज को सुगम बनाने के लिए एक मिनी सचिवालय भी निर्मित हुआ।

इन संगठित प्रयासों का सुखद परिणाम यह रहा कि वर्ष 2007 में बख्तावरपुरा को राजस्थान का पहला निर्मल गांव घोषित किया गया। नई दिल्ली स्थित अंबेडकर भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा को इस राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा था। स्वच्छता के क्षेत्र में मिली इस ऐतिहासिक कामयाबी के ठीक अगले वर्ष, यानी 2008 में, गांव को जल संरक्षण के उत्कृष्ट प्रबंधन के लिए भी विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

## बाबा नत्थूराम की कुटिया और पक्षी सेवा की शताब्दी पुरानी परंपरा
बख्तावरपुरा की ख्याति केवल पक्के निर्माण, साक्षरता और पुरस्कारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पर्यावरण और जीव दया से जुड़ा पहलू भी बेहद समृद्ध है। गांव के समीप बख्तावरपुरा, कंवरपुरा और विजयपुर की त्रिकोणीय सीमा पर बाबा नत्थूराम की करीब 100 साल पुरानी एक कुटिया स्थित है। यह स्थल पिछले एक दशक से पक्षी सेवा का जीवंत केंद्र बना हुआ है, जहां हर दिन सुबह और शाम हजारों परिंदों के लिए अनाज डाला जाता है। तीनों समीपवर्ती गांवों के निवासियों की इस आध्यात्मिक और परोपकारी परंपरा में अटूट आस्था है।

कुटिया समिति के प्रवक्ता कपिल कटेवा काशी के अनुसार, पक्षियों के संरक्षण की यह व्यवस्था जनसहयोग से निरंतर संचालित होती है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के पावन पर्व पर युवाओं की टोलियां तीनों गांवों में घर-घर संपर्क साधकर पक्षियों के लिए अन्न संग्रह करती हैं। इसके अलावा, गांव के परिवारों में जब भी कोई विवाह समारोह अथवा दशोठण जैसे मांगलिक अवसर होते हैं, तो लोग अपनी खुशी साझा करने के लिए कुटिया में अनाज दान करना अपना पहला कर्तव्य मानते हैं। ग्रामीण इस निरंतर सेवा को अपनी गौरवशाली विरासत और संस्कृति का अभिन्न अंग मानते हैं।

## इसका आप पर असर
बख्तावरपुरा का मॉडल यह दर्शाता है कि सामुदायिक भागीदारी और सही प्राथमिकताओं के जरिए ग्रामीण भारत स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य कैसे हासिल कर सकता है।

- **भारत में:** देश भर की ग्राम पंचायतों के लिए यह गांव बुनियादी ढांचे के विकास और खुले में शौच मुक्त परिवेश का व्यावहारिक उदाहरण है। सोखते गड्ढे और वर्षा जल संचयन की यह तकनीक अन्य सूखे क्षेत्रों में पानी की कमी दूर करने में मदद कर सकती है।
- **झुंझुनूं में:** स्थानीय निवासियों और आसपास के गांवों के लिए यह सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक सहयोग का केंद्र बना हुआ है। पक्षियों के लिए नियमित दाना वितरण और साझा जल संरक्षण से क्षेत्रीय जैव विविधता को मजबूत सहारा मिलता है।
- **पंचायत प्रतिनिधियों के लिए:** स्थानीय निकायों को स्वच्छता और नागरिक सुविधाओं के लिए समयबद्ध योजनाएं बनाने की प्रेरणा मिलती है। व्यवस्थित मिनी सचिवालय जैसी पहल से प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और सुगमता लाई जा सकती है।
- **युवाओं के लिए:** यह कहानी युवाओं को सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संगठित होने के लिए प्रेरित करती है। मकर संक्रांति जैसे त्योहारों पर अनाज संग्रह की परंपरा से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।

## ऐसा क्यों हुआ
बख्तावरपुरा की वर्तमान पहचान अचानक नहीं बनी, बल्कि यह ढाई सौ साल पुराने ऐतिहासिक आधार और दो दशक पहले शुरू हुए संगठित सुधारों की वजह से संभव हुई।

- **नेतृत्व और सामूहिक पहल:** तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा ने घरों में शौचालय और सोखते गड्ढे बनवाने की ठोस योजना तैयार की थी। ग्रामीणों ने खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने और बरसाती पानी के संचयन में पूरा सहयोग दिया, जिससे 2007 का निर्मल गांव सम्मान हासिल हुआ।
- **शिक्षा और आजीविका में बदलाव:** कटेवा परिवार और अन्य जातियों के आगमन के बाद खेती के साथ-साथ पढ़ाई-लिखाई को प्राथमिकता दी गई। समय के साथ सरकारी व निजी नौकरियों की ओर बढ़ते रुझान ने गांव की साक्षरता दर को 100 प्रतिशत तक पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभाई।
- **सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आस्था:** बाबा नत्थूराम की कुटिया पर लगभग एक सदी पहले पक्षियों को दाना डालने की जो परंपरा शुरू हुई थी, उसे भावी पीढ़ियों ने त्यागा नहीं। मांगलिक अवसरों और मकर संक्रांति पर अनाज दान करने के सामाजिक नियम ने इस परंपरा को आज तक अटूट बनाए रखा है।

## सवाल-जवाब

### 1. बख्तावरपुरा गांव की स्थापना कब और किसने की थी?
इस गांव की स्थापना करीब ढाई सौ साल पहले खेतड़ी रियासत के राजा बख्तावर सिंह ने की थी।

### 2. बख्तावरपुरा को किस वर्ष राजस्थान का पहला निर्मल गांव घोषित किया गया?
गांव को वर्ष 2007 में राज्य का पहला निर्मल गांव घोषित किया गया था।

### 3. स्वच्छता पुरस्कार गांव के किस प्रतिनिधि को और किसके हाथों मिला था?
यह पुरस्कार नई दिल्ली के अंबेडकर भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा को प्रदान किया गया था।

### 4. गांव को जल संरक्षण के लिए सम्मान कब प्राप्त हुआ?
बख्तावरपुरा को वर्ष 2008 में जल संरक्षण के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य के लिए अवार्ड मिला था।

### 5. बख्तावरपुरा की वर्तमान आबादी और साक्षरता दर कितनी है?
गांव की आबादी करीब साढ़े चार हजार है और यहां साक्षरता दर 100 प्रतिशत बताई जाती है।

### 6. गांव की स्वच्छता सुधारने के लिए कौन से मुख्य निर्माण कार्य किए गए थे?
घरों में शौचालयों का निर्माण, पानी की निकासी के लिए सोखते गड्ढे, वर्षा जल संचयन और एक मिनी सचिवालय बनवाया गया था।

### 7. बाबा नत्थूराम की कुटिया कितने वर्ष पुरानी है और यह कहां स्थित है?
यह कुटिया करीब 100 साल पुरानी है और बख्तावरपुरा, कंवरपुरा तथा विजयपुर की सीमा पर स्थित है।

### 8. पक्षियों के लिए अनाज एकत्र करने की क्या व्यवस्था है?
मकर संक्रांति पर युवा घर-घर जाकर अनाज जुटाते हैं, साथ ही शादी या दशोठण जैसे मांगलिक अवसरों पर भी ग्रामीण कुटिया में अनाज दान करते हैं।

## प्रेरणा और सबक
बख्तावरपुरा की विकास यात्रा साबित करती है कि जब कोई समुदाय सामूहिक संकल्प और दूरदर्शिता के साथ काम करता है, तो सीमित संसाधनों में भी असाधारण बदलाव लाया जा सकता है।

- **स्वच्छता को आदत बनाना:** व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता को जीवनशैली का हिस्सा बनाकर पूरा गांव अपनी दशा और दिशा बदल सकता है। बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालय और सोखते गड्ढों का निर्माण समाज में स्वाभिमान और स्वास्थ्य सुरक्षा लाता है।
- **शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता:** किसी भी क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल करना सबसे मजबूत आधारशिला है। जब हर परिवार शिक्षा के महत्व को स्वीकार करता है, तो विकास स्वतः गति पकड़ लेता है।
- **पारिस्थितिकी और जीव सेवा:** विकास के साथ-साथ प्रकृति और मूक पक्षियों के प्रति करुणा बनाए रखना एक जागरूक समाज की सच्ची पहचान है। सौ साल पुरानी दाना डालने की प्रथा यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ सहअस्तित्व ही टिकाऊ भविष्य है।
- **परंपराओं का सकारात्मक उपयोग:** त्योहारों और पारिवारिक उत्सवों को सामाजिक कार्यों एवं दान से जोड़ना समुदाय को एकजुट रखने का सशक्त माध्यम है। युवा वर्ग को इन अभियानों में शामिल करने से सांस्कृतिक मूल्यों का स्वतः हस्तांतरण होता है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._