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  "type": "article",
  "title": "झुंझुनूं के जसरापुर में रिटायर्ड सूबेदार बने युवाओं की ढाल, 7 साल में 78 को दिलाई सेना की वर्दी",
  "summary": "सेना से रिटायर होने के बाद सूबेदार महेंद्र सिंह शेखावत ने जसरापुर गांव के युवाओं को निशुल्क ट्रेनिंग देना शुरू किया। उनके 7 साल के कड़े समर्पण की बदौलत 78 युवा भारतीय सेना और अग्निवीर में भर्ती होकर देश सेवा में पहुंच चुके हैं।",
  "content": "झुंझुनूं जिले के जसरापुर गांव में देशसेवा का एक अनोखा और प्रेरणादायी अध्याय लिखा जा रहा है। भारतीय सेना में सेवा पूरी कर वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए सूबेदार महेंद्र सिंह शेखावत ने आराम की जिंदगी चुनने के बजाय अपनी जन्मभूमि के नौजवानों का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाया। अपने सैन्य जीवन के अनुशासन और तजुर्बे को उन्होंने गांव के उन युवाओं की ताकत बना दिया, जो सेना की वर्दी पहनकर सीमा पर खड़े होने का सपना देखते हैं। बीते सात सालों में उनके इस निशुल्क प्रशिक्षण अभियान ने ऐसी मिसाल पेश की है कि जसरापुर के 78 नौजवान भारतीय सेना और अग्निवीर योजना के तहत चयनित होकर देश की रक्षा में तैनात हो चुके हैं।\n\nरिटायरमेंट के बाद शुरू हुआ निशुल्क प्रशिक्षण का मिशन\nसाल 2019 में जब महेंद्र सिंह सेना की सेवा से मुक्त होकर गांव लौटे, तो उन्होंने महसूस किया कि युवाओं में जज्बा तो बहुत है लेकिन सही मार्गदर्शन और शारीरिक फिटनेस के अभाव में वे सेना भर्ती रैलियों में पिछड़ जाते हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने खेल मैदान में युवाओं को निशुल्क शारीरिक प्रशिक्षण देना शुरू किया। जो पहल कुछ लड़कों के साथ शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे एक बड़े मिशन में तब्दील हो गई। इस साल तो गांव ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया, जब एक साथ 13 युवाओं ने अग्निवीर चयन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पार कर सेना में जगह बनाई।\n\nयुवाओं के साथ खुद पसीना बहाते हैं पूर्व सूबेदार\nमहेंद्र सिंह का सिखाने का तरीका केवल मैदान के किनारे खड़े होकर निर्देश देने तक सीमित नहीं रहता। वे रोजाना सुबह और शाम के वक्त खुद खेल मैदान में उतरते हैं और युवाओं के साथ पसीना बहाते हैं। सेना भर्ती की बारीकियों, दौड़ की तकनीकों और शारीरिक दक्षता के हर पहलू को वे खुद अभ्यास करके समझाते हैं। युवाओं के भीतर अनुशासन और सहनशीलता विकसित करने के लिए वे किसी भी छात्र से एक पैसा शुल्क नहीं लेते।\n\nसड़कों पर 12 किलोमीटर तक की कठिन दौड़ का अभ्यास\nसेना भर्ती की तैयारी में स्टैमिना और दौड़ को सबसे निर्णायक माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए महेंद्र सिंह रोजाना 10 से 12 किलोमीटर तक की लंबी दौड़ का अभ्यास कराते हैं। इसके लिए वे जसरापुर से चनाना, नानूवाली बावड़ी या फिर देवता गांव की ओर जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी दौड़ के दौरान महेंद्र सिंह खुद युवाओं के आगे या साथ कदमताल करते हुए दौड़ते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक गुरु खुद मैदान में पसीना नहीं बहाएगा, तब तक शिष्यों में समर्पण और अनुशासन की सच्ची भावना पैदा नहीं हो सकती।\n\nग्रामीणों और प्रवासी दानदाताओं ने सुधारी मैदान की सूरत\nशुरुआती दिनों में यह सफर आसान नहीं था, क्योंकि गांव का खेल मैदान बेहद ऊबड़-खाबड़ और कंकड़-पत्थरों से भरा था। इससे अभ्यास के दौरान युवाओं को चोट लगने और दौड़ने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इस समस्या को देखकर ग्रामीण विकास समिति सक्रिय हुई और मुंबई में रहने वाले प्रवासी भामाशाहों ने मदद का हाथ बढ़ाया। भामाशाहों के सहयोग से मैदान का समतलीकरण कराया गया और चारों ओर मजबूत तारबंदी की गई। इस सामूहिक प्रयास से मैदान की स्थिति बेहतर हो गई और वहां अभ्यास करने वाले युवाओं की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी।\n\nसफलता का श्रेय युवाओं और माता-पिता के संस्कारों को\nहाल ही में जब एक साथ 13 युवाओं का चयन अग्निवीर में हुआ, तो पूरे गांव ने मिलकर एक भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया। जब ग्रामीणों ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए महेंद्र सिंह शेखावत के निस्वार्थ प्रयासों की सराहना की, तो उन्होंने सारा श्रेय खुद लेने से मना कर दिया। उन्होंने विनम्रता से कहा कि यह पूरी सफलता युवाओं की हाड़-तोड़ मेहनत और उनके माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कारों का नतीजा है।\n\nवर्दी के बिना भी जारी है देशसेवा की दूसरी पारी\nमहेंद्र सिंह के लिए गांव के किसी भी युवा का सेना में चुना जाना किसी बड़े मेडल से कम नहीं है। सात साल पहले शुरू हुआ उनका यह निस्वार्थ प्रयास आज जसरापुर के 78 परिवारों के लिए जीवन भर का गर्व बन चुका है। महेंद्र सिंह शेखावत ने यह साबित कर दिया है कि देशसेवा सिर्फ सीमा पर बंदूक थामकर ही नहीं होती, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद भी आने वाली पीढ़ी को तराशकर देश का मजबूत प्रहरी बनाया जा सकता है। रिटायरमेंट उनकी सरकारी नौकरी का अंत जरूर था, लेकिन राष्ट्र निर्माण के संकल्प की एक सशक्त शुरुआत बन गया।\n\nइसका आप पर असर\nइस पहल से ग्रामीण युवाओं को सेना भर्ती की महंगी कोचिंग के बिना घर के पास ही व्यवस्थित और पेशेवर शारीरिक तैयारी का अवसर मिल रहा है।\n\n• भारत में: यह मॉडल अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के पूर्व सैनिकों को अपने अनुभव से स्थानीय युवाओं का मार्गदर्शन करने की व्यावहारिक प्रेरणा देता है। इससे रक्षा सेवाओं की तैयारी कर रहे साधारण पृष्ठभूमि के परिवारों का कोचिंग का भारी खर्च बचता है।\n• झुंझुनूं में: जसरापुर और आसपास के गांवों के युवाओं को 10 से 12 किलोमीटर की नियमित दौड़ और फिटनेस का निशुल्क अभ्यास मिल रहा है। गांव के 78 परिवारों में स्थायी रोजगार और वर्दी का सम्मान पहुंचने से पूरे क्षेत्र का मनोबल मजबूत हुआ है।\n• अग्निवीर अभ्यर्थियों के लिए: चयन प्रक्रिया के शारीरिक दक्षता परीक्षण को पास करने के लिए जरूरी फिटनेस तकनीक और अनुशासन सीखने को मिल रहा है। इस साल एक साथ 13 युवाओं के चयन से नए अभ्यर्थियों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा है।\n• खेल सुविधाओं पर असर: समुदाय और भामाशाहों की मदद से उबड़-खाबड़ खेल मैदान समतल और सुरक्षित बुनियादी ढांचे में बदल चुका है। इससे गांव की नई पीढ़ी को किसी भी खेल या दौड़ के अभ्यास के लिए सुरक्षित परिवेश मिला है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह सफलता पूर्व सूबेदार के निस्वार्थ समर्पण, युवाओं की निरंतर कड़ी मेहनत और ग्रामीणों के एकजुट सहयोग का प्रत्यक्ष परिणाम है।\n\n• मार्गदर्शन की कमी को पहचानना: सेना से 2019 में सेवानिवृत्त होने के बाद महेंद्र सिंह ने देखा कि ग्रामीण युवाओं में जज्बा होने के बावजूद सही फिटनेस तकनीक और मार्गदर्शन का अभाव था। उन्होंने इस कमी को दूर करने के लिए बिना कोई शुल्क लिए खुद प्रशिक्षण शुरू किया।\n• प्रशिक्षक की प्रत्यक्ष भागीदारी: केवल निर्देश देने के बजाय प्रशिक्षक खुद 10 से 12 किलोमीटर दौड़ते हैं और व्यायाम करते हैं। प्रशिक्षक को खुद पसीना बहाते देखकर युवाओं में थकान से लड़ने और निरंतरता बनाए रखने की ललक पैदा हुई।\n• सामुदायिक बुनियादी ढांचे का सुधार: शुरुआती दौर में मैदान के ऊबड़-खाबड़ होने से अभ्यास बाधित हो रहा था। ग्रामीण विकास समिति और मुंबई के प्रवासी भामाशाहों ने मैदान को समतल कर तारबंदी करवाई, जिससे तैयारी की बाधा दूर हुई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सूबेदार महेंद्र सिंह शेखावत किस गांव के रहने वाले हैं?\nवे राजस्थान के झुंझुनूं जिले के जसरापुर गांव के निवासी हैं।\n\n2. महेंद्र सिंह शेखावत सेना से कब सेवानिवृत्त हुए थे?\nवे वर्ष 2019 में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए थे।\n\n3. पिछले 7 वर्षों में जसरापुर के कितने युवा सेना में भर्ती हुए?\nउनके प्रशिक्षण और मार्गदर्शन से पिछले सात वर्षों में जसरापुर के कुल 78 युवा भारतीय सेना और अग्निवीर में चयनित हुए हैं।\n\n4. इस वर्ष गांव के कितने युवाओं का चयन एक साथ अग्निवीर में हुआ?\nइस वर्ष जसरापुर गांव के 13 युवाओं का चयन एक साथ अग्निवीर योजना के तहत हुआ है।\n\n5. प्रशिक्षण के दौरान युवा रोजाना कितनी दूरी की दौड़ लगाते हैं?\nयुवा रोजाना 10 से 12 किलोमीटर तक की दौड़ लगाते हैं, जिसमें प्रशिक्षक खुद उनके साथ दौड़ते हैं।\n\n6. दौड़ के अभ्यास के लिए कौन-से रास्ते चुने जाते हैं?\nअभ्यास के लिए जसरापुर से चनाना, नानूवाली बावड़ी और देवता गांव की ओर जाने वाले मार्गों का चयन किया जाता है।\n\n7. खेल मैदान को सुधारने में किसने सहयोग किया?\nग्रामीण विकास समिति की पहल पर मुंबई में रहने वाले प्रवासी भामाशाहों ने मैदान को समतल करवाने और तारबंदी कराने का खर्च उठाया।\n\n8. क्या इस शारीरिक प्रशिक्षण के लिए कोई शुल्क लिया जाता है?\nनहीं, महेंद्र सिंह शेखावत गांव के युवाओं को पूरी तरह निशुल्क शारीरिक प्रशिक्षण देते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nसूबेदार महेंद्र सिंह शेखावत की कहानी यह सिखाती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी समाज और राष्ट्र निर्माण में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।\n\n• उदाहरण बनकर सिखाना: उपदेश देने के बजाय जब आप खुद मैदान में उतरकर पसीना बहाते हैं, तो लोग आपका अनुसरण पूरी निष्ठा से करते हैं।\n• संसाधनों की कमी से न रुकना: खराब मैदान और सीमित सुविधाओं के बावजूद उन्होंने प्रशिक्षण शुरू किया, जिससे प्रभावित होकर समुदाय खुद मदद के लिए आगे आ गया।\n• निस्वार्थ सेवा और विनम्रता: 78 युवाओं के चयन का ऐतिहासिक श्रेय खुद लेने के बजाय उन्होंने इसका श्रेय युवाओं की मेहनत और माता-पिता के संस्कारों को दिया।",
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