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  "title": "झुंझुनूं में आज से शुरू हो रही ऐतिहासिक 24 कोसी परिक्रमा, लोहार्गल धाम में उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़",
  "summary": "शेखावाटी के प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र लोहार्गल धाम में आज से पारंपरिक 24 कोसी परिक्रमा की शुरुआत हो रही है। इस आध्यात्मिक यात्रा में भाग लेने के लिए दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।",
  "content": "राजस्थान के शेखावाटी अंचल में स्थित ऐतिहासिक लोहार्गल धाम में आज शनिवार से पारंपरिक और आस्था से परिपूर्ण 24 कोसी परिक्रमा का भव्य आगाज होने जा रहा है। इस धार्मिक अनुष्ठान को लेकर श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है और देश के विभिन्न हिस्सों से भक्तों का यहां पहुंचना लगातार जारी है। कार्यक्रम की शुरुआत के तहत पवित्र सूर्यकुंड से साधु-संतों की देखरेख में श्रद्धालुओं की यह पैदल यात्रा आगे बढ़ेगी, जिसका मुख्य आकर्षण भगवान श्री ठाकुरजी की पालकी का स्वागत होगा।\n\nइस धार्मिक आयोजन की रूपरेखा के अनुसार, खंडेला के चारोड़ा धाम से बाबा घनश्याम दास के मार्गदर्शन में भगवान श्री ठाकुरजी की मुख्य पालकी पहले ही रवाना हो चुकी है। इस पवित्र पालकी यात्रा में बड़ी संख्या में संत-महात्मा और आम श्रद्धालु शामिल हुए हैं, जो आज लोहार्गल धाम पहुंचेंगे। धाम पहुंचने पर इस पालकी का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य स्वागत किया जाएगा, जिसके तुरंत बाद सूर्यकुंड के तट से आधिकारिक रूप से परिक्रमा की शुरुआत कर दी जाएगी।\n\nयह पूरी 24 कोसी परिक्रमा केवल एक साधारण यात्रा नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सदियों पुरानी संस्कृति और लोक आस्था का एक बड़ा प्रतीक है। लोहार्गल से शुरू होने वाली यह पदयात्रा किरोड़ी, शाकंभरी, नागकुंड, टपकेश्वर, शोभावती और खोरीकुंड जैसे कई महत्वपूर्ण और पवित्र धार्मिक पड़ावों से होकर गुजरेगी। अरावली पहाड़ियों की वादियों के बीच से गुजरने वाले इस मार्ग पर भक्तजन पैदल चलते हैं और रास्तेभर होने वाले भजन-कीर्तन से संपूर्ण वातावरण पूरी तरह से आध्यात्मिक बन जाता है।\n\nइस पावन स्थल के नाम और महत्व के पीछे महाभारत काल से जुड़ा एक बेहद प्राचीन इतिहास मौजूद है। चारोड़ा धाम के महंत बाबा घनश्याम दास के हवाले से यह मान्यता प्रचलित है कि महाभारत के भीषण युद्ध के उपरांत पांडव अपने पापों के प्रायश्चित के लिए विभिन्न तीर्थों के भ्रमण पर निकले थे और इसी क्रम में वे यहां आए थे। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब उन्होंने यहां के सूर्यकुंड में स्नान किया, तब उनके सभी लोहे के अस्त्र-शस्त्र पानी में गल गए थे, जिसके बाद से इस जगह का नाम लोहार्गल पड़ गया और इसे पापों से मुक्ति दिलाने वाला प्रमुख तीर्थ माना जाने लगा।\n\nअरावली पर्वतमाला की प्राकृतिक सुंदरता के आंचल में बसा लोहार्गल नैसर्गिक सौंदर्य और धार्मिक विश्वास का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यह पूरा इलाका सात पावन जलधाराओं और अनगिनत प्राचीन तीर्थों से जुड़ा हुआ है, जहां आने वाले लोग सूर्यकुंड में डुबकी लगाने के बाद अन्य धार्मिक स्थलों के दर्शन भी करते हैं। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता है कि इस कठिन परिक्रमा को पूरा करने और कुंड में स्नान करने से मनुष्य को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।\n\nजैसे-जैसे परिक्रमा के दिन आगे बढ़ेंगे, इस धाम में आने वाले यात्रियों की संख्या में और अधिक इजाफा दर्ज किया जाएगा। इस पूरे धार्मिक अनुष्ठान का सबसे मुख्य और बड़ा आकर्षण भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर लगने वाला विशाल मेला और सूर्यकुंड का शाही स्नान रहने वाला है। इस बार यह मुख्य मेला और शाही स्नान आगामी 11 सितंबर को आयोजित किया जाएगा, जिस दिन भारी जनसैलाब के लोहार्गल जुटने की पूरी संभावना है। कुंड में आस्था की डुबकी लगाने के साथ ही श्रद्धालु अपनी इस पवित्र परिक्रमा की परंपरा को संपन्न करेंगे।\n\nइसका आप पर असर\nलोहार्गल की इस ऐतिहासिक परिक्रमा का सीधा असर धार्मिक पर्यटन, स्थानीय परिवहन और क्षेत्रीय आतिथ्य व्यापार पर पड़ता है।\n\n• भारत में: देश के विभिन्न कोनों से शेखावाटी पहुंचने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के कारण यात्रा मार्ग पर धार्मिक पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिलता है। इस आयोजन से स्थानीय छोटे कारोबारियों और हस्तशिल्प विक्रेताओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।\n• झुंझुनूं में: स्थानीय स्तर पर प्रशासन और आम नागरिकों को भारी भीड़ के प्रबंधन के लिए विशेष यातायात व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों का सामना करना पड़ता है। श्रद्धालुओं के भारी आगमन से क्षेत्र के बाजारों और परिवहन सेवाओं में खासी चहल-पहल बनी रहती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. लोहार्गल धाम में 24 कोसी परिक्रमा की शुरुआत कब से हो रही है?\nलोहार्गल धाम में 24 कोसी परिक्रमा की शुरुआत शनिवार यानी आज से हो रही है।\n\n2. भगवान श्री ठाकुरजी की मुख्य पालकी कहां से रवाना हुई थी?\nभगवान श्री ठाकुरजी की मुख्य पालकी खंडेला स्थित चारोड़ा धाम से रवाना हुई थी।\n\n3. इस परिक्रमा का मुख्य धार्मिक महत्व किस काल से जुड़ा है?\nइस परिक्रमा का मुख्य धार्मिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है।\n\n4. इस वर्ष सूर्यकुंड का शाही स्नान और मुख्य मेला कब आयोजित होगा?\nइस वर्ष मुख्य मेला और शाही स्नान 11 सितंबर को आयोजित किया जाएगा।\n\n5. लोहार्गल नाम पड़ने के पीछे क्या पौराणिक कथा है?\nमान्यता है कि यहां सूर्यकुंड में स्नान करने के दौरान पांडवों के लोहे के अस्त्र-शस्त्र गल गए थे, जिसके कारण इस स्थान का नाम लोहार्गल पड़ा।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-05",
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    "भाद्रपद अमावस्या"
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