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  "type": "article",
  "title": "जोधपुर में 11 किलो दूब से सजी तीन फीट की अनूठी गणेश प्रतिमा, विसर्जन के बाद पार्क में बिखेरेगी हरियाली",
  "summary": "जोधपुर के प्रताप नगर में पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने 11 किलो दूब और मिट्टी से गणपति की जीवंत हरी प्रतिमा तैयार की है, जिसे उत्सव के बाद पार्क में रोपा जाएगा।",
  "content": "गणेश उत्सव के पावन अवसर पर आमतौर पर मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस या धातुओं से गढ़ी गई प्रतिमाएं पंडालों और घरों में विराजती हैं, परंतु जोधपुर में प्रकृति प्रेम और गहरी आस्था का एक अद्भुत संगम सामने आया है। शहर के प्रताप नगर क्षेत्र में रहने वाले पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने दूब यानी हरी घास से भगवान गणेश की लगभग तीन फीट ऊंची एक जीवंत प्रतिमा तैयार की है। पूरी तरह हरी-भरी यह मूर्ति न केवल दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संवर्धन का ठोस संदेश भी दे रही है।\n\nमिट्टी के आधार पर 11 किलो दूब रोपकर एक महीने में गढ़ा स्वरूप\nइस अनूठी रचना को मूर्त रूप देने में सूरजमल पंवार को लगभग एक महीने का समय लगा। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत में उन्होंने सबसे पहले शुद्ध मिट्टी की सहायता से भगवान गणपति की आधार संरचना और उनका शारीरिक आकार तैयार किया। इसके उपरांत विधिवत पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चारण के साथ आधार स्वरूप पर लगभग 11 किलो दूब को रोपा गया। रोपाई के बाद करीब 15 से 20 दिनों तक नियमित रूप से उचित मात्रा में जल छिड़काव और देखभाल की गई। जैसे-जैसे घास बढ़ती और फैलती गई, भगवान गणेश का संपूर्ण विग्रह एक सघन, आकर्षक और प्राकृतिक हरी प्रतिमा में परिवर्तित हो गया।\n\nपर्यावरण संरक्षण का संकल्प और पूर्व के अनोखे प्रयोग\nसूरजमल पंवार निरंतर ऐसे रचनात्मक प्रयास करते रहे हैं जिनसे पूजा-अर्चना के साथ-साथ प्रकृति के प्रति जागरूकता फैलाई जा सके। अपनी इस परंपरा के तहत वे पहले भी विशुद्ध मिट्टी की मूर्तियां, 51 चूहों के साथ गणपति स्वरूप और फिटकरी से निर्मित प्रतिमाएं बना चुके हैं। उनका उद्देश्य यह रहा है कि देश और समाज में हरियाली का प्रसार हो तथा पर्यावरण स्वच्छ और समृद्ध बना रहे। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस बार गणपति को हरी दूब के रूप में साकार किया और भगवान से प्रकृति में निरंतर हरियाली और खुशहाली बनाए रखने का आशीर्वाद मांगा।\n\nजल में बहाने के बजाय पार्क में जीवित रहेगी प्रतिमा की घास\nइस पहल की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि उत्सव संपन्न होने के बाद भी यह संदेश थमेगा नहीं। पारंपरिक विसर्जन के तहत प्रतिमा को किसी नदी या जलाशय में प्रवाहित करने के बजाय एक सुंदर पार्क का चयन किया जाएगा। वहां इस प्रतिमा की दूब को दोबारा सुरक्षित ढंग से जमीन में रोपा जाएगा। इससे प्रतिमा में प्रयुक्त दूब जीवित बनी रहेगी और संबंधित सार्वजनिक उद्यान में हरियाली का विस्तार करेगी। इस प्रकार विसर्जन के उपरांत भी भगवान गणेश की स्मृति वर्षभर जीवंत प्रकृति के रूप में विद्यमान रहेगी।\n\nबच्चों में रचनात्मकता और आस्था का विस्तार\nसूरजमल पंवार की इस पर्यावरण अनुकूल पहल ने परिवार के नन्हे-मुन्ने बच्चों को भी गहराई से प्रभावित किया है। अपने नाना के इस समर्पण से सीख लेकर बच्चों ने भी अपने स्तर पर छोटे-छोटे गणपति बनाना शुरू कर दिया है। किसी बच्चे ने घर में उपलब्ध साधारण मिट्टी से मूर्तियां बनाई हैं तो किसी ने क्ले का उपयोग करके रचनात्मक रूप दिए हैं। इस तरह परिवार की नई पीढ़ी भी उत्सव की मूल आस्था से जुड़ते हुए पर्यावरण अनुकूल तरीकों को अपना रही है।\n\nलखजी की पोल में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप में सजे गणपति\nजोधपुर में इस उत्सव के दौरान कला और भक्ति का एक अन्य मनोहारी स्वरूप भी देखने को मिला है। शहर के लखजी की पोल स्थित साढ़ा बास में भगवान जगन्नाथ की तर्ज पर गणपति की प्रतिमा विराजित की गई है। लगभग दो फीट ऊंची इस प्रतिमा में भगवान गणेश को श्याम वर्ण का स्वरूप दिया गया है। भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक छवि से प्रेरित यह अनूठा विग्रह भी देखने वालों और दर्शनार्थियों के मध्य भारी कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों को बिना नुकसान पहुंचाए पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ने का एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है।\n\n• पर्यावरण अनुकूल उत्सव: प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से होने वाले जल प्रदूषण को रोकने के लिए जैविक सामग्रियों का उपयोग करना संभव है। इससे स्थानीय जल निकायों को दूषित होने से बचाया जा सकता है।\n• शहरी हरियाली में योगदान: विसर्जन के स्थान पर जीवित पौधों और घास को उद्यानों में रोपने से शहर में हरित क्षेत्र का विस्तार होता है। नागरिक अपने घरों और मोहल्लों में भी ऐसे विसर्जन मॉडल अपना सकते हैं।\n• आने वाली पीढ़ी के लिए सीख: बच्चों को प्राकृतिक मिट्टी और क्ले से मूर्तियां बनाने के लिए प्रेरित करने से उनमें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती है। यह परिवारों को घर पर ही रचनात्मक और सुरक्षित उत्सव मनाने की राह दिखाता है।\n• जल संरक्षण और स्वच्छता: झीलों और नदियों में मूर्तियों के विसर्जन से बचने पर जल स्रोतों की स्वच्छता बनी रहती है। इससे नगर निगम और प्रशासन पर विसर्जन के बाद सफाई का भार भी कम होता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपारंपरिक मूर्तियों के विसर्जन से नदियों और जलाशयों में होने वाले प्रदूषण को रोकने तथा प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के उद्देश्य से यह प्रतिमा तैयार की गई।\n\n• प्रदूषण की चिंता और हरित सोच: उत्सवों के दौरान जलाशयों में रसायनों और प्लास्टर के जमाव से जलीय जीवन को नुकसान पहुंचता है, जिसे रोकने के लिए पर्यावरण प्रेमी लंबे समय से विकल्पों की तलाश में रहते हैं। सूरजमल पंवार ने प्रकृति को हरा-भरा रखने की इसी भावना के तहत दूब का चुनाव किया।\n• धार्मिक परंपरा में दूब का महत्व: सनातन पूजा पद्धति में भगवान गणेश की आराधना में दूब घास को विशेष और अनिवार्य स्थान प्राप्त है। इसी आध्यात्मिक आधार को रचनात्मक स्वरूप देते हुए पूरी प्रतिमा को ही जीवित दूब से आच्छादित किया गया।\n• पूर्व प्रयोगों की निरंतरता: निर्माता द्वारा पूर्व वर्षों में मिट्टी, फिटकरी और बहु-मूषक आकृतियों के सफल निर्माण के बाद इस वर्ष कुछ और अधिक प्राकृतिक तथा उपयोगी रचने की प्रेरणा मिली। इसी कड़ी में उत्सव के बाद भी जीवित रहने वाली प्रतिमा की परिकल्पना की गई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जोधपुर में दूब से बनी गणेश प्रतिमा की ऊंचाई कितनी है?\nप्रताप नगर में तैयार की गई इस अनूठी गणेश प्रतिमा की ऊंचाई लगभग तीन फीट है।\n\n2. प्रतिमा को बनाने में कितनी दूब का इस्तेमाल किया गया?\nइस प्रतिमा के निर्माण में लगभग 11 किलो दूब का प्रयोग किया गया है।\n\n3. दूब की गणेश प्रतिमा को तैयार करने में कितना समय लगा?\nमिट्टी के आधार पर दूब रोपने और उसके पूरी तरह उगने में कुल मिलाकर लगभग एक महीने का समय लगा।\n\n4. इस अनोखी प्रतिमा का विसर्जन कैसे किया जाएगा?\nइसे पानी में बहाने के बजाय किसी सार्वजनिक पार्क में लगाया जाएगा ताकि दूब जीवित रहे और हरियाली बढ़ाए।\n\n5. प्रतिमा का निर्माण किसने किया है?\nजोधपुर के प्रताप नगर निवासी पर्यावरण प्रेमी सूरजमल पंवार ने इस प्रतिमा को तैयार किया है।\n\n6. सूरजमल पंवार इससे पहले कौन सी अनूठी प्रतिमाएं बना चुके हैं?\nवे इससे पहले मिट्टी के गणेश, 51 चूहों वाले गणेश और फिटकरी से गणपति की प्रतिमा बना चुके हैं।\n\n7. लखजी की पोल में सजी गणेश प्रतिमा की क्या विशेषता है?\nवहां भगवान जगन्नाथ की तर्ज पर करीब दो फीट ऊंची श्याम वर्ण की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई है।\n\nप्रेरणा और सबक\nसूरजमल पंवार की यह पहल सिखाती है कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।\n\n• परंपरा और प्रकृति का संतुलन: धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए भी पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया जा सकता है।\n• रचनात्मक समाधान: समस्या की केवल आलोचना करने के बजाय नए और अनूठे प्रयोगों के जरिए समाज के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया जा सकता है।\n• उत्सव के बाद भी उपयोगिता: किसी भी पर्व की सामग्रियों का ऐसा नियोजन संभव है, जो उत्सव समाप्ति के बाद भी समाज और प्रकृति के काम आ सके।\n• पारिवारिक प्रेरणा: बड़े जब प्रकृति के हित में रचनात्मक काम करते हैं, तो बच्चे भी उस आचरण को सहजता से आत्मसात कर लेते हैं।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-21",
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