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  "title": "करौली में की-बोर्ड के जादूगर बने 72 वर्षीय देवी सिंह चाहर, 35 साल से युवाओं को दिला रहे सरकारी नौकरी",
  "summary": "करौली के आगरा टाइपिंग सेंटर में 72 साल के देवी सिंह चाहर बीते 35 वर्षों से युवाओं को की-बोर्ड पर रफ्तार पकड़ने का गुर सिखा रहे हैं, जहां से निकले छात्र दिल्ली के गृह मंत्रालय से लेकर बेंगलुरु तक सेवाएं दे रहे हैं।",
  "content": "आधुनिक दौर में कम्प्यूटर और डिजिटल उपकरणों ने कामकाज के तरीकों को पूरी तरह रूपांतरित कर दिया है। सरकारी सेवाओं की भर्ती परीक्षाएं हों या फिर कॉरपोरेट जगत में रोजगार के अवसर, कम्प्यूटर ज्ञान के साथ-साथ की-बोर्ड पर तेज और सटीक टाइपिंग स्पीड की मांग लगातार बनी रहती है। राजस्थान के करौली जिले में एक ऐसा पारंपरिक संस्थान मौजूद है, जो बीते करीब साढ़े तीन दशक से स्थानीय और बाहरी युवाओं को की-बोर्ड पर उंगलियां साधने का सलीका सिखा रहा है।\n\nवर्ष 1989 से संचालित हो रहा शहर का पुराना आगरा टाइपिंग सेंटर\nयह संस्थान किसी आधुनिक कॉर्पोरेट लैब या चकाचौंध वाले बड़े संस्थान की शक्ल में नहीं है, बल्कि करौली शहर का बेहद पुराना आगरा टाइपिंग सेंटर है। इस केंद्र की स्थापना वर्ष 1989 में हुई थी। पिछले 35 वर्षों से अनवरत चल रहे इस केंद्र की मुख्य ताकत आधुनिक उपकरण या तकनीक नहीं, बल्कि 72 साल की उम्र में भी पूरी सक्रियता से युवाओं को प्रशिक्षित करने वाले देवी सिंह चाहर हैं। अपने इसी अनूठे समर्पण और पारखी मार्गदर्शन के चलते वे स्थानीय लोगों के बीच टाइपिंग के जादूगर के तौर पर लोकप्रिय हो चुके हैं।\n\nकरौली से लेकर दिल्ली के गृह मंत्रालय और बेंगलुरु तक पहुंचे प्रशिक्षित युवा\nदशकों से युवाओं का करियर संवार रहे देवी सिंह चाहर का कहना है कि उनके मार्गदर्शन में अब तक हजारों छात्र-छात्राएं टाइपिंग की बारीकियां सीख चुके हैं। इनमें से बहुत से अभ्यर्थियों ने सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सफलता अर्जित की और अपने करियर को मुकाम दिया। उनका कहना है कि करौली शहर का शायद ही ऐसा कोई सरकारी दफ्तर बचा हो, जहां उनका कोई पूर्व विद्यार्थी कार्यरत न हो। इतना ही नहीं, यहां से दक्षता हासिल करने वाले युवा दिल्ली स्थित केंद्रीय गृह मंत्रालय के कार्यालयों से लेकर बेंगलुरु के तकनीकी और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों तक में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।\n\nबुनियादी तकनीक और उंगलियों के सही मूवमेंट पर विशेष जोर\nआगरा टाइपिंग सेंटर में सीखने आने वाले अभ्यर्थियों के अनुसार, इस संस्थान की विशिष्ट पहचान यहां सिखाने की शैली है। देवी सिंह चाहर प्रशिक्षण के प्रारंभिक चरण से ही छात्रों की उंगलियों को की-बोर्ड की सटीक कीज पर रखने और संतुलित तरीके से चलाने की आदत विकसित करते हैं। चाहर बताते हैं कि उनकी पूरी पद्धति उंगलियों के सही मूवमेंट और बुनियादी अभ्यास पर टिकी है। उनका मानना है कि यदि कोई विद्यार्थी इस बुनियादी तकनीक को समझ ले, तो गति और सटीकता हासिल करना बिल्कुल भी कठिन नहीं रहता।\n\nभर्ती परीक्षाओं के टाइपिंग टेस्ट के लिए दूर-दराज से आते हैं अभ्यर्थी\nइस संस्थान में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्र बताते हैं कि करौली के स्थानीय युवाओं के अलावा बाहर के जिलों से भी बड़ी संख्या में अभ्यर्थी यहां पहुंचते हैं। विशेष रूप से ऐसे प्रतियोगी छात्र, जो सरकारी भर्ती परीक्षाओं के लिखित चरण उत्तीर्ण करने के बाद आगामी टाइपिंग टेस्ट की तैयारी में जुटते हैं, वे यहां मार्गदर्शन लेने आते हैं। देवी सिंह चाहर अपने विद्यार्थियों को केवल स्वचालित सॉफ्टवेयर के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद की देखरेख में उंगलियों के सटीक ठहराव, लय और बुनियादी नियमों के निरंतर अभ्यास पर ध्यान केंद्रित कराते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nसरकारी और प्रतियोगी परीक्षाओं में टाइपिंग स्पीड की अनिवार्यता को देखते हुए यह पारंपरिक तकनीक आज भी बेहद कारगर साबित हो रही है।\n\n• भारत में: केंद्र व राज्यों की क्लर्क, आशुलिपिक और सहायक पदों की भर्ती परीक्षाओं में टाइपिंग टेस्ट एक अनिवार्य चरण होता है। सही तकनीक से नियमित अभ्यास करने वाले अभ्यर्थी पहली बार में ही स्पीड टेस्ट आसानी से पास कर सकते हैं।\n• करौली में: स्थानीय युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े शहरों में जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। वे शहर में ही रहकर दशकों पुराने अनुभवी मार्गदर्शन से सरकारी दफ्तरों में नौकरी पाने की पात्रता हासिल कर रहे हैं।\n• प्रतियोगी छात्रों के लिए: केवल सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहने के बजाय बुनियादी फिंगर मूवमेंट सीखना गलतियों को कम करता है। इससे परीक्षा के दौरान दबाव में भी टाइपिंग में सटीकता बनी रहती है।\n• कौशल विकास: कंप्यूटर के इस युग में की-बोर्ड पर कमांड होना हर निजी और सरकारी कार्यालय में काम की गति बढ़ा देता है। यह कौशल रोजगार की संभावनाओं को तुरंत मजबूत बनाता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसरकारी नौकरियों में टाइपिंग टेस्ट की अनिवार्यता और देवी सिंह चाहर की बुनियादी शिक्षण पद्धति ने इस पुराने संस्थान को दशकों से प्रासंगिक बनाए रखा है।\n\n• शुरुआती दौर की स्थापना: वर्ष 1989 में जब कंप्यूटर का प्रसार सीमित था, तब करौली में युवाओं को रोजगारोन्मुखी हुनर देने के उद्देश्य से इस टाइपिंग केंद्र की शुरुआत की गई थी। इसके बाद से यह लगातार स्थानीय युवाओं के करियर निर्माण का माध्यम बना रहा।\n• भर्ती परीक्षाओं में टाइपिंग की अनिवार्यता: विभिन्न सरकारी विभागों में लिपिकीय और सहायक पदों के लिए लिखित परीक्षा के बाद स्पीड टेस्ट अनिवार्य होता है। इस वजह से लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थी विशेष तैयारी के लिए अनुभवी प्रशिक्षक की तलाश में यहां आते हैं।\n• पारंपरिक शिक्षण तकनीक: देवी सिंह चाहर आधुनिक सॉफ्टवेयर के बजाय शुरुआत से ही उंगलियों की सही स्थिति और संतुलन पर जोर देते हैं। इसी मजबूत बुनियादी अभ्यास के कारण यहां के छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के टाइपिंग टेस्ट में बेहतर सफलता मिलती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. करौली में टाइपिंग का जादूगर किसे कहा जाता है?\nकरौली में 72 वर्षीय देवी सिंह चाहर को टाइपिंग का जादूगर कहा जाता है, जो पिछले 35 वर्षों से युवाओं को टाइपिंग सिखा रहे हैं।\n\n2. आगरा टाइपिंग सेंटर की शुरुआत किस वर्ष हुई थी?\nआगरा टाइपिंग सेंटर की शुरुआत वर्ष 1989 में करौली में हुई थी।\n\n3. देवी सिंह चाहर से सीखे हुए युवा किन प्रमुख विभागों में सेवाएं दे रहे हैं?\nउनके छात्र करौली के स्थानीय सरकारी दफ्तरों के अलावा दिल्ली के गृह मंत्रालय और बेंगलुरु तक में सरकारी सेवाएं दे रहे हैं।\n\n4. देवी सिंह चाहर की टाइपिंग सिखाने की तकनीक में क्या खास है?\nवे विद्यार्थियों को केवल सॉफ्टवेयर के भरोसे नहीं छोड़ते, बल्कि शुरुआत से ही उंगलियों की सही स्थिति और मूवमेंट पर विशेष ध्यान देते हैं।\n\n5. आगरा टाइपिंग सेंटर में किस तरह के छात्र ज्यादा आते हैं?\nयहां स्थानीय छात्रों के अलावा सरकारी भर्ती परीक्षाओं के अन्य चरण पास करने के बाद टाइपिंग टेस्ट की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी बड़ी संख्या में आते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\n72 साल की उम्र में देवी सिंह चाहर का निस्वार्थ समर्पण यह साबित करता है कि अनुभव और बुनियादी तकनीक किसी भी आधुनिक साधन से अधिक प्रभावी हो सकते हैं।\n\n• बुनियादी तकनीक पर पकड़: किसी भी विधा में सफलता पाने के लिए सबसे पहले उसके मूल सिद्धांतों और बेसिक तकनीक को मजबूत करना चाहिए। देवी सिंह चाहर की उंगलियों के सही मूवमेंट की सीख यह दर्शाती है कि मजबूत नींव ही बड़ी उपलब्धि दिलाती है।\n• उम्र केवल एक संख्या है: 72 वर्ष की आयु में भी प्रतिदिन युवाओं को प्रशिक्षित करना सिखाता है कि सीखने और सिखाने का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता। व्यक्ति किसी भी पड़ाव पर समाज के निर्माण में सक्रिय योगदान दे सकता है।\n• संसाधनों से बड़ा समर्पण: बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर या आधुनिक लैब के बिना भी निष्ठापूर्वक काम करके हजारों युवाओं को दिल्ली के मंत्रालयों तक पहुंचाया जा सकता है। साधन सीमित होने पर भी लक्ष्य के प्रति ईमानदारी असाधारण परिणाम देती है।\n• निरंतरता ही सफलता की कुंजी: 35 वर्षों तक लगातार एक ही कार्य को पूरे मन से करना यह सिखाता है कि नियमितता से किया गया प्रयास स्थायी प्रभाव छोड़ता है।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-20",
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