करौली में मदन मोहन जी के आंगन की 250 साल पुरानी सांझी कला पर मंडराया संकट, कलाकारों ने जताई चिंता राजस्थान के करौली में पितृपक्ष के 16 दिनों तक मदन मोहन जी मंदिर में उकेरी जाने वाली ऐतिहासिक सांझी चित्रकला नई पीढ़ी के घटते रुझान के कारण अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। राजस्थान की धार्मिक नगरी करौली में पितृपक्ष के 16 दिन सिर्फ पूर्वजों के स्मरण तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इस दौरान श्री राधा मदन मोहन जी के पावन धाम में कला और भक्ति का एक अलौकिक संगम साकार होता है। मंदिर परिसर में बने एक विशेष प्राचीन चबूतरे पर कलाकार रंगों के माध्यम से समूचे ब्रजमंडल की अलौकिक छटा बिखेरते हैं। लगभग ढाई सौ साल पुरानी यह सांझी परंपरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध मानी जाती है। इसमें भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और ब्रज की स्मृतियों को बेहद बारीकी से उकेरा जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। ढाई सदी का इतिहास और ब्रज संस्कृति का साकार रूप करौली के इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा के अनुसार, सांझी की यह अनूठी परिपाटी करौली की सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहरों में शुमार है। इस कला का उद्भव और विकास यहां मदन मोहन जी के प्राकट्य और आगमन से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। सांझी केवल एक चित्रकारी नहीं है, बल्कि यह रंगों के जरिए 16 दिनों तक चलने वाला संपूर्ण ब्रजमंडल का जीवंत दर्शन है। इसमें प्रतिदिन भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं, माखन चोरी, गोवर्धन धारण और रासलीला जैसे प्रसंगों को पारंपारिक रंगों से जीवंत रूप दिया जाता है। मंदिर के प्रांगण में बना विशेष चबूतरा वर्षों से इस साधना का साक्षी रहा है, जहां पुश्तैनी कारीगर अपने आराध्य को रिझाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। घरों से सिमटकर केवल मंदिर के चबूतरे तक रह गई परंपरा स्थानीय कलाकारों का कहना है कि एक दौर था जब पितृपक्ष के दौरान करौली के लगभग हर घर में सांझी संवारी जाती थी। माताएं और बहनें दीवारों तथा आंगनों में इसे पूरी श्रद्धा से बनाती थीं। समय बीतने के साथ यह घरेलू स्तर पर पूरी तरह समाप्त हो गई और अब यह केवल मदन मोहन जी के मंदिर प्रांगण तक ही सीमित होकर रह गई है। इस कला को जीवंत बनाए रखने वाले पुश्तैनी कलाकारों की संख्या भी घटकर अब मात्र 5 से 6 रह गई है। ये गिने-चुने कलाकार आज भी इसे किसी व्यावसायिक कार्य की तरह नहीं, बल्कि मदन मोहन जी की निस्वार्थ और निष्ठावान सेवा के रूप में निभा रहे हैं। चतेरा परिवार की चौथी पीढ़ी संभाल रही है कमान इस अनूठी चित्रकला को संवारने में स्थानीय चतेरा परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। इस परिवार के सदस्य दिनेश शर्मा बताते हैं कि वे सांझी बनाने वाली चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं और उन्हें यह हुनर अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है। वे बताते हैं कि उनके लिए यह केवल एक कला नहीं, बल्कि पूर्वजों द्वारा तय किया गया एक कठोर नियम और प्रभु की अटूट सेवा है। दिनेश शर्मा स्वयं सांझी का मूल ढांचा और मॉडल तैयार करते हैं, जिसके बाद उनके सहयोगी कलाकार उसमें बारीकी से रंग भरने का काम करते हैं। वे अपनी अगली पीढ़ी को भी इस परंपरा के नियम और कौशल सिखा चुके हैं, लेकिन वर्तमान हालात उन्हें चिंतित करते हैं। घंटों की कड़ी साधना और कलाकारों की आंतरिक पीड़ा एक सांझी को पूर्ण रूप देने में लगभग 5 से 6 घंटे की अनथक मेहनत लगती है। दिनेश शर्मा के साथ इस काम में विजय भट्ट, शैलू भट्ट, मनोज शर्मा और दो-तीन अन्य पुश्तैनी कलाकार पूरी एकाग्रता से जुटते हैं। रेखांकन से लेकर रंगों के अंतिम संयोजन तक हर कदम पर अत्यधिक धैर्य और कुशलता की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद कलाकारों के मन में एक गहरी टीस है। वे मानते हैं कि सांझी का वर्तमान तो जैसे-तैसे चल रहा है, लेकिन भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। वे अपने-अपने परिवारों में इस कला को निभाने वाले संभवतः आखिरी शिल्पी हैं, क्योंकि नई पीढ़ी का रुझान इस कठिन और समय लेने वाली कला को सीखने में बहुत कम रह गया है। संरक्षण और प्रोत्साहन से ही बच सकेगी यह पुश्तैनी धरोहर कलाकार शैलू भट्ट का कहना है कि उनके पूर्वज पीढ़ियों से मदन मोहन जी की सेवा के भाव से यह कार्य करते आए हैं। हालांकि, वर्तमान में केवल उनके सुपुत्र ने ही इस विधा को सीखने में थोड़ी रुचि दिखाई है। कलाकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस प्राचीन सांझी परंपरा और इसके साधकों को उचित मंच, सम्मान और प्रोत्साहन मिले, तो आने वाली पीढ़ियां भी इससे प्रेरित होंगी। जब तक इस पारंपरिक कला को सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर पहचान नहीं मिलेगी, तब तक युवाओं को इस दुर्लभ विरासत से जोड़ पाना बेहद चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। इसका आप पर असर करौली की इस ऐतिहासिक सांझी परंपरा पर मंडराता संकट भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों के लुप्त होने की गंभीर चुनौती को रेखांकित करता है। • भारत में: यह स्थिति देश भर में सदियों पुरानी पारंपरिक हस्तकलाओं और लोक चित्रकलाओं के खत्म होते पारिस्थितिकी तंत्र की ओर ध्यान आकर्षित करती है। यदि ऐसे विरासती शिल्पों और कलाकारों को संस्थागत प्रोत्साहन तथा संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां इन दुर्लभ सांस्कृतिक कौशलों से वंचित हो जाएंगी। • करौली में: धार्मिक नगरी करौली की 250 साल पुरानी पहचान और पितृपक्ष के 16 दिवसीय उत्सव का प्रमुख आकर्षण धीरे-धीरे सीमित हो रहा है। स्थानीय स्तर पर युवाओं के सीखने और सम्मान मिलने से ही मदन मोहन जी के आंगन की यह पुश्तैनी पहचान भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सकेगी। • कला प्रेमियों के लिए: यह जानकारी शोधकर्ताओं, कला साधकों और सांस्कृतिक संगठनों के लिए इस लुप्तप्राय विधा के दस्तावेजीकरण का अवसर प्रस्तुत करती है। वे सीधे करौली पहुंचकर इन 5 से 6 कलाकारों की तकनीक और डिजाइन को सहेजने में योगदान दे सकते हैं। • पर्यटन एवं दर्शन: पितृपक्ष के दौरान करौली आने वाले श्रद्धालुओं को इस विशेष 16 दिवसीय अवसर पर मदन मोहन जी मंदिर में सांझी के दुर्लभ दर्शन अवश्य करने चाहिए। इससे पुश्तैनी कलाकारों का उत्साह बढ़ेगा और उनकी साधना को समाज में व्यापक सराहना मिल सकेगी। ऐसा क्यों हुआ करौली में सांझी चित्रकला के सिमटने और संकट में पड़ने के पीछे सामाजिक प्राथमिकताओं में बदलाव और प्रोत्साहन की कमी मुख्य कारण हैं। • सीमित दायरा और घरेलू उपेक्षा: पहले पितृपक्ष के दौरान यह कला करौली के आम घरों में नियमित रूप से बनाई जाती थी। आधुनिक जीवनशैली और समय के अभाव के चलते यह घरों से पूरी तरह विलुप्त होकर केवल एक मंदिर परिसर के चबूतरे तक सिमट गई। • युवाओं का घटता रुझान: प्रत्येक सांझी को तैयार करने में 5 से 6 घंटे का कठिन परिश्रम लगता है, जबकि वर्तमान में नई पीढ़ी इस विधा को सीखने में विशेष रुचि नहीं दिखा रही है। आर्थिक संरक्षण और सम्मान के अभाव में युवा इस पुश्तैनी कौशल को अपनाने से झिझक रहे हैं। • संरक्षण और सम्मान की दरकार: कलाकारों के अनुसार इस कला को बनाए रखने के लिए आवश्यक सामाजिक और संस्थागत प्रतिष्ठा नहीं मिल पा रही है। जब तक कलाकारों के श्रम को यथोचित सम्मान नहीं मिलता, तब तक अगली पीढ़ी को इस कठिन साधना से जोड़े रखना संभव नहीं दिखता। सवाल-जवाब 1. करौली में सांझी बनाने की परंपरा कितने साल पुरानी है? इतिहासकारों के अनुसार करौली में सांझी बनाने की यह पावन परंपरा लगभग 250 वर्ष पुरानी है। 2. सांझी चित्रकला किस अवधि में और कहां बनाई जाती है? यह चित्रकला पितृपक्ष के 16 दिनों के दौरान करौली के प्रसिद्ध श्री राधा मदन मोहन जी मंदिर परिसर के प्राचीन चबूतरे पर बनाई जाती है। 3. सांझी में मुख्य रूप से क्या चित्रित किया जाता है? सांझी में रंगों के जरिए पूरे ब्रजमंडल के दर्शन कराए जाते हैं और भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को आकृतियों में ढाला जाता है। 4. करौली में वर्तमान में कितने कलाकार इस सांझी को बनाते हैं? वर्तमान में करौली में केवल 5 से 6 चुनिंदा पुश्तैनी कलाकार ही इस परंपरा को निभा रहे हैं। 5. सांझी का मॉडल तैयार करने की मुख्य जिम्मेदारी किस परिवार की है? सांझी का मॉडल तैयार करने की मुख्य जिम्मेदारी चतेरा परिवार की है, जिसके चौथी पीढ़ी के कलाकार दिनेश शर्मा इसे संभालते हैं। 6. एक सांझी को पूरी तरह तैयार करने में कितना समय लगता है? कलाकारों के अनुसार एक सांझी को पूर्ण रूप देने में लगभग 5 से 6 घंटे का कठिन परिश्रम लगता है। 7. कलाकारों के मन में इस परंपरा को लेकर क्या मुख्य चिंता है? कलाकारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी में इसे सीखने का रुझान बहुत कम है और उचित सम्मान न मिलने से यह कला लुप्त हो सकती है। https://trendkia.com/rajasthan/karauli-men-madan-mohan-ji-ke-angana-ki-250-sala-purani-sanjhi-kala-para-mndaraya-snkata-kalakaron-ne-jatai-chinta-46826 TrendKia — Har trend, sabse pehle.