# करौली के चमड़े की देसी जूती का क्रेज, ब्रांडेड जूतों के बीच आज भी हाट में उमड़ती है भीड़

> आधुनिकता के इस दौर में भी करौली की पारंपरिक चमड़े से बनी हाथ की जूती अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है। हर सोमवार को लगने वाले हाट बाजार में मिलने वाली इन जूतियों की कीमत दो सौ रुपये से एक हजार रुपये तक होती है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/karauli-traditional-leather-shoes-remain-popular-in-weekly-markets-despite-modern-brands-39621 · **Language:** Hindi
**Tags:** करौली जूती, पारंपरिक चमड़ा जूता, सोमवार हाट, हस्तशिल्प, ग्रामीण पहनावा

बाजार में तमाम तरह के ब्रांडेड और नए डिजाइन के जूते उपलब्ध होने के बावजूद, करौली में तैयार होने वाली पारंपरिक चमड़े की जूती का क्रेज आज भी बरकरार है। हाथों से शुद्ध चमड़े का उपयोग करके बनाई जाने वाली यह जूती इस क्षेत्र की पुरानी हस्तकला का एक बेहतरीन नमूना पेश करती है, जिसे लोग आज भी काफी पसंद करते हैं।

इन जूतियों की बिक्री किसी आम दुकान पर नहीं की जाती है, बल्कि इसके लिए करौली के साप्ताहिक हाट बाजार का इंतजार करना पड़ता है जो हर सोमवार को सजता है। महीने में केवल चार बार सोमवार आने के कारण ग्राहकों के पास इन्हें खरीदने के सीमित अवसर होते हैं। यही कारण है कि हाट के दिन इस पारंपरिक उत्पाद को खरीदने वालों की भारी भीड़ देखने को मिलती है और लोगों को सप्ताह के सातों दिनों में से सिर्फ एक ही दिन का मौका मिल पाता है।

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो करौली में इस प्रकार के चमड़े के पादत्राण का चलन बहुत पुराना है। बीते समय में विशेष तौर पर बुजुर्गों और खेती किसानी से जुड़े लोगों के बीच यह पहनावा काफी लोकप्रिय रहा करता था। हालांकि समय के साथ पहनावे की शैलियों में बड़े बदलाव आए और बाजार में आधुनिक फुटवियर के अनेकों विकल्प आ गए, फिर भी इस पारंपरिक चमड़े की जूती की मांग और लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

इस पारंपरिक कला से जुड़े कारीगर गोविंद कुमार का कहना है कि इन जूतियों के निर्माण में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल करने के बजाय पूरी तरह से पारंपरिक तरीकों और हाथों की मेहनत का उपयोग किया जाता है। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत में उच्च गुणवत्ता का मजबूत और टिकाऊ चमड़ा चुना जाता है, जिसे करीने से तैयार करके सही आकार दिया जाता है और फिर हाथों से सिलाई करके अंतिम रूप दिया जाता है.

मजबूत और उच्च कोटि के चमड़े से निर्मित होने के कारण ये जूतियां अत्यधिक टिकाऊ होती हैं और लंबे वक्त तक चलती हैं। जानकारों का कहना है कि अगर इनका नियमित रूप से भी इस्तेमाल किया जाए, तो भी यह आसानी से करीब दो साल तक साथ निभाती हैं।

करौली के सोमवार को लगने वाले इस पारंपरिक बाजार में ये चमड़े की जूतियां उनकी बनावट, डिजाइन और गुणवत्ता के आधार पर लगभग 200 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक के मूल्य पर बेची जाती हैं। इन्हें खरीदने वालों में केवल शहर के स्थानीय नागरिक ही शामिल नहीं होते, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक पैदल चलने और कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए यह चमड़े की जूती बेहद आरामदायक और उपयोगी साबित होती है। इसे पहनने वाले किसानों का यह भी कहना है कि उनके घरों में उनके बुजुर्ग भी इसी तरह की पारंपरिक जूतियों का इस्तेमाल करते आए हैं। यही कारण है कि आज की आधुनिक फैशन और दिखावे की दुनिया में भी पुरानी पीढ़ी की यह विरासत आज की युवा पीढ़ी के साथ मजबूती से जुड़ी हुई है।

## इसका आप पर असर
करौली और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय खरीदारों और पारंपरिक हस्तशिल्प प्रेमियों के लिए इस साप्ताहिक बाजार की यह व्यवस्था खरीदारी के सीमित अवसर प्रदान करती है।

- **सीमित खरीदारी के दिन:** **ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था:** ग्रामीण इलाकों के किसानों और आम खरीदारों को किफायती दाम पर टिकाऊ और आरामदायक जूते मिल जाते हैं, जिससे स्थानीय कारीगरों को भी सीधा रोजगार और प्रोत्साहन मिलता है।
- **बजट अनुकूल मूल्य:** इन जूतियों की कीमत 200 रुपए से 1000 रुपए तक होने के कारण यह आम आदमी और किसानों के बजट में आसानी से फिट बैठती है।
- **हस्तशिल्प का संरक्षण:** इस पारंपरिक कला के बने रहने से स्थानीय कारीगरों की पीढ़ियों पुराना हुनर जीवित रहता है और आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक रोजगार को बढ़ावा मिलता है।
- **टिकाऊ विकल्प:** लगभग दो साल तक चलने की क्षमता के कारण खरीदारों को बार-बार नए जूते खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जिससे उनके खर्चों में बचत होती है।

## ऐसा क्यों हुआ
करौली की पारंपरिक चमड़े की जूतियों की यह निरंतर मांग आधुनिकता के इस दौर में भी इसलिए बनी हुई है क्योंकि इनका निर्माण ग्रामीण जीवनशैली और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के अनुकूल है। कारीगरों द्वारा पारंपरिक तरीकों से बिना मशीनों के किए जाने वाले श्रम से इनकी गुणवत्ता मजबूत बनी रहती है।

- **हाथ से निर्माण प्रक्रिया:** मशीनों के बजाय उच्च गुणवत्ता वाले पक्के चमड़े का उपयोग करके हाथों से सिलाई करने के कारण इन जूतियों की मजबूती और उम्र काफी बढ़ जाती है।
- **पारंपरिक विरासत:** ग्रामीण परिवारों और किसानों में पीढ़ियों से बुजुर्गों द्वारा इस शैली को अपनाने के कारण नई पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है।
- **सप्ताह में एक दिन की उपलब्धता:** केवल सोमवार को हाट लगने की अनूठी परंपरा इसके प्रति लोगों में जिज्ञासा और मांग को हमेशा जीवित रखती है।
- **आरामदायक उपयोगિતા:** ग्रामीण इलाकों की पथरीली और कठिन जमीन पर लंबे समय तक चलने के लिए यह जूती बेहद अनुकूल और आरामदायक साबित होती है।

## सवाल-जवाब

### 1. करौली की यह पारंपरिक जूती किस सामग्री से बनाई जाती है?
यह जूती शुद्ध और अच्छी गुणवत्ता वाले पक्के चमड़े से पूरी तरह हाथों द्वारा तैयार की जाती है।

### 2. करौली में इन जूतियों की बिक्री कहां और कब होती है?
इन जूतियों की बिक्री आम दुकानों पर नहीं बल्कि करौली के पारंपरिक हाट बाजार में होती है जो हर सोमवार को लगता है।

### 3. एक महीने में खरीदारों को इन जूतियों को खरीदने के कितने मौके मिलते हैं?
महीने में चार सोमवार आने के कारण खरीदारों को इन्हें खरीदने के लिए महीने में केवल चार मौके मिलते हैं।

### 4. इन पारंपरिक जूतियों की कीमत कितनी होती है?
हाट बाजार में ये जूतियां विभिन्न डिजाइनों और गुणवत्ता के आधार पर लगभग 200 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की कीमत में मिलती हैं।

### 5. नियमित इस्तेमाल करने पर यह जूती कितने समय तक चल सकती है?
मजबूत चमड़े के कारण नियमित इस्तेमाल किए जाने पर भी यह जूती करीब दो साल तक चलने का दावा किया जाता है।

### 6. इन जूतियों को मुख्य रूप से कौन पसंद करता है?
इन्हें स्थानीय लोगों के अलावा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले किसान और ग्रामीण वर्ग के लोग काफी पसंद करते हैं।

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