# कातरला में इंसानों के परिवार जैसे पले 125 से ज्यादा हिरण, चना और बाजरा खिलाने दूर-दूर से आते हैं लोग

> बाड़मेर के कातरला गांव में ग्रामीण घायल हिरणों और पक्षियों का रेस्क्यू कर परिवार की तरह देखभाल करते हैं, जहां 125 से अधिक हिरण इंसानों से बेखौफ होकर घुलमिल जाते हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/katarla-men-insanon-ke-parivara-jaise-pale-125-se-jyada-hirana-chana-aura-bajara-khilane-dura-dura-se-ate-hain-loga-40117 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाड़मेर, कातरला, हिरण, अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर, वन्यजीव संरक्षण, राजस्थान

राजस्थान के थार रेगिस्तान की तपती रेत और दूर तक फैले टीलों के बीच कुलांचे भरते हिरण मरुभूमि का चिरपरिचित नजारा पेश करते हैं। बाड़मेर जिले के कातरला गांव में इंसानों और वन्यजीवों का यह नाता केवल दूर से निहारने तक सीमित नहीं है। इस अनूठी बस्ती में कदम रखते ही वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों का अपनत्व साफ झलकता है, जहां हिरणों को महज बेजुबान जानवर न मानकर अपने सगे कुटुंब का सदस्य समझा जाता है। यहां इंसानों की आबादी से ज्यादा हिरणों की चहल-पहल आगंतुकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है, और ये वन्यजीव इंसानों को देखते ही डरने के बजाय उनके साथ उछल-कूदकर अठखेलियां करने लगते हैं।

## घायल जीवों के लिए सुरक्षित आशियाना बना कातरला
थार के विशाल मरुस्थल में इंसान और हिरण के इस आत्मीय रिश्ते की मिसाल आसपास के पूरे इलाके में दी जाती है। कातरला गांव के आसपास अगर कोई हिरण चोटिल, बीमार या लाचार हालत में मिल जाए, तो स्थानीय ग्रामीण उसे कभी जंगल में तड़पने के लिए नहीं छोड़ते। वे तुरंत उसे उठाकर अपने घर या संरक्षण स्थल पर लाते हैं, उसके घावों पर दवा-मरहम लगाते हैं और जब तक वह पूरी तरह तंदुरुस्त होकर दौड़ने लायक नहीं बन जाता, तब तक दिन-रात उसकी सेवा-टहल करते हैं। पशु-पक्षियों के प्रति इसी संवेदनशील माहौल का असर है कि बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, जालौर और प्रदेश के तमाम अन्य जिलों से लोग इन हिरणों के बीच समय बिताने और उनसे मिलने खिंचे चले आते हैं।

## अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में पल रहे 125 से अधिक हिरण
गांव में युवाओं के सामूहिक प्रयास से संचालित अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में इस समय 125 से अधिक हिरण रह रहे हैं। केंद्र से जुड़े सेवादार रामजीवन के अनुसार, यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति इन हिरणों के एकदम पास बैठकर उनसे नजरें मिलाकर बातें कर सकता है। इंसानी दुलार के इतने अभ्यस्त हो चुके ये हिरण किसी से घबराते नहीं हैं, बल्कि प्यार से पुकारते ही खुद चलकर पास आ जाते हैं। आगंतुक जब अपनी हथेलियों पर चना और बाजरा रखकर आगे बढ़ाते हैं, तो हिरण बड़े चाव से दाना चुगते हैं और कई बार खुशी में उछलकर व्यक्ति की कमर तक आकर खड़े हो जाते हैं। स्थानीय युवाओं ने साल 2020 में संगठित होकर इस अमृता देवी वन्यजीव संस्थान की नींव रखी थी। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध शिकारियों और आवारा श्वानों के हमलों से घायल होने वाले, सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बनने वाले तथा बीमारियों से ग्रस्त हिरणों को बचाकर सुरक्षित इलाज मुहैया कराना था।

## हिरणों के साथ पक्षी और अन्य बेजुबान भी पाते हैं नया जीवन
इस संरक्षण संस्थान में सिर्फ हिरण ही नहीं, बल्कि घायल नीलगाय, खरगोश, कछुए और मोर व कबूतर जैसे कई तरह के पक्षी भी उपचार के लिए लाए जाते हैं। यहां आने वाले तमाम पर्यटक और वन्यजीव प्रेमी इन दुर्लभ पलों को अपने कैमरों और मोबाइलों में सहेजते हैं। हालांकि, सेवादारों का कहना है कि असली सुकून स्क्रीन छोड़कर प्रकृति और इन बेजुबानों को अपनी खुली आंखों से देखने और महसूस करने में है। सेवादार रामजीवन बताते हैं कि उनके लिए ये केवल जंगली जीव नहीं हैं, बल्कि परिवार के अपने सदस्य हैं। जिस तरह घर के किसी सदस्य के बीमार या चोटिल होने पर चिंता होती है, ठीक उतनी ही फिक्र और तड़प गांव के हर बाशिंदे के दिल में इन हिरणों और पक्षियों के लिए हमेशा बनी रहती है।

## इसका आप पर असर
बाड़मेर के कातरला गांव का यह अनूठा संरक्षण मॉडल दिखाता है कि सामुदायिक स्तर पर संगठित होकर स्थानीय लोग कैसे जंगली जीवों के लिए सुरक्षित माहौल बना सकते हैं।

- **राजस्थान में:** घायल और आवारा श्वानों के हमले का शिकार होने वाले वन्यजीवों को त्वरित इलाज और सुरक्षित आश्रय मिल रहा है। इससे थार क्षेत्र में शिकार व सड़क हादसों से होने वाली बेजुबानों की अकाल मौतों में कमी लाने में मदद मिलती है।
- **भारत में:** यह पहल देश भर के ग्रामीण और वन्य क्षेत्रों के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रेस्क्यू मॉडल तैयार करने की स्पष्ट सीख देती है। आम नागरिक बिना सरकारी तंत्र के इंतजार के अपनी जमीन पर बेजुबानों के संरक्षण के प्रयास शुरू कर सकते हैं।
- **पर्यटन व जागरूकता:** जैसलमेर, जोधपुर और जालौर जैसे पड़ोसी जिलों से आने वाले परिवारों को वन्यजीवों के करीब जाने और संवेदनशील बनने का प्रत्यक्ष अनुभव मिलता है। इससे नई पीढ़ी में जंगली जानवरों के प्रति दया और सह-अस्तित्व की भावना मजबूत होती है।
- **पशु दाना और भागीदारी:** आगंतुक चने और बाजरे का आहार देकर रेस्क्यू सेंटर के भरण-पोषण में सीधा योगदान दे सकते हैं। इससे सामुदायिक केंद्रों को बिना किसी भारी आर्थिक संकट के चलाने में मदद मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
बाड़मेर के कातरला गांव में युवाओं ने वर्ष 2020 में घायल और असहाय हिरणों को बचाने के लिए यह रेस्क्यू सेंटर शुरू किया था। थार क्षेत्र में प्राकृतिक और मानवजनित खतरों के बढ़ते दबाव के चलते इस तरह के संगठित प्रयास की सख्त जरूरत महसूस की गई।

- **शिकार और श्वानों का आतंक:** थार के खुले इलाकों में बेसहारा हिरण अक्सर आवारा कुत्तों के झुंड और अवैध शिकारियों के निशाने पर आ जाते थे। इन घातक हमलों से बचने और गंभीर रूप से घायल जानवरों की जान बचाने के लिए इस आश्रय स्थल की शुरुआत हुई।
- **सड़क हादसे और बीमारियां:** रेगिस्तानी मार्गों पर बढ़ते यातायात और मौसमी बीमारियों की चपेट में आकर कई हिरण असहाय होकर तड़पते रहते थे। जंगल में तुरंत इलाज की सुविधा न होने के कारण ग्रामीणों ने उन्हें घर लाकर प्राथमिक चिकित्सा देने की परंपरा शुरू की।
- **सामुदायिक पहल:** कातरला के युवाओं ने संगठित रूप से वर्ष 2020 में अमृता देवी वन्यजीव संस्थान की स्थापना की। पूर्वजों की जीव दया की परंपरा को संस्थागत रूप देकर उन्होंने दवाओं, चारे और सुरक्षित बाड़ों का नियमित प्रबंध किया।

## सवाल-जवाब

### 1. कातरला गांव कहां स्थित है और यह किस बात के लिए जाना जाता है?
कातरला गांव राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है, जहां ग्रामीण घायल हिरणों और पक्षियों का रेस्क्यू कर उन्हें अपने परिवार की तरह पालते हैं।

### 2. अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में इस समय कितने हिरण मौजूद हैं?
इस रेस्क्यू सेंटर में वर्तमान में 125 से ज्यादा हिरण सुरक्षित रूप से रह रहे हैं।

### 3. कातरला में इस वन्यजीव संस्थान की शुरुआत कब और किसने की थी?
इस संस्थान की शुरुआत साल 2020 में कातरला गांव के स्थानीय युवाओं ने मिलकर की थी।

### 4. रेस्क्यू सेंटर में हिरणों के अलावा और किन जीवों का इलाज किया जाता है?
यहां हिरणों के अलावा घायल नीलगाय, खरगोश, कछुए तथा मोर व कबूतर जैसे पक्षियों का भी इलाज किया जाता है।

### 5. यहां आने वाले लोग हिरणों को क्या खिलाते हैं?
आगंतुक हिरणों को अपने हाथों से चना और बाजरा खिलाते हैं, जिसे वे बहुत चाव से खाते हैं।

## प्रेरणा और सबक
कातरला के ग्रामीणों और युवाओं का यह प्रयास साबित करता है कि बेजुबानों के प्रति सच्ची संवेदना और सामूहिक संकल्प से किसी भी सीमित संसाधन वाले इलाके में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

- **सामूहिक युवा शक्ति:** वर्ष 2020 में गांव के युवाओं ने मिलकर कदम बढ़ाया और बेजुबानों के लिए जीवनदान का जरिया बने। सीमित साधनों के बावजूद एकजुट होकर काम करने से एक स्थायी संस्थान खड़ा किया जा सकता है।
- **पारस्परिक सह-अस्तित्व:** जानवरों को डर और दूरी से देखने के बजाय उन्हें परिवार की तरह अपनाकर इंसानों और वन्यजीवों के बीच एक अटूट विश्वास कायम किया जा सकता है।
- **संवेदना को कर्म में बदलना:** घायल जानवर को केवल देखकर आगे बढ़ जाने के बजाय उसे घर लाकर सेवा करना वास्तविक करुणा की पहचान है।
- **प्रकृति से वास्तविक जुड़ाव:** मोबाइल और कैमरों की स्क्रीन से बाहर निकलकर अपनी खुली आंखों से बेजुबानों का सुख-दुख साझा करना ही सच्ची संतुष्टि देता है।

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