खाटूश्याम जी के दरबार में महकता है दुनिया का दुर्लभ इत्र, रूह गुलाब से सजी अनूठी परंपरा राजस्थान के सीकर स्थित खाटूधाम में बाबा श्याम की सेवा में 25 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकने वाला प्राकृतिक रूह गुलाब इत्र अर्पित किया जाता है। जानिए मंदिर में सदियों से चली आ रही इस दिव्य श्रृंगार परंपरा का इतिहास। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध खाटूधाम में रोजाना हजारों श्रद्धालु शीश के दानी के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस पावन धाम में देव प्रतिमा की अलौकिक सजावट हर किसी का मन मोह लेती है। मंदिर में दैनिक पूजा विधान के तहत प्रतिदिन पांच पहर की आरती संपन्न होती है, जबकि दो अलग-अलग समय पर विग्रह का विशिष्ट श्रृंगार रचाया जाता है। सामान्य देवालयों में वस्त्रों एवं स्वर्ण आभूषणों को प्राथमिकता दी जाती है, मगर इस तीर्थ में सुगंधित पुष्पों और महकते द्रव्यों का महत्व सर्वोपरि माना गया है। सुगंध के प्रति अनन्य प्रेम और पुष्पों का चयन श्री श्याम मंदिर कमेटी के पूर्व अध्यक्ष महंत मोहनदास महाराज के अनुसार, आराध्य देव को छप्पन प्रकार के व्यंजनों की अपेक्षा सुगंध अधिक प्रिय है। इसी कारण उनकी साज-सज्जा के वास्ते देशी और विदेशी प्रजातियों की बेहतरीन खुशबू वाली कलियों का प्रबंध किया जाता है। भक्तगण भी अपनी मनोकामना लेकर जब हाजिरी लगाने आते हैं, तो हाथों में ताजे लाल गुलाब और शीशियों में बंद सुगंधित द्रव्य भेंट स्वरूप लेकर पहुंचते हैं। रूह गुलाब की दुर्लभता और बाजार भाव गर्भगृह में सेवारत पुजारियों द्वारा देव स्वरूप पर विशुद्ध गुलाब जल और तेल से निर्मित पारंपरिक इत्र का लेप लगाया जाता है। इसे रूह गुलाब के नाम से पहचाना जाता है, जो अपनी सांद्रता और बेजोड़ खुशबू के लिए विख्यात है। जब गर्भगृह में यह द्रव्य अर्पित होता है, तो इसकी खुशबू समूचे प्रांगण और कतार में खड़े दर्शनार्थियों तक फैल जाती है। इस द्रव्य को तैयार करने में ताजी गुलाब पंखुड़ियों पर पारंपरिक वाष्प आसवन प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिससे इसमें किसी भी रासायनिक तत्व की मिलावट नहीं रहती। इस विधि से तैयार रस बेहद सीमित मात्रा में निकलता है, जिसके चलते बाजार में इसकी दरें असाधारण रूप से ऊंची हैं। लगभग 250 ग्राम की छोटी शीशी पांच लाख रुपये के आसपास बैठती है, जबकि एक किलोग्राम शुद्ध उत्पाद का मूल्य 20 लाख से लेकर 25 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। संत शिरोमणि आलू सिंह महाराज की विरासत सुगंध और महक से जुड़े इस सेवा भाव की शुरुआत संत शिरोमणि आलू सिंह महाराज के कालखंड में हुई थी। महंत मोहनदास महाराज ने इस संबंध में बताया कि जब आम जनमानस में इस तीर्थ का व्यापक प्रचार नहीं था, तब आलू सिंह महाराज ने गांव-गांव भ्रमण कर जनसाधारण को आस्था से जोड़ा और मंदिर पधारने का आग्रह किया। संत ने अपनी पूरी जीवन यात्रा इसी देव सेवा के प्रति समर्पित कर दी थी। उन्होंने ही विग्रह को फूलों से सजाने और दो पहर केसर, चंदन, ताजे पुष्प व सुगंधित द्रव्य अर्पित करने का नियम बांधा था। मंदिर परिसर में श्याम बगीची की स्थापना भी उसी दौर में हुई थी, जहां खिलने वाले पौधों की कलियां आज भी दैनिक सेवा में प्रभु चरणों में अर्पित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, प्राचीन समय से ही देवभोग में मुख्य रूप से खीर तथा चूरमे का प्रसाद चढ़ाने का क्रम निरंतर चला आ रहा है। इसका आप पर असर खाटूश्याम जी मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए दर्शन और पूजा सामग्री से जुड़े नियमों की स्पष्ट समझ आवश्यक है। • श्रद्धालुओं के लिए: दर्शनार्थी पूजा के लिए मंदिर के बाहर से इत्र और गुलाब की भेंट साथ ले जा सकते हैं। गर्भगृह में पुजारी भक्तों द्वारा लाई गई सुगंधित सामग्री को चरण सेवा में स्वीकार करते हैं। • राजस्थान में: सीकर जिले के खाटू कस्बे में स्थानीय इत्र और फूल विक्रेताओं की आजीविका इस दैनिक परंपरा पर टिकी है। दर्शन मार्ग पर शुद्ध पूजा सामग्री उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और ट्रस्ट व्यवस्थाएं संचालित करते हैं। • बजट और खरीदारी: सामान्य भक्तों को अत्यधिक महंगे रूह गुलाब खरीदने की आवश्यकता नहीं होती। भक्त अपनी सामर्थ्य अनुसार साधारण गुलाब जल या सुगंधित इत्र की छोटी शीशी अर्पित कर सकते हैं। • दर्शन समय: दिन में पांच बार होने वाली आरती और दो बार के विशेष श्रृंगार के समय प्रांगण में सुगंध का अनुभव सबसे तीव्र रहता है। दर्शनार्थी इन विशेष पहरों के अनुसार अपनी यात्रा का समय निर्धारित कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ खाटूश्याम जी मंदिर में विशेष इत्र और फूलों के उपयोग की परंपरा धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक भक्ति संप्रदाय से जुड़ी है। यह परिपाटी किसी आधुनिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों पूर्व स्थापित उपासना पद्धति का विस्तार है। • धार्मिक मान्यता: मंदिर की मान्यता के अनुसार बाबा श्याम को छप्पन भोग के स्थान पर मनभावन सुगंध अत्यधिक प्रिय मानी जाती है। इसी आस्था के तहत विग्रह की सेवा में देश-विदेश के चुनिंदा फूलों और विशुद्ध इत्र का उपयोग शुरू हुआ। • ऐतिहासिक परंपरा: संत शिरोमणि आलू सिंह महाराज ने अपने जीवनकाल में विग्रह के श्रृंगार में केसर, चंदन, पुष्प और सुगंधित तेलों का दैनिक प्रयोग अनिवार्य किया। उन्होंने ही मंदिर परिसर में स्थित श्याम बगीची में विशेष फूलों की खेती की नींव रखी थी। • पारंपरिक आसवन विधि: रूह गुलाब की अत्यधिक कीमत और प्रतिष्ठा उसके पारंपारिक वाष्प आसवन निर्माण पर आधारित है। रासायनिक मिलावट से मुक्त होने के कारण यह द्रव्य गर्भगृह की पवित्रता और दिव्यता के सर्वथा अनुकूल माना जाता है। सवाल-जवाब 1. खाटूश्याम जी मंदिर में किस खास इत्र का उपयोग किया जाता है? मंदिर में पुजारियों द्वारा ताजे गुलाब की पंखुड़ियों से तैयार शुद्ध प्राकृतिक 'रूह गुलाब' इत्र विग्रह के श्रृंगार में लगाया जाता है। 2. रूह गुलाब इत्र की अनुमानित कीमत कितनी होती है? इस दुर्लभ प्राकृतिक इत्र की कीमत लगभग 20 लाख से 25 लाख रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि 250 ग्राम की शीशी करीब 5 लाख रुपये में आती है। 3. मंदिर में एक दिन में कितनी बार आरती और श्रृंगार होता है? खाटूश्याम जी मंदिर में प्रतिदिन पांच बार आरती संपन्न होती है और दो बार विग्रह का विशेष श्रृंगार किया जाता है। 4. फूलों और इत्र से श्रृंगार की परंपरा किसने शुरू की थी? यह परंपरा संत शिरोमणि आलू सिंह महाराज ने शुरू की थी, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन बाबा श्याम की सेवा में समर्पित किया था। 5. बाबा श्याम को पारंपरिक रूप से किस प्रसाद का भोग लगाया जाता है? प्राचीन समय से ही बाबा श्याम के दरबार में मुख्य रूप से खीर और चूरमे का पारंपरिक भोग अर्पित किया जाता रहा है। https://trendkia.com/rajasthan/khatushyam-ji-ke-darbar-mein-mahakta-hai-duniya-ka-durlabh-itra-rooh-gulab-se-saji-anookhi-parampara-43715 TrendKia — Har trend, sabse pehle.