# खींवासर के ऊबली बालाजी धाम में पशुओं के पहले दूध के दही का लगता है अनोखा भोग, प्रसाद घर नहीं ले जाने का नियम

> राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित ऊबली का बालाजी मंदिर पशुपालकों की अनूठी आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां बजरंगबली को पहले दूध से बना दही अर्पित किया जाता है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/khinvasar-ke-ubli-balaji-dhama-men-pashuon-ke-pahale-dudha-ke-dahi-ka-lagata-hai-anokha-bhoga-prasada-ghara-nahin-le-jane-ka-niyam-56278 · **Language:** Hindi
**Tags:** ऊबली का बालाजी, खींवासर, झुंझुनूं, राजस्थान मंदिर, पशुपालन, हनुमान मंदिर, हरियाणा श्रद्धालु

राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित खींवासर गांव का ऊबली का बालाजी मंदिर अपनी सदियों पुरानी और असाधारण परंपरा के लिए पहचाना जाता है। सामान्य तौर पर हनुमान मंदिरों में लड्डू, पेड़े, हलवा या चूरमा का भोग लगाने की रीत देखी जाती है, परंतु इस प्राचीन धाम में पवनपुत्र को किसी भी प्रकार की मिठाई या तले-भुने पकवान नहीं परोसे जाते। यहां भगवान को पशु के पहले दूध से जमाया गया ताजा दही अर्पित करने का रिवाज है। स्थानीय निवासियों और पशुपालकों के मन में यह दृढ़ विश्वास है कि पशु के ब्याने के बाद उसके पहले दूध से तैयार दही जब बालाजी महाराज को समर्पित किया जाता है, तो उनके पशु पूरे साल हर प्रकार की संक्रामक और गंभीर बीमारियों से बचे रहते हैं। इसी गहरी आस्था के चलते केवल राजस्थान के विभिन्न कोनों से ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य हरियाणा के ग्रामीण भी पूरे साल इस पवित्र स्थल पर दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

## करीब दो सौ साल पुराना इतिहास और गांव की व्यावसायिक धुरी
पुजारी प्रदीप के अनुसार यह मंदिर लगभग 150 से 200 वर्ष पुराना है और यहां पहले दूध के दही का नैवेद्य चढ़ाने की परिपाटी अनवरत चली आ रही है। इस तीर्थ स्थल की लोकप्रियता और महत्ता इतनी व्यापक है कि पूरे गांव का सबसे प्रमुख व्यावसायिक इलाका भी मंदिर के नाम पर बालाजी स्टैंड कहलाता है। खींवासर की मूल आबादी और पंचायत मुख्यालय भले ही गांव के भीतरी हिस्से में स्थित हों, किंतु आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का असली केंद्र बालाजी स्टैंड ही बन चुका है। यहां स्थानीय अनाज मंडी, बैंक, बाजार, प्राथमिक सहकारी समिति और आठवीं कक्षा तक का सरकारी विद्यालय संचालित हैं। इसके अलावा आसपास के गांव जैसे बजावा, रावतका, छावसरी और छऊ के ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की जरूरतों, फसलों की बिक्री और जरूरी लेन-देन के लिए इसी स्टैंड पर आते हैं। कानून-व्यवस्था की देखरेख करने वाली स्थानीय पुलिस चौकी भी बालाजी स्टैंड खींवासर के नाम से ही दर्ज है और यह इलाका आसपास के देहाती इलाकों के लिए एक प्रमुख व्यापारिक हब बन चुका है।

## खींवासर गांव की स्थापना और दो बीघा भूमि का दान
खींवासर गांव का खुद का इतिहास करीब 300 साल पुराना माना जाता है। पिपराली से आए मूंड गोत्र के खींवाराम जाट ने इस गांव की नींव रखी थी और उन्हीं के नाम पर इस बस्ती को खींवासर कहा जाने लगा। प्रशासनिक दृष्टि से यह गांव पहले छऊ ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता था। वर्ष 2020 में एक बड़ा बदलाव हुआ, जब राजस्व गांव झाझड़िया की ढाणी को मिलाकर खींवासर को स्वतंत्र नई ग्राम पंचायत का दर्जा दे दिया गया। पंचायत बनने के बाद हुए पहले चुनाव में बिमला देवी यहां की पहली महिला सरपंच चुनी गईं। पदभार संभालते ही उन्होंने सार्वजनिक विकास को गति देने के लिए पंचायत भवन के निर्माण हेतु अपनी ओर से दो बीघा जमीन दान में देकर एक अनुकरणीय पहल की थी।

## प्रसाद घर नहीं ले जाने का सख्त नियम और मनोकामना के प्रतीक
ऊबली का बालाजी मंदिर के महंत जगदीश प्रसाद शर्मा के अनुसार मंदिर की पूजा पद्धति में एक विशेष नियम का पालन अनिवार्य रूप से किया जाता है। श्रद्धालु जब बालाजी महाराज को पशु के पहले दूध से बना दही भोग के रूप में अर्पित करते हैं, तो उस प्रसाद को अपने घर वापस लेकर जाने की सख्त मनाही होती है। पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद बचे हुए दही के प्रसाद को मंदिर परिसर के भीतर ही मौजूद अन्य श्रद्धालुओं, आगंतुकों और ग्रामीणों के बीच पूरी तरह वितरित कर दिया जाता है। अपनी मुरादें पूरी करने के लिए भक्तजन यहां नारियल चढ़ाते हैं और मंदिर की वेदी व परिसर में लाल रंग की ध्वजा बांधकर सुख, समृद्धि और मवेशियों की सलामती की प्रार्थना करते हैं।

## पंचायत बनने के पांच साल बाद भी दफ्तरों का अभाव
खींवासर को अलग ग्राम पंचायत का दर्जा मिले पांच साल का समय बीत चुका है, लेकिन बुनियादी प्रशासनिक सेवाओं की कमी से ग्रामीणों को निरंतर परेशानी उठानी पड़ रही है। गांव में अब तक कृषि विभाग का कोई कार्यालय नहीं खुल पाया है और न ही पटवार भवन का निर्माण हो सका है। नतीजतन, खेती-किसानी से जुड़े किसानों को प्रमाणित खाद-बीज की सलाह, तकनीकी मार्गदर्शन और गिरदावरी या जमीन के नामांतरण जैसे पटवारी से संबंधित छोटे-छोटे कामों के लिए भी सात से आठ किलोमीटर दूर छऊ पंचायत जाना पड़ता है। इस यात्रा में किसानों का कीमती समय और धन दोनों बर्बाद होते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकार ने खींवासर को पंचायत मुख्यालय बना दिया है, तो इससे जुड़े सभी प्रशासनिक तंत्र और सरकारी दफ्तर यहीं सुचारू रूप से संचालित होने चाहिए ताकि आमजन को राहत मिले।

## शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करने को विवश बच्चे
शिक्षा के क्षेत्र में भी खींवासर के सामने बुनियादी ढांचे की भारी कमी बनी हुई है। गांव में फिलहाल केवल आठवीं कक्षा तक का ही सरकारी स्कूल संचालित हो रहा है। आठवीं उत्तीर्ण करने के बाद छात्र-छात्राओं को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के लिए गांव छोड़ना पड़ता है। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए बच्चों को या तो निजी संस्थानों में भारी फीस देकर दाखिला लेना पड़ता है, या फिर प्रतिदिन छावसरी और बड़ागांव के सरकारी स्कूलों का लंबा सफर तय करना पड़ता है। ग्रामीण लंबे अरसे से इस सरकारी स्कूल को सीनियर सेकेंडरी स्तर तक क्रमोन्नत करने की मांग उठा रहे हैं, जिससे गांव के लड़के और लड़कियों को उच्च माध्यमिक शिक्षा अपने ही गांव में बिना किसी परेशानी के उपलब्ध हो सके।

## इसका आप पर असर
पशुपालकों के लिए यह परंपरा मवेशियों के स्वास्थ्य और आस्था से जुड़ी है, जबकि बुनियादी सेवाओं की कमी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है।

- **पशुपालकों के लिए:** पशु के ब्याने पर पहले दूध का दही चढ़ाने से मवेशी बीमारियों से सुरक्षित माने जाते हैं। श्रद्धालु इस धार्मिक परंपरा के चलते प्रसाद घर नहीं ले जाते और वहीं परिसर में बांटते हैं।
- **किसानों के कामकाज पर:** कृषि और पटवार भवन न होने से किसानों को 7 से 8 किलोमीटर दूर छऊ जाना पड़ता है। इससे राजस्व कार्यों और खाद-बीज की जानकारी के लिए समय और किराया दोनों खर्च होते हैं।
- **छात्रों की पढ़ाई पर:** गांव का सरकारी स्कूल सिर्फ आठवीं तक होने से बच्चों को दूर जाना पड़ता है। उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए छात्र छावसरी, बड़ागांव या निजी स्कूलों पर निर्भर हैं।
- **व्यापार और दैनिक बाजार:** बालाजी स्टैंड अनाज मंडी, बैंक और दुकान होने से ग्रामीणों का मुख्य केंद्र है। आसपास के आधा दर्जन गांवों के लोग खरीदारी और लेन-देन यहीं आकर करते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
इस अनूठी परंपरा और स्थानीय स्थिति के पीछे धार्मिक विश्वास, पशुधन सुरक्षा की आवश्यकता और सरकारी स्तर पर प्रशासनिक देरी प्रमुख वजह है।

- **अनूठी परंपरा का कारण:** ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन आजीविका का मुख्य साधन है और पहले दूध का दही बालाजी को अर्पित कर पशुओं को निरोगी रखने की 200 साल पुरानी मान्यता है। श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर लाल ध्वजा और नारियल भी अर्पित करते हैं।
- **प्रसाद घर न ले जाने का नियम:** महंत के अनुसार यह परंपरा देवस्थान की शुचिता और सभी में प्रसाद वितरण की पुरातन मर्यादा से जुड़ी है, ताकि संपूर्ण भोग वहीं के समुदाय में खप जाए।
- **दफ्तरों की कमी का कारण:** वर्ष 2020 में खींवासर को नई ग्राम पंचायत बनाया गया, परंतु पंचायत स्तर के विभागीय पद और कार्यालयों की स्वीकृति व स्थापना की प्रक्रिया अभी तक अधूरी है।
- **स्कूल क्रमोन्नति में देरी:** स्थानीय स्कूल का दायरा आठवीं तक सीमित है और ग्रामीणों की लगातार मांगों के बावजूद प्रशासनिक स्वीकृति न मिलने से बच्चों को दूसरे गांवों का रुख करना पड़ता है।

## सवाल-जवाब

### 1. ऊबली के बालाजी मंदिर में किस चीज का भोग लगाया जाता है?
यहां मिठाई के बजाय पशु के ब्याने के बाद उसके पहले दूध से तैयार किए गए ताजा दही का भोग लगाया जाता है।

### 2. दही का भोग लगाने के पीछे क्या धार्मिक मान्यता है?
मान्यता है कि पहले दूध का दही बालाजी को अर्पित करने से पशु वर्षभर गंभीर बीमारियों से सुरक्षित और स्वस्थ रहते हैं।

### 3. भोग लगाने के बाद बचे हुए प्रसाद को लेकर क्या नियम है?
भोग लगाने के बाद बचे हुए दही के प्रसाद को घर नहीं ले जाया जा सकता, इसे मंदिर परिसर में ही उपस्थित लोगों के बीच बांटना अनिवार्य होता है।

### 4. खींवासर गांव की स्थापना किसने की थी?
खींवासर गांव की स्थापना करीब 300 साल पहले पिपराली से आए मूंड गोत्र के खींवाराम जाट ने की थी।

### 5. खींवासर को स्वतंत्र ग्राम पंचायत का दर्जा कब मिला?
यह गांव वर्ष 2020 में झाझड़िया की ढाणी के साथ मिलकर छऊ से अलग होकर नई स्वतंत्र ग्राम पंचायत बना।

### 6. गांव के किसानों को पटवारी और कृषि संबंधी कामों के लिए कहां जाना पड़ता है?
गांव में पटवार और कृषि भवन न होने के कारण किसानों को लगभग सात से आठ किलोमीटर दूर छऊ जाना पड़ता है।

### 7. खींवासर में बच्चों की उच्च शिक्षा के सामने क्या चुनौती है?
गांव में सरकारी स्कूल केवल आठवीं तक है, जिसके कारण बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए छावसरी, बड़ागांव या निजी स्कूलों में जाना पड़ता है।

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