किशनगढ़ के 125 साल पुराने मेले की अनूठी कहानी, जहां प्रथम विश्व युद्ध के बाद राजा ने शुरू की थी परंपरा अजमेर के किशनगढ़ में बालाजी के ऐतिहासिक मेले की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी है। महाराजा मदन सिंह द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। अजमेर जिले के किशनगढ़ शहर के मुख्य बाजार में स्थित बालाजी का 125 साल पुराना मंदिर अपनी गहरी आस्था और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस स्थान से जुड़ी परंपरा का इतिहास प्रथम विश्व युद्ध के दौर से शुरू होता है। राजा की मन्नत से शुरू हुआ आयोजन ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, किशनगढ़ के तत्कालीन महाराजा मदन सिंह प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने के लिए रवाना होने से ठीक पहले इस मंदिर में पहुंचे थे। उन्होंने यहां मत्था टेका और मन्नत मांगी कि यदि वह युद्ध में विजय प्राप्त करके सकुशल वापस लौटते हैं, तो इस स्थल पर एक विशाल मेले का आयोजन शुरू करवाया जाएगा। युद्ध के मैदान में जीत हासिल करने के बाद जब वह अपने राज्य लौटे, तो उन्होंने अपने संकल्प को पूरा किया। महाराजा ने उसी दिन से हर साल इस मेले का आयोजन आरंभ करवाया, जो आज तक अनवरत रूप से जारी है। चबूतरे से लेकर 210 गांवों तक का संदेश मंदिर के पुजारियों के अनुसार, महाराजा मदन सिंह के शासनकाल के समय बालाजी महाराज की मूर्ति एक साधारण चबूतरे के रूप में स्थापित थी। युद्ध में जाने से पूर्व राजा ने यहीं पर मेले की परंपरा शुरू करने का प्रण लिया था। जब उनकी विजय हुई, तो उन्होंने किशनगढ़ उपखंड के अंतर्गत आने वाले कुल 210 गांवों तक इस मेले की सूचना और निमंत्रण पहुंचाने के लिए विशेष आदेश प्रसारित किए। इसके पश्चात, प्रत्येक वर्ष भादवा सुदी तेरस के पावन अवसर पर इस मेले की शुरुआत की गई, जिसमें आज भी भारी संख्या में लोग अपनी गहरी आस्था प्रकट करते हैं। परिक्रमा और शक्ति परीक्षण का पुराना दौर पुजारी बताते हैं कि अतीत में इस मेले की रूपरेखा आज से काफी अलग थी। उस समय किशनगढ़ उपखंड के सभी 210 गांवों से ग्रामीण विशेष रूप से लहरिया लेकर बालाजी महाराज के दर्शन करने के लिए यहां एकत्रित होते थे। उस दौर में इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण बालाजी महाराज की परिक्रमा करना और ग्रामीण इलाकों के युवाओं के बीच होने वाला शक्ति परीक्षण हुआ करता था। अलग-अलग गांवों के दल परिक्रमा में उत्साह के साथ भाग लेते थे। जो दल सबसे पहले परिक्रमा पूरी करके सफलता हासिल करता था, उसे सबसे आगे स्थान दिया जाता था, जिसके बाद बाकी गांवों के लोग अपने निर्धारित क्रम के अनुसार इसमें शामिल होते थे। लहरिया बांधने की जीवंत परंपरा उस समय समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और शारीरिक क्षमता के प्रदर्शन को बहुत अधिक प्राथमिकता दी जाती थी। परिक्रमा का अनुष्ठान पूरा होने के बाद श्रद्धालु बालाजी महाराज के नाम का विशेष लहरिया बंधवाते थे। समय बीतने के साथ मेले की प्रबंधन व्यवस्था में कई बदलाव आए, लेकिन यह लहरिया बांधने की अनूठी रस्म आज भी इस ऐतिहासिक धरोहर की अमूल्य याद दिलाती है। राजशाही दरबार से प्रशासनिक अधिकारियों तक सफर मंदिर के पुजारी बताते हैं कि शुरुआती दौर में किशनगढ़ के महाराजा के शाही दरबार की तरफ से श्रद्धालुओं को लहरिया बांधा जाता था। जैसे-जैसे वक्त बदला, यह पूरी जिम्मेदारी प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत आ गई। वर्तमान समय में किशनगढ़ के उपखंड अधिकारी, जिन्हें क्षेत्र का प्रथम नागरिक भी माना जाता है, इस पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं। पुजारी परिवार की कई पीढ़ियां इस मंदिर की सेवा में समर्पित रही हैं। गोविंद दास, जौहरी दास, मोती दास, भेरू दास, बनवारी लाल और उनके बाद बृजेश कुमार तक सेवा करने का यह सिलसिला अनवरत रूप से आगे बढ़ रहा है। इसका आप पर असर किशनगढ़ के इस ऐतिहासिक मेले का स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक और प्रशासनिक महत्व जुड़ा हुआ है। • किशनगढ़ में: स्थानीय निवासियों और आसपास के 210 गांवों के लोगों के लिए यह मेला आपसी भाईचारे और पुरानी परंपराओं से जुड़ने का मुख्य अवसर रहता है। उपखंड अधिकारी इस परंपरा का निर्वहन करते हुए प्रशासनिक और सांस्कृतिक समन्वय बनाए रखते हैं। • भारत में: यह आयोजन देश भर के सांस्कृतिक पर्यटन मानचित्र पर स्थानीय रियासतों के इतिहास और पारंपरिक मेलों के महत्व को रेखांकित करता है। ऐसे मेले ग्रामीण क्षेत्रों की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में मदद करते हैं। ऐसा क्यों हुआ इस ऐतिहासिक मेले की उत्पत्ति और निरंतरता के पीछे एक राजा का संकल्प और स्थानीय समुदायों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। • युद्ध की मन्नत: प्रथम विश्व युद्ध में जाने से पहले महाराजा मदन सिंह द्वारा दी गई मन्नत इस मेले की स्थापना का मुख्य प्रत्यक्ष कारण बनी। • क्षेत्रीय विस्तार: महाराजा द्वारा किशनगढ़ के 210 गांवों तक संदेश भिजवाने के आदेश ने इस आयोजन को एक बड़े क्षेत्रीय उत्सव में बदल दिया। • परंपरा का संरक्षण: राजशाही शासन व्यवस्था के समाप्त होने के बाद स्थानीय प्रशासन और पुजारी परिवार की पीढ़ियों ने इस विरासत को जीवित रखा है। सवाल-जवाब 1. किशनगढ़ का यह मेला कितने साल पुराना है? किशनगढ़ का यह ऐतिहासिक मेला 125 वर्ष पुराना है। 2. इस मेले की शुरुआत किसने की थी? इस मेले की शुरुआत किशनगढ़ के महाराजा मदन सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध से लौटने के बाद की थी। 3. मेले में कुल कितने गांवों के लोग शामिल होते थे? किशनगढ़ उपखंड के 210 गांवों के लोग इस मेले में शामिल होते थे। 4. मेले में कौन सी प्रमुख परंपरा निभाई जाती है? मेले के दौरान बालाजी महाराज की परिक्रमा और उनके नाम का लहरिया बंधवाने की परंपरा मुख्य रूप से निभाई जाती है। 5. वर्तमान में इस परंपरा को कौन आगे बढ़ाता है? वर्तमान में किशनगढ़ के उपखंड अधिकारी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। https://trendkia.com/rajasthan/kishangarh-ke-125-saal-purane-mele-ki-kahani-maharaja-madan-singh-51386 TrendKia — Har trend, sabse pehle.