कोटा में गाय के गोबर से जगमगाएगी दिवाली, महिलाओं ने संभाली ढाई लाख इको-फ्रेंडली दीपक बनाने की जिम्मेदारी राजस्थान के कोटा में डॉ. रूपा आनंद झा की पहल से स्थानीय महिलाएं गाय के गोबर से आकर्षक और डिजाइनर दीपक तैयार कर रही हैं, जहां इस दिवाली करीब दो से ढाई लाख दीपक बनाने का लक्ष्य रखा गया है। दीपावली के पर्व पर इस बार घरों में केवल मिट्टी के पारंपरिक दीपक ही रोशनी नहीं फैलाएंगे, बल्कि गाय के गोबर से तैयार किए गए पर्यावरण अनुकूल और बेहद आकर्षक दिए भी उत्सव का मुख्य आकर्षण बनने जा रहे हैं। राजस्थान के कोटा शहर में महिलाओं के एक समूह ने स्वदेशी और प्रकृति के अनुकूल विकल्पों को अपनाते हुए आत्मनिर्भरता की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम उठाया है। इस पूरे प्रयास का नेतृत्व डॉ. रूपा आनंद झा कर रही हैं, जिनके इस विचार से स्थानीय स्तर पर महिलाओं को सीधे तौर पर आजीविका और रोजगार के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं। इस त्योहारी सीजन में गोबर जैसी पारंपरिक सामग्री को उपयोगी और सुंदर कलाकृतियों में बदलकर लगभग दो से ढाई लाख दीपक तैयार करने की योजना बनाई गई है। जयपुर के गो महाकुंभ से मिली थी प्रेरणा गोबर से उपयोगी और कलात्मक वस्तुएं तैयार करने की यह सोच अचानक नहीं उपजी, बल्कि इसके पीछे एक ठोस अनुभव और प्रशिक्षण शामिल है। डॉ. रूपा आनंद झा को इस दिशा में काम करने की वास्तविक प्रेरणा राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित हुए गो महाकुंभ की एक विशाल प्रदर्शनी को देखकर मिली थी। उस प्रदर्शनी में गोबर से निर्मित विभिन्न प्रकार के उत्पादों को देखने और समझने के बाद उन्होंने इसे गंभीरता से सीखने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने बाकायदा विशेष प्रशिक्षण हासिल किया कि कैसे गोबर को टिकाऊ और आकर्षक उत्पादों में बदला जा सकता है। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने अगरबत्ती, धूपबत्ती, हवन सामग्री, पारंपरिक कंडे और मुख्य रूप से पूजा के काम आने वाले गोबर के दीपकों का व्यवस्थित निर्माण आरंभ किया। फैंसी और फ्लावर डिजाइन में तैयार हो रहे दीये कोटा में तैयार किए जा रहे यह दीपक कोई सामान्य आकार के नहीं हैं, बल्कि इन्हें ग्राहकों की पसंद और आधुनिक सजावट के अनुरूप कई कलात्मक रूपों में ढाला जा रहा है। इन दीपकों में विशेष रूप से फ्लावर डिजाइन, लाइनिंग पैटर्न और विभिन्न फैंसी प्रारूप शामिल हैं, जो देखने में बेहद सुंदर लगते हैं। बाजार में मिट्टी के दीपकों के साथ-साथ इन प्राकृतिक दीपकों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरण के प्रति जागरूक लोग इन दीपकों को काफी प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि ये पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं और त्योहार के बाद प्रकृति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। महिलाओं के हाथों की यह कला अब उनके स्वावलंबन और सम्मान का सशक्त माध्यम बन चुकी है। हैंडमेड मशीन और महिलाओं का रोजाना का उत्पादन दीपकों की फिनिशिंग बेहतर रखने और उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए डॉ. रूपा ने अपने व्यक्तिगत स्तर पर एक हैंडमेड मशीन भी तैयार करवाई है। यद्यपि यह मशीन पूर्ण रूप से ऑटोमेटिक नहीं है और इसे चलाने में शारीरिक श्रम और समय थोड़ा अधिक लगता है, लेकिन इसके उपयोग से बनने वाले दीपकों की बनावट और किनारों की फिनिशिंग काफी साफ और मजबूत निकलती है। वर्तमान समय में इस कुटीर स्वरोजगार से लगभग पांच महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। कड़ी मेहनत और उत्साह के साथ काम करते हुए एक महिला प्रतिदिन करीब 250 से 300 दीपक आसानी से ढाल लेती है। मशीन की सहायता से काम की गति में सुधार हुआ है और गुणवत्ता भी निरंतर बनी हुई है। हाड़ौती अंचल में ऑर्गेनिक उत्पादों को बढ़ावा इस पूरे उपक्रम का मुख्य उद्देश्य दिवाली के अवसर पर करीब दो से ढाई लाख दीपक बाजार में उपलब्ध कराकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देना है। इस कार्य में नारी शक्ति ग्रुप के साथ-साथ क्षेत्र के कई अन्य गैर-सरकारी संगठनों का भी सक्रिय सहयोग प्राप्त हो रहा है। डॉ. रूपा आनंद झा का मानना है कि राजस्थान के हाड़ौती अंचल में गाय के गोबर से बनने वाले प्राकृतिक और ऑर्गेनिक उत्पादों के प्रति जन जागरूकता का प्रसार होना बेहद जरूरी है। उनका लक्ष्य है कि घरों और गोशालाओं में सहजता से उपलब्ध होने वाले गोबर को आमदनी और स्वावलंबन का बड़ा साधन बनाया जाए। इससे जहां स्थानीय महिलाओं को घर बैठे गरिमापूर्ण रोजगार मिलेगा, वहीं समाज भी पारंपरिक और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। इसका आप पर असर इस पहल से पर्यावरण अनुकूल त्योहार मनाने और स्थानीय महिलाओं की आय बढ़ाने में सीधा बदलाव देखने को मिलेगा। • भारत में: त्योहारी सीजन में रासायनिक और सिंथेटिक सजावट की जगह पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल विकल्पों को बढ़ावा मिलेगा। इससे खरीदार स्थानीय स्तर पर बने प्राकृतिक उत्पादों को अपनाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। • कोटा में: स्थानीय महिलाओं को घर के पास ही सम्मानजनक स्वरोजगार और नियमित कमाई का साधन प्राप्त हुआ है। इसके अलावा हाड़ौती क्षेत्र के खरीदारों को पारंपरिक मिट्टी के साथ-साथ गोबर से बने फैंसी और मजबूत दीपक उचित दाम पर आसानी से उपलब्ध होंगे। • गोपालकों के लिए: अनुपयोगी माने जाने वाले गाय के गोबर का व्यावसायिक इस्तेमाल बढ़ने से पशुपालकों के लिए भी अतिरिक्त आय के रास्ते खुलेंगे। यह मॉडल छोटे शहरों में ग्रामीण संसाधनों के सदुपयोग को बढ़ावा देगा। • पर्यावरण सुरक्षा: त्योहार के बाद इन दीपकों को पौधों में खाद के रूप में मिलाया जा सकता है, जिससे किसी तरह का कचरा नहीं फैलेगा। इससे मिट्टी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहेंगे। ऐसा क्यों हुआ स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ने और दिवाली पर पर्यावरण के अनुकूल स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। • सीधी प्रेरणा: डॉ. रूपा आनंद झा ने जयपुर में आयोजित गो महाकुंभ प्रदर्शनी में गोबर से निर्मित विभिन्न वस्तुओं को देखा था। उसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने व्यावसायिक उपयोग के लिए इसका प्रशिक्षण लिया। • संसाधनों का मूल्य संवर्धन: हाड़ौती क्षेत्र में बहुतायत से मिलने वाले गाय के गोबर का सही उपयोग कर महिलाओं के लिए नियमित आमदनी खड़ी करने की आवश्यकता महसूस की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए डिजाइनर दीपकों का निर्माण शुरू किया गया। • स्वदेशी और प्राकृतिक उत्पादों की मांग: त्योहारों पर लोग तेजी से रासायनिक और प्लास्टिक सामग्रियों के स्थान पर पारंपरिक और प्राकृतिक विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ढाई लाख दीपकों का लक्ष्य रखा गया। सवाल-जवाब 1. कोटा में महिलाएं किस सामग्री से दीये बना रही हैं? कोटा में महिलाएं गाय के गोबर से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल डिजाइनर दीपक तैयार कर रही हैं। 2. इस दीया निर्माण पहल का नेतृत्व कौन कर रहा है? इस अनूठी पहल की शुरुआत डॉ. रूपा आनंद झा ने की है, जो महिलाओं को प्रशिक्षित कर इसका संचालन कर रही हैं। 3. इस दिवाली पर कितने दीपक बनाने का लक्ष्य रखा गया है? इस दिवाली के अवसर पर करीब दो से ढाई लाख दीपक तैयार करके बाजार में उतारने का लक्ष्य तय किया गया है। 4. डॉ. रूपा को इस कार्य की प्रेरणा कहां से मिली? उन्हें यह प्रेरणा राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित हुए गो महाकुंभ की विशाल प्रदर्शनी से मिली थी। 5. एक महिला प्रतिदिन औसतन कितने दीपक तैयार कर लेती है? हैंडमेड मशीन की सहायता से एक महिला रोजाना लगभग 250 से 300 दीपक आसानी से तैयार कर लेती है। 6. इन दीपकों में कौन-कौन से प्रमुख डिजाइन बनाए जा रहे हैं? इन दीपकों को फैंसी डिजाइन, फ्लावर पैटर्न और लाइनिंग प्रारूप में आकर्षक रूप दिया जा रहा है। 7. दीपक बनाने के अलावा वहां और क्या उत्पाद बनाए गए हैं? प्रशिक्षण के बाद वहां धूपबत्ती, हवन सामग्री और पारंपरिक कंडे भी बनाए जा रहे हैं। 8. इस काम में किन संगठनों का सहयोग मिल रहा है? इस कार्य में नारी शक्ति ग्रुप और क्षेत्र के कई अन्य गैर-सरकारी संगठनों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। प्रेरणा और सबक यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक और सामान्य संसाधनों का सही उपयोग कर समाज में सकारात्मक बदलाव और आर्थिक स्वावलंबन लाया जा सकता है। • सीखने और शुरू करने का जज्बा: जयपुर प्रदर्शनी से प्रेरित होकर डॉ. रूपा ने पहले तकनीक सीखी और फिर उसे व्यावहारिक रूप दिया, जो सिखाता है कि नई चीजें सीखने की इच्छा ही सफलता की पहली सीढ़ी है। • कम संसाधनों में नवाचार: महंगी आधुनिक मशीनों का इंतजार करने के बजाय उन्होंने खुद हैंडमेड मशीन तैयार की, जिससे साबित होता है कि सीमित साधनों में भी काम शुरू किया जा सकता है। • सामूहिक सशक्तिकरण: केवल अपने तक सीमित न रहकर उन्होंने अन्य स्थानीय महिलाओं को जोड़ा और उनके लिए सम्मानजनक आय का माध्यम बनाया। • प्रकृति और परंपरा का तालमेल: पर्यावरण की रक्षा करते हुए पारंपरिक आस्था को नए डिजाइन में प्रस्तुत करना सिखाता है कि आधुनिकता और परंपरा साथ चल सकते हैं। https://trendkia.com/rajasthan/kota-men-gaya-ke-gobara-se-jagamagaegi-divali-mahilaon-ne-snbhali-dhai-lakha-iko-phrendali-dipaka-banane-ki-jimmedari-45128 TrendKia — Har trend, sabse pehle.