कोटा में फेंकी जाने वाली राख से बदली ईंट उद्योग की तस्वीर, तीन हजार लोगों को मिला काम कोटा थर्मल पावर प्लांट की राख अब कचरा नहीं, कमाई का जरिया बन गई है, इससे बनी सस्ती और मजबूत ईंटों से करीब 3 हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है। कोटा थर्मल पावर प्लांट से हर दिन निकलने वाली राख को कभी सिर्फ कचरा समझा जाता था, लेकिन अब यही राख शहर के ईंट कारोबार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है। ट्रक भर-भरकर यह राख भट्ठों तक पहुंच रही है और वहां सस्ती, मजबूत और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर ईंटें तैयार हो रही हैं, जिनकी बदौलत हजारों लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। पहले पॉल्यूशन की मार, अब राहत इस कारोबार से जुड़े स्थानीय निवासी जयकिशन सरकार के मुताबिक, पहले लाल ईंटें बनाने के लिए भट्ठियों में लगातार आग जलानी पड़ती थी, जिससे आसपास के इलाकों में भारी एयर पॉल्यूशन और गर्मी की समस्या रहती थी। इसके अलावा लाल ईंटें जुटाने के लिए लाखेरी और केथून जैसे दूर-दराज के इलाकों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे माल ढुलाई यानी ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी काफी बढ़ जाता था। अब थर्मल प्लांट की राख को सीमेंट में मिलाकर बनाई जा रही ईंटों ने इन दोनों ही समस्याओं को काफी हद तक खत्म कर दिया है, क्योंकि यह कच्चा माल आसपास ही आसानी से मिल जाता है और भट्ठी में पकाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। दाम भी कम, मजबूती भी ज्यादा आम उपभोक्ताओं का कहना है कि बाजार में पारंपरिक लाल ईंट करीब 5 से 5.50 रुपये प्रति पीस में मिलती है, जबकि थर्मल राख से बनी ईंट महज 3.50 रुपये से 4 रुपये प्रति पीस के बीच उपलब्ध हो जाती है। मकान मालिक भीमराज गुर्जर ने बताया कि उन्होंने अपने घर और दुकान दोनों के निर्माण में यही ईंटें लगवाई हैं। उनका अनुभव है कि इन ईंटों की मजबूती और कटिंग दोनों काफी अच्छी होती है, इनमें सीलन यानी सीपेज की शिकायत भी नहीं आती और प्लास्टर पर होने वाला खर्च भी बच जाता है। चूंकि एक सामान्य मकान बनाने में औसतन 15 से 20 हजार ईंटों की जरूरत पड़ती है, इसलिए हर ईंट पर बचने वाला डेढ़ रुपये तक का फासला पूरे निर्माण की लागत में बड़ा फर्क डाल देता है। तीन हजार लोगों को रोजगार, इलाके की बदली तस्वीर कोटा थर्मल प्लांट के आसपास ही अब कई छोटे-बड़े उद्योग खड़े हो चुके हैं। प्लांट से महज 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में स्थित गांवों में कई ईंट भट्ठे और आधुनिक मशीनें लग चुकी हैं, जो लगातार राख से ईंटें बना रही हैं। इस पूरे कारोबार से क्षेत्र के करीब 2 से 3 हजार मजदूरों और कामगारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। जो राख कभी थर्मल पावर प्लांट के लिए महज एक बोझ और सिरदर्द हुआ करती थी, उसी ने अब कचरे से कंचन बनाने वाली पुरानी कहावत को हकीकत में बदल दिया है। इसका आप पर असर इस बदलाव का सबसे सीधा असर मकान बनवाने वालों की जेब पर पड़ रहा है, क्योंकि ईंट की कीमत में करीब डेढ़ रुपये प्रति पीस तक का फर्क आ रहा है। • भारत में: थर्मल पावर प्लांट की राख से बनने वाली ये ईंटें दिखाती हैं कि औद्योगिक कचरे से भी सस्ता और मजबूत निर्माण सामान बनाया जा सकता है, ऐसे मॉडल को अन्य राज्यों के थर्मल प्लांटों के आसपास भी अपनाया जा सकता है। • कोटा में: कोटा और आसपास के गांवों में रहने वाले 2 से 3 हजार मजदूरों को सीधा या परोक्ष रोजगार मिल रहा है, जिससे इलाके की स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला है। • घर बनाने वालों के लिए: 15 से 20 हजार ईंटों वाले सामान्य मकान में डेढ़ रुपये प्रति ईंट की बचत जोड़ने पर हजारों रुपये तक की सीधी बचत हो सकती है, साथ ही प्लास्टर और सीलन रोकने का अतिरिक्त खर्च भी घटता है। • पर्यावरण के लिहाज से: लाल ईंट पकाने में लगने वाली भट्ठियों की आग और उससे होने वाला वायु प्रदूषण अब कम हो रहा है, क्योंकि राख से बनी ईंटों को भट्ठी में पकाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसा क्यों हुआ यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि पुराने ईंट कारोबार की दिक्कतों और थर्मल प्लांट से निकलने वाली भारी मात्रा में राख, दोनों की वजह से हुआ। • पारंपरिक भट्ठियों से प्रदूषण: लाल ईंट बनाने के लिए भट्ठियों में लगातार आग जलानी पड़ती थी, जिससे आसपास के इलाकों में भारी एयर पॉल्यूशन और गर्मी की समस्या पैदा होती थी। • दूर से ईंट मंगाने की मजबूरी: लाल ईंटों के लिए लाखेरी और केथून जैसे दूर के इलाकों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ जाती थी और ईंटें महंगी पड़ती थीं। • थर्मल प्लांट की राख का ढेर: कोटा थर्मल पावर प्लांट से रोजाना निकलने वाली राख पहले सिर्फ वेस्ट मटेरियल मानी जाती थी और उसे ठिकाने लगाना प्लांट के लिए सिरदर्द बना रहता था। • नजदीक उद्योगों की स्थापना: प्लांट के 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में ईंट भट्ठे और आधुनिक मशीनें लगने से राख को सीमेंट में मिलाकर तुरंत ईंट में बदलना मुमकिन हो गया। सवाल-जवाब 1. कोटा में ईंटें अब किससे बनाई जा रही हैं? कोटा थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख को सीमेंट में मिलाकर ईंटें बनाई जा रही हैं। 2. थर्मल राख से बनी ईंट की कीमत कितनी है? यह ईंट करीब 3.50 रुपये से 4 रुपये प्रति पीस में मिल जाती है, जबकि पारंपरिक लाल ईंट 5 से 5.50 रुपये प्रति पीस पड़ती है। 3. इस कारोबार से कितने लोगों को रोजगार मिल रहा है? कोटा थर्मल प्लांट के आसपास इस कारोबार से करीब 2 से 3 हजार मजदूरों और कामगारों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है। 4. पहले लाल ईंटें कहां से मंगाई जाती थीं? पहले लाल ईंटों के लिए लाखेरी और केथून जैसे दूर-दराज के इलाकों पर निर्भर रहना पड़ता था। 5. थर्मल राख से बनी ईंटों के क्या फायदे हैं? इन ईंटों की मजबूती और कटिंग अच्छी होती है, इनमें सीलन नहीं आती, प्लास्टर का खर्च बचता है और भट्ठी में पकाने से होने वाला प्रदूषण भी नहीं होता। 6. एक मकान बनाने में कितनी ईंटों की जरूरत होती है? एक सामान्य मकान के निर्माण में औसतन 15 से 20 हजार ईंटों की जरूरत होती है। प्रेरणा और सबक कोटा का यह बदलाव दिखाता है कि किसी समस्या को सही नजरिए से देखा जाए तो वह मौके में बदल सकती है। • कचरे को अवसर बनाना: जिस राख को कभी सिर्फ बोझ माना जाता था, उसी को कारोबार का आधार बनाकर स्थानीय उद्यमियों ने नया मुनाफा कमाने का रास्ता निकाला। • लागत और पर्यावरण दोनों का ध्यान: राख से ईंट बनाने से न सिर्फ भट्ठियों की आग और प्रदूषण घटा, बल्कि ईंटों की कीमत भी घट गई, यह दिखाता है कि किफायती और पर्यावरण अनुकूल समाधान साथ-साथ मुमकिन हैं। • संसाधन के पास ही उत्पादन: थर्मल प्लांट के 1-2 किलोमीटर के दायरे में ही भट्ठे लगाकर दूर से माल मंगाने की मजबूरी खत्म कर दी गई, जिससे ट्रांसपोर्ट खर्च और समय दोनों बचे। • सामूहिक रोजगार का मॉडल: इस एक बदलाव से 2 से 3 हजार लोगों को सीधा फायदा मिला, जो दिखाता है कि छोटे स्तर के नवाचार भी बड़े पैमाने पर आजीविका पैदा कर सकते हैं। https://trendkia.com/rajasthan/kota-men-phenki-jane-vali-rakha-se-badali-inta-udyoga-ki-tasvira-tina-hajara-logon-ko-mila-kama-29507 TrendKia — Har trend, sabse pehle.