# क्रांतिकारियों की आराध्य सुगाली माता का मंदिर, जहां 1857 में ब्रिटिश हुकूमत भी कांप उठी थी

> पाली के आऊवा गांव में 10 सिर और 54 हाथों वाली सुगाली माता की अलौकिक प्रतिमा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की मुख्य शक्ति बनी रही।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/krantikariyon-ki-aradhya-sugali-mata-ka-mndira-jahan-1857-men-british-hukumata-bhi-kanpa-uthi-thi-42746 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुगाली माता, आऊवा का इतिहास, पाली राजस्थान, ठाकुर कुशाल सिंह, 1857 की क्रांति, मॉक मेंसन, मारवाड़ संस्कृति

राजस्थान की मरुधरा केवल अपनी अनूठी संस्कृति और रेत के धोरों के लिए ही नहीं, बल्कि अदम्य वीरता, बलिदान और चमत्कारी आस्था के लिए भी जानी जाती है। मारवाड़ अंचल का आऊवा गांव ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थान है, जहां का इतिहास 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अमर अध्याय से गहराई से जुड़ा हुआ है। पाली जिले के मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव भक्ति और शक्ति के अनोखे संगम का गवाह रहा है। इस मिट्टी पर आऊवा राजघराने की कुलदेवी मां सुगाली का वास है, जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दौर में क्रांतिकारियों की संरक्षक देवी माना गया था।

## 10 सिर और 54 भुजाओं वाली अद्वितीय प्रतिमा
मां सुगाली की यह प्राचीन मूर्ति काले पत्थर से तराशी गई है और समूचे देश में अपने स्वरूप की इकलौती प्रतिमा मानी जाती है। इसके 10 मस्तक और 54 हाथ हैं, जो देवी के अत्यंत विराट और सर्वशक्तिमान रूप को दर्शाते हैं। प्रारंभ में यह दिव्य प्रतिमा आऊवा के किले के भीतर स्थापित थी। आऊवा के तत्कालीन शासक ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत मां सुगाली के अनन्य उपासक थे। लोक आस्था के अनुसार, मां सुगाली अपने भक्तों के संकट हरने वाली अत्यंत दयालु और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें खासतौर पर महिलाओं और नन्हे बच्चों की रक्षा करने वाली कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।

## जब अंग्रेजी फौज के सामने आंधी बनकर उतरी दिव्य शक्ति
साल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब देश के कई छोटे-बड़े रजवाड़े ब्रिटिश हुकूमत के साथ खड़े नजर आ रहे थे, तब आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ दिया था। उन्होंने विदेशी शासन को चुनौती देते हुए बगावत का परचम लहराया। मान्यता है कि जब भी ब्रिटिश फौज आऊवा पर धावा बोलने आती, रणक्षेत्र में एक रहस्यमयी काली आंधी छा जाती थी। अंग्रेजों को उस धूल भरी आंधी के बीच नंगी तलवारें भांजती वीरांगनाएं दिखाई पड़ती थीं, जिससे हमलावर सैनिकों में भारी भगदड़ मच जाती थी।

## हमले की पूर्व सूचना और मॉक मेंसन का वध
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत को आऊवा पर होने वाले किसी भी ब्रिटिश सैन्य हमले की भनक पहले ही लग जाती थी। इसे मां सुगाली की विशेष अनुकंपा माना जाता था। स्वतंत्रता सेनानी रणभूमि में उतरने से पूर्व मंदिर में माता की विधिवत पूजा-अर्चना करते थे और शंखनाद कर युद्ध का बिगुल फूंकते थे। इसी अदम्य साहस और आस्था के दम पर आऊवा के वीर बांकुरों ने जोधपुर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन को मौत के घाट उतार दिया था। क्रांतिकारियों ने मॉक मेंसन का सिर काटकर आऊवा किले की ऊंची प्राचीर पर लटका दिया था, जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी।

## अंग्रेजों का खौफ और प्रतिमा का खंडन
आऊवा के रण में बार-बार मात खाने से ब्रिटिश हुकूमत बेहद बौखला गई थी। जब उनके गुप्तचर तंत्र ने यह खबर दी कि आऊवा के सैनिकों का असली मनोबल और सैन्य शक्ति मां सुगाली के आशीर्वाद से संचालित है, तो अंग्रेजी सेना ने सीधे आऊवा के किले को निशाना बनाया। भय और कुंठा में डूबे अंग्रेज सैनिकों ने मंदिर पर हमला बोल दिया। उन्होंने माता की पवित्र प्रतिमा पर गाय का रक्त डालकर उसे अपवित्र और खंडित कर दिया। इसके बाद वे उस ऐतिहासिक प्रतिमा को अपने साथ उठाकर ले गए।

## गर्दन का तिरछा होना और पैनोरमा की स्थापना
स्वतंत्रता संग्राम समाप्त होने के बाद आऊवा शासक के वंशज और डिंगल भाषा के प्रसिद्ध कवि ठाकुर नाहर सिंह ने मां सुगाली की प्रतिमा को दोबारा मंदिर में स्थापित कराने का प्रयास किया। उस समय पत्थर से बनी इस प्रतिमा की गर्दन अपने आप एक ओर तिरछी हो गई। गर्दन का यह झुकाव आज भी लोगों के लिए असीम कौतूहल और गहरी आस्था का विषय बना हुआ है। समय बीतने के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने की मांग उठती रही। इसके बाद वर्ष 2018 में आऊवा गांव में 1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा का निर्माण किया गया और उसे ग्रामीणों को सौंपा गया।

## 162 साल बाद हूबहू नई मूर्ति और नवरात्रि का उल्लास
पैनोरमा परिसर में 162 साल बाद मां सुगाली की ठीक वैसी ही 10 सिर और 54 हाथों वाली नई प्रतिमा बनाकर प्रतिष्ठापित की गई, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग आते हैं। वर्तमान समय में आऊवा के मुख्य मंदिर में दो प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिनकी दैनिक पूजा-अर्चना एक साथ पूरी विधि-विधान से संपन्न होती है। नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान आऊवा गांव में श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। राजस्थान के स्थानीय गांवों के अलावा पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर मां के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं।

## इसका आप पर असर
यह ऐतिहासिक विवरण पाठकों को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने क्षेत्रीय संघर्षों और सांस्कृतिक विरासत से सीधे जोड़ता है।

- **भारत में:** यह इतिहास देश भर के पाठकों को याद दिलाता है कि 1857 का संग्राम केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण अंचलों में भी लड़ा गया था। इससे नई पीढ़ी को स्थानीय वीरों और आस्था से जुड़े प्रतिरोध के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है।
- **पाली और राजस्थान में:** आऊवा गांव आज भी ऐतिहासिक पर्यटन और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय निवासी और श्रद्धालु यहां 2018 में बने पैनोरमा और प्राचीन मंदिर में जाकर इस गौरवशाली इतिहास का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** नवरात्रि और विशेष अवसरों पर पाली जाने वाले श्रद्धालु आऊवा में दोनों प्रतिमाओं के दर्शन कर सकते हैं। यह स्थल आस्था के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को नमन करने का बड़ा केंद्र है।
- **इतिहास के विद्यार्थियों के लिए:** मारवाड़ के ब्रिटिश विरोधी आंदोलन और मॉक मेंसन से जुड़े प्रसंगों को समझने के लिए आऊवा का अध्ययन आवश्यक है। यह शोधार्थियों को लोककथाओं और अभिलेखीय इतिहास के आपसी संबंध को समझने की व्यावहारिक दृष्टि देता है।

## ऐसा क्यों हुआ
आऊवा का यह तीव्र संघर्ष तब उपजा जब स्थानीय शासक ने ब्रिटिश सत्ता की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और अपनी कुलदेवी की छत्रछाया में विद्रोह का बिगुल फूंका।

- **सीधा कारण:** ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह किया और जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन की सेना से सीधा मोर्चा लिया। इसके चलते औपनिवेशिक सेना ने आऊवा को दबाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
- **धार्मिक आस्था और मनोबल:** क्रांतिकारियों की सैन्य ऊर्जा का मुख्य केंद्र सुगाली माता की आराधना थी, जिससे सैनिकों में असीम हौसला पैदा होता था। जब अंग्रेजों को इस बात की खबर लगी, तो उन्होंने मनोबल तोड़ने के लिए मंदिर पर हमला किया।
- **बदले की ब्रिटिश कार्रवाई:** मॉक मेंसन के वध और किले की प्राचीर पर उसका सिर लटकाए जाने से ब्रिटिश हुकूमत बुरी तरह तिलमिला गई थी। इसी प्रतिशोध में अंग्रेजों ने माता की प्रतिमा को अपवित्र कर खंडित किया और जब्त कर लिया।
- **विरासत का पुनरुत्थान:** स्वतंत्रता के बाद ठाकुर नाहर सिंह के प्रयासों और आगे चलकर 2018 में सरकारी पैनोरमा के निर्माण ने इस ऐतिहासिक स्थल को उसका खोया हुआ गौरव लौटाया।

## सवाल-जवाब

### 1. सुगाली माता की प्रतिमा की क्या विशेषता है?
सुगाली माता की यह काले पत्थर की प्रतिमा देश में इकलौती है, जिसके 10 मस्तक और 54 हाथ हैं।

### 2. आऊवा गांव राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
आऊवा गांव राजस्थान के पाली जिले में स्थित है, जो जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

### 3. 1857 के संग्राम में आऊवा का नेतृत्व किसने किया था?
आऊवा में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व वहां के शासक ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने किया था।

### 4. आऊवा के वीरों ने किस ब्रिटिश अधिकारी का सिर किले पर लटकाया था?
आऊवा के क्रांतिकारियों ने जोधपुर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन का सिर काटकर किले की प्राचीर पर टांग दिया था।

### 5. अंग्रेजों ने सुगाली माता की प्रतिमा को क्यों खंडित किया था?
अंग्रेजों को जब पता चला कि सैनिकों की शक्ति का स्रोत सुगाली माता का आशीर्वाद है, तो उन्होंने भय और बौखलाहट में प्रतिमा को खंडित कर दिया।

### 6. आऊवा में 1857 स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा का निर्माण कब हुआ?
आऊवा गांव में 1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा का निर्माण वर्ष 2018 में किया गया, जहां माता की हूबहू नई प्रतिमा लगाई गई।

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