# लोरडिया तालाब में पसरी गंदगी ने छीनी पाली के सिंघाड़े की मिठास, बाहरी आवक पर निर्भर हुए बाजार

> प्रशासनिक उपेक्षा और सीवरेज के दूषित पानी के कारण पाली के ऐतिहासिक लोरडिया तालाब में सिंघाड़े की पारंपरिक खेती पूरी तरह ठप हो गई है, जिससे व्यापारियों को अब ब्यावर से माल मंगाना पड़ रहा है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/lordia-lake-men-pasari-gndagi-ne-chhini-pali-ke-singhare-ki-mithasa-bahari-avaka-para-nirbhara-hue-bajara-46314 · **Language:** Hindi
**Tags:** पाली, सिंघाड़ा, लोरडिया तालाब, ब्यावर, पारंपरिक खेती, जल प्रदूषण, मारवाड़

मारवाड़ के बाजारों में गुलाबी ठंड की शुरुआत होते ही ठेलों और दुकानों पर सिंघाड़े सजने लगे हैं, लेकिन इस बार स्थानीय फल की मिठास पूरी तरह गायब नजर आ रही है। मारवाड़ अंचल में जब भी कुरकुरे, रसीले और प्राकृतिक मिठास वाले सिंघाड़े की चर्चा छिड़ती है, तो सबसे पहला नाम पाली का ही सामने आता रहा है। दशकों तक जिस फल ने अपनी अनूठी पहचान के दम पर दूर-दराज की मंडियों में धाक जमाई, आज उसी की स्थानीय पैदावार अपने वजूद की लड़ाई हार चुकी है। कभी लोरडिया तालाब के लबालब पानी से सींची जाने वाली यह पारंपरिक फसल अब उसी जलस्रोत की बदहाली के चलते इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की कगार पर पहुंच गई है।

## गंदगी और सीवरेज की मार से उजड़ गई पारंपरिक खेती
पाली शहर के ऐतिहासिक लोरडिया तालाब को स्थानीय सिंघाड़ा उत्पादन का उद्गम स्थल और प्रमुख केंद्र माना जाता था। पिछले कुछ दशकों के दौरान तेज गति से हुए अनियंत्रित शहरीकरण ने इस प्राकृतिक जलस्रोत का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया। शहर की नालियों का गंदा सीवरेज का पानी, घरों से निकलने वाला कचरा और प्लास्टिक सीधे तालाब में गिरने से इसका पानी जहरीला हो गया। पानी की सतह के नीचे भारी मात्रा में गाद और प्लास्टिक कचरा जम जाने से जलीय पौधों और सिंघाड़े की बेलों का पनपना मुश्किल होता गया। लगातार गिरती गुणवत्ता और फसल खराब होने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। प्रशासनिक देखरेख के घोर अभाव और लगातार उपेक्षा से तंग आकर पीढ़ियों से सिंघाड़ा उगाने वाले माली समाज और स्थानीय कृषकों ने इस काम से पूरी तरह किनारा कर लिया। इसके चलते दर्जनों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया और उनका पारंपरिक रोजगार हमेशा के लिए छिन गया।

## स्वाद और बनावट में क्यों बेजोड़ माना जाता था लोरडिया का फल
कृषि विशेषज्ञों और पुराने जानकारों के मुताबिक, लोरडिया तालाब के प्राकृतिक शुद्ध पानी और वहां के तलछट की काली उपजाऊ मिट्टी के अनोखे मिश्रण की वजह से यहां उगने वाले सिंघाड़े का स्वाद बेमिसाल होता था। सामान्य सिंघाड़ों के मुकाबले लोरडिया का सिंघाड़ा मध्यम आकार का होता था, जिसे छीलना बेहद आसान रहता था। इसमें गूदा अधिक मात्रा में निकलता था, जो प्राकृतिक रूप से बेहद मीठा और कुरकुरा होता था। यही खास खूबियां थीं जिनके दम पर पाली के सिंघाड़े की जबर्दस्त मांग सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि जोधपुर, सिरोही, जालौर और बाड़मेर तक के बाजारों में इसकी जोरदार खपत होती थी। आज भी कई फल विक्रेता अपने ठेलों पर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इसी नाम का सहारा लेते हैं।

## ब्यावर की आवक से चल रही है दुकानों की साख
लोरडिया तालाब में स्थानीय पैदावार शून्य हो जाने के बावजूद त्योहारी और मौसमी बाजार में सिंघाड़े की मांग कम नहीं हुई है। अपनी साख और वर्षों पुरानी दुकानदारी को जिंदा रखने के लिए स्थानीय व्यापारी अब पड़ोसी जिले ब्यावर और अन्य बाहरी इलाकों के जलाशयों से प्रतिदिन गाड़ियां मंगवा रहे हैं। फल विक्रेताओं का कहना है कि बाहर से माल लाकर बाजार की जरूरत और ग्राहकों की मांग तो पूरी की जा रही है, लेकिन जो स्वाद, कुरकुरापन और खास सौंधापन लोरडिया तालाब की उपज में था, उसकी बराबरी कोई बाहरी फल नहीं कर सकता। यदि स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग ने जल्द ही लोरडिया तालाब के जीर्णोद्धार और इसे सीवरेज व प्रदूषण से मुक्त कराने के ठोस कदम नहीं उठाए, तो पाली के सिंघाड़े की यह ऐतिहासिक मिठास हमेशा के लिए सिर्फ किस्सों और चर्चाओं तक ही सिमट कर रह जाएगी।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक लोरडिया तालाब में प्रदूषण की वजह से स्थानीय पैदावार खत्म हो चुकी है, जिससे खरीदारों को असली स्वाद नहीं मिल पा रहा है और किसानों का रोजगार छिन गया है।

- **पाली में:** स्थानीय माली समुदाय और किसानों की पारंपरिक आजीविका पूरी तरह ठप हो गई है। तालाब के दूषित होने से किसानों को भारी नुकसान हुआ और उन्होंने इस व्यवसाय से हाथ खींच लिए हैं।
- **मारवाड़ और राजस्थान में:** जोधपुर, सिरोही, जालौर और बाड़मेर के बाजारों में अब पाली का असली स्थानीय सिंघाड़ा उपलब्ध नहीं है। दुकानों पर पाली के नाम पर ब्यावर और अन्य बाहरी इलाकों का माल बेचा जा रहा है।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** ग्राहकों को बाजार में सिंघाड़ा तो मिल रहा है, लेकिन लोरडिया तालाब के खास सौंधेपन और मिठास की कमी महसूस हो रही है। दुकानदारों को भी बाहरी आपूर्ति पर निर्भर रहने के कारण परिवहन और खरीद का अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ रहा है।
- **पर्यावरण और जल संरक्षण:** ऐतिहासिक लोरडिया तालाब सीवरेज और कचरे के डंपिंग यार्ड में तब्दील हो चुका है। समय रहते सफाई न होने पर शहर का एक ऐतिहासिक प्राकृतिक जलस्रोत पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

## ऐसा क्यों हुआ
पाली के लोरडिया तालाब में सिंघाड़े की खेती बंद होने की मुख्य वजह गंभीर जल प्रदूषण और प्रशासनिक लापरवाही है। शहर के अनियंत्रित विस्तार ने इस ऐतिहासिक जलस्रोत को गंदे नाले में बदल दिया।

- **सीवरेज और कचरे का गिरना:** शहर का अनियंत्रित गंदा पानी और घरेलू सीवरेज बिना किसी शोधन के सीधे लोरडिया तालाब में बहाया गया। इसके साथ ही प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट डंप किए जाने से पानी जहरीला हो गया।
- **गाद और प्लास्टिक का जमाव:** तालाब के तल में भारी मात्रा में गाद और प्लास्टिक कचरा जमा हो गया। इससे जलकुंभी और सिंघाड़े की बेलों के विकास के लिए जरूरी जलीय पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो गया।
- **लगातार आर्थिक नुकसान:** दूषित पानी के कारण सिंघाड़े की फसल की गुणवत्ता बुरी तरह गिर गई और फल सड़ने लगे। बार-बार नुकसान उठाने के बाद किसानों के लिए खेती जारी रखना आर्थिक रूप से असंभव हो गया।
- **प्रशासनिक उपेक्षा:** वर्षों तक स्थानीय प्रशासन ने तालाब के रखरखाव, सीवरेज रोकने और जीर्णोद्धार पर कोई ध्यान नहीं दिया। संरक्षण के अभाव में पीढ़ियों से काम कर रहे कृषक समुदाय ने खेती छोड़ दी।

## सवाल-जवाब

### 1. पाली के सिंघाड़े की क्या खासियत थी?
लोरडिया तालाब का सिंघाड़ा मध्यम आकार, छीलने में आसान, अधिक गूदेदार और प्राकृतिक रूप से बेहद मीठा तथा कुरकुरा होता था।

### 2. पाली में सिंघाड़े की खेती बंद होने का मुख्य कारण क्या है?
लोरडिया तालाब में सीवरेज का गंदा पानी, प्लास्टिक कचरा गिरने और गाद जमने से पानी जहरीला हो गया, जिससे खेती नष्ट हो गई।

### 3. किन-किन जिलों में पाली के सिंघाड़े की ज्यादा मांग रहती थी?
पाली के अलावा जोधपुर, सिरोही, जालौर और बाड़मेर के बाजारों में इसकी भारी मांग रहती थी।

### 4. स्थानीय पैदावार बंद होने के बाद अब व्यापारी सिंघाड़ा कहां से मंगा रहे हैं?
स्थानीय व्यापारी बाजार की मांग पूरी करने के लिए पड़ोसी जिले ब्यावर और अन्य बाहरी इलाकों से सिंघाड़ा मंगा रहे हैं।

### 5. क्या ब्यावर से आने वाला सिंघाड़ा लोरडिया तालाब जितना स्वादिष्ट है?
व्यापारियों के अनुसार, बाहर का सिंघाड़ा मांग तो पूरी कर रहा है, लेकिन उसमें लोरडिया तालाब जैसा स्वाद और सौंधापन नहीं है।

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