महंगे बीज और पिछले घाटे के बावजूद अलवर के किसानों को प्याज पर भरोसा, बड़े पैमाने पर बुवाई शुरू पिछले साल के आर्थिक नुकसान और इस वर्ष बीज की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद, राजस्थान के अलवर और खैरथल-तिजारा क्षेत्र के किसान 14,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की खेती करने की तैयारी में जुटे हैं। राजस्थान के पूर्वी हिस्से, विशेष रूप से अलवर और खैरथल-तिजारा जिलों को उनके तीखे और उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले लाल प्याज के लिए देश भर में जाना जाता है। हालांकि पिछले साल थोक बाजारों में बेहद कम दाम मिलने के कारण स्थानीय किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद इस साल प्याज की खेती के प्रति उनका उत्साह बेहद मजबूत दिखाई दे रहा है। वर्तमान सीजन में किसान एक बड़े स्तर पर प्याज की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, जो बढ़ती लागत और मौसम की चुनौतियों के बीच उनकी अटूट उम्मीदों को दर्शाता है। बुवाई का बढ़ता दायरा और बीज की आसमान छूती कीमतें अकेले खैरथल-तिजारा जिले की बात करें तो इस चालू सीजन के दौरान कुल बुवाई का क्षेत्र 14,000 हेक्टेयर से अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि लगभग 70 प्रतिशत से अधिक किसानों ने अपने खेतों में प्याज का कण लगाने की प्रक्रिया को पूरा कर लिया है। वहीं, बचे हुए अन्य किसान भी जल्द से जल्द खेतों में गांठी लगाने का काम निपटाने में व्यस्त हैं। इस साल प्याज की खेती में सबसे बड़ी चुनौती बीज यानी गांठी की कीमतों में आई भारी तेजी बनी हुई है। क्षेत्र के किशनगढ़ बास में बड़ी संख्या में अस्थायी बीज विक्रेता ट्रकों में भरकर बीज लेकर पहुंच रहे हैं, ताकि किसानों को सही समय पर इसकी उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा सके। बीज की कीमतों में पिछले साल की तुलना में इस बार दोगुने से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बीते वर्ष जो प्याज का बीज 3,000 रुपये से लेकर 3,500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिल रहा था, उसकी कीमत इस सीजन में बढ़कर 6,500 रुपये से लेकर 7,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। इस बढ़ती महंगाई ने किसानों के बजट को काफी प्रभावित किया है, लेकिन वे फिर भी खेती के प्रति समर्पित हैं। लागत कम करने के लिए किसानों ने अपनाया आत्मनिर्भरता का मार्ग महंगे बीज की वजह से फसल की शुरुआती लागत काफी बढ़ गई है, जिससे बचने के लिए किसानों ने आत्मनिर्भरता का एक नया तरीका निकाला है। अब क्षेत्र के 50 प्रतिशत से अधिक किसान बाजार से महंगा बीज खरीदने के बजाय अपने खुद के खेतों में ही प्याज का कण तैयार कर रहे हैं। इस पद्धति के तहत किसान अपनी जरूरत के अनुसार कण को बचाकर रख लेते हैं और अतिरिक्त हिस्से को अन्य जरूरतमंद किसानों को अच्छे मुनाफे पर बेच देते हैं। इस पहल से न केवल बाहरी महंगे बीजों पर किसानों की निर्भरता काफी हद तक खत्म हो गई है, बल्कि बाजार में प्याज के दाम कम होने की स्थिति में भी किसानों को सीधा वित्तीय नुकसान बहुत कम उठाना पड़ता है। प्रति बीघा खर्च और फसल को बीमारियों से बचाने की चुनौती स्थानीय किसान शिवचरण यादव, हवा सिंह और फराज खान ने प्याज की खेती में आने वाले व्यावहारिक खर्चों पर बात की। उनके अनुसार, एक बीघा खेत में बुवाई के लिए तकरीबन चार से पांच क्विंटल कण की जरूरत पड़ती है। जब इसमें कीटनाशक, खाद, सिंचाई और मजदूरों की दिहाड़ी को जोड़ लिया जाए, तो कुल लागत लगभग 50,000 रुपये से लेकर 60,000 रुपये प्रति बीघा तक पहुंच जाती है। पिछले वर्ष हुए भारी नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से ही किसान इस बार बेहतर बाजार भाव की उम्मीद में बुवाई का दायरा लगातार बढ़ा रहे हैं। लागत के साथ-साथ इस समय मौसम भी किसानों की परीक्षा ले रहा है। क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश और हवा में नमी की अत्यधिक मात्रा के कारण प्याज की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है। सहायक कृषि अधिकारी महेश खेरिया ने किसानों को सचेत करते हुए बताया कि वर्तमान मौसम की स्थिति में प्याज की फसल को एंथेक्नोज यानी ट्विस्टर ब्लाइट और कंद सड़न रोग से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने सलाह दी है कि किसान अपने खेतों में पानी बिल्कुल न जमा होने दें और जल निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था करें। जैसे ही धूप खिले और मौसम साफ हो, किसानों को कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में उचित फफूंदनाशी का छिड़काव करना चाहिए, ताकि फसल को सड़ने से समय रहते बचाया जा सके। इसका आप पर असर इस खबर का सीधा असर राजस्थान के किसानों और देश भर के प्याज उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। • राजस्थान में: अलवर और खैरथल-तिजारा के किसानों को इस महंगे सीजन में अपनी पूंजी बचाने के लिए बीमारियों से सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। उन्हें कृषि अधिकारियों की सलाह मानकर फफूंदनाशी का सही समय पर इस्तेमाल करना चाहिए। • भारत में: देश के एक बड़े प्याज उत्पादक क्षेत्र में बुवाई का रकबा बरकरार रहने से आने वाले महीनों में प्याज की आपूर्ति सामान्य रह सकती है। अगर फसल मौसम की मार से सुरक्षित रही, तो आम उपभोक्ताओं को सामान्य कीमतों पर प्याज मिलता रहेगा। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति बाजार में बीज की कमी, बढ़ती मांग और इस साल के अप्रत्याशित मौसमी बदलावों के कारण उत्पन्न हुई है। • बीज के दाम बढ़ने का कारण: बाजार में मांग बढ़ने और बीज आपूर्ति की कमी के कारण प्याज की गांठी के भाव पिछले साल की तुलना में दोगुने हो गए हैं। • आत्मनिर्भर मॉडल: महंगी बाजार कीमतों से बचने और वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए किसानों ने अपने खेतों में खुद ही कण तैयार करना शुरू कर दिया है। • बीमारियों का खतरा: लगातार हो रही बारिश और अत्यधिक आर्द्रता के कारण खेतों में जलभराव की समस्या हो रही है, जिससे एंथेक्नोज और कंद सड़न जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। सवाल-जवाब 1. इस वर्ष खैरथल-तिजारा में कितने क्षेत्र में प्याज की बुवाई का अनुमान है? इस सीजन में खैरथल-तिजारा जिले में 14,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की बुवाई होने का अनुमान लगाया गया है। 2. इस साल प्याज के बीज (गांठी) की कीमतों में कितना उछाल आया है? प्याज के बीज की कीमतें पिछले साल के 3,000-3,500 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर इस साल 6,500 से 7,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। 3. बढ़ती लागत से बचने के लिए किसानों ने क्या तरीका अपनाया है? 50 प्रतिशत से अधिक किसानों ने अपने खेतों में ही प्याज का कण (बीज) तैयार करना शुरू कर दिया है, जिससे वे बाहरी महंगे बीजों पर निर्भर नहीं रहते। 4. प्रति बीघा प्याज की खेती में कुल कितना खर्च आता है? एक बीघा प्याज की खेती में बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी मिलाकर लगभग 50,000 से 60,000 रुपये का खर्च आता है। 5. खराब मौसम के कारण प्याज की फसल को किन बीमारियों का खतरा है? लगातार बारिश और उमस के कारण फसल में एंथेक्नोज (ट्विस्टर ब्लाइट) और कंद सड़न रोग फैलने का सबसे ज्यादा जोखिम है। प्रेरणा और सबक यह रिपोर्ट अलवर के किसानों की विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता और उनके नवीन दृष्टिकोण को दर्शाती है। • आत्मनिर्भरता का महत्व: बाहरी महंगे बीजों पर निर्भर रहने के बजाय खुद खेतों में कण तैयार करके किसानों ने अपनी लागत आधी कर ली। • जोखिम प्रबंधन: अपने इस्तेमाल से बचे अतिरिक्त बीज को अन्य किसानों को बेचकर लाभ कमाना संकट के समय आय का एक नया जरिया बन गया। • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मौसम की मार से निपटने के लिए किसान कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर तुरंत अमल कर रहे हैं, जो फसल सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। https://trendkia.com/rajasthan/mahnge-bija-aura-pichhale-ghate-ke-bavajuda-alwar-ke-kisanon-ko-pyaja-para-bharosa-bare-paimane-para-buvai-shuru-32488 TrendKia — Har trend, sabse pehle.