मारवाड़ की पगड़ी परंपरा के संवाहक बने बिन्जाराम गौड़, 40 सेकंड में सजा देते हैं सिर पर शान बाड़मेर के मूल निवासी और जोधपुर में रह रहे 85 वर्षीय बुजुर्ग बिन्जाराम गौड़ अपनी अनोखी फुर्ती से केवल 40 सेकंड में पारंपरिक जोधपुरी साफा बांधकर सांस्कृतिक विरासत को संजो रहे हैं। राजस्थान की लोक संस्कृति में साफा केवल सिर ढकने का वस्त्र नहीं माना जाता, बल्कि यह सदियों से गौरव, मान-मर्यादा और सामाजिक सम्मान का प्रतीक रहा है। पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में साफे का स्थान हमेशा से विशिष्ट रहा है, जहाँ हर मांगलिक अवसर पर इसे पहनाना आदर प्रकट करने की सर्वोच्च परंपरा समझा जाता है। आधुनिक जीवनशैली और बदलते पहनावे के दौर में पारंपरिक पगड़ी बांधने वाले सिद्धहस्त कारीगरों की संख्या सीमित होती जा रही है। इसी परिवेश में जोधपुर में रहने वाले वयोवृद्ध बिन्जाराम गौड़ अपनी कला से बीते जमाने की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी के सम्मुख जीवंत बनाए हुए हैं। सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और मारवाड़ में साफे का महत्व मारवाड़ अंचल में पगड़ी अथवा साफा व्यक्ति की सामाजिक पहचान और स्वाभिमान का अभिन्न अंग रहा है। विवाह समारोह, पारिवारिक उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान अथवा विशिष्ट अतिथियों के सत्कार में साफा पहनाने की परंपरा अनिवार्य मानी जाती रही है। जोधपुर शैली का साफा अपने विशेष घुमाव, विशिष्ट रंगों और बनावट के कारण दुनिया भर में अलग पहचान रखता है। वक्त बीतने के साथ जब नई पीढ़ी रेडीमेड विकल्पों और आधुनिक परिधानों को प्राथमिकता देने लगी है, तब पारंपरिक तरीके से हाथ से साफा संवारने का कौशल धीरे-धीरे दुर्लभ हो रहा है। ऐसे दौर में बुजुर्ग कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले मजबूत स्तंभ बने हुए हैं। उम्र के पड़ाव पर भी हाथों की गजब गति मूल रूप से बाड़मेर जिले के रहने वाले बिन्जाराम गौड़ की आयु 85 वर्ष से अधिक हो चुकी है। वे पिछले कई दशकों से जोधपुर में निवास कर रहे हैं और नियमित रूप से इस विधा का अभ्यास करते हैं। जैसे ही वे साफे के कपड़े को अपने हाथों में लेते हैं, कपड़े की बनावट, उसकी तह और पूरी लंबाई का सटीक अनुमान पल भर में लगा लेते हैं। इसके बाद उनके हाथों की उंगलियां इतनी तेजी से चलती हैं कि दर्शक आश्चर्यचकित रह जाते हैं। मात्र 40 सेकंड के भीतर वे कपड़े को सलीके से मोड़ते हुए सिर पर एक सुव्यवस्थित और आकर्षक जोधपुरी साफा तैयार कर देते हैं। वर्षों का कड़ा अभ्यास और लोक विधा का संरक्षण महज 40 सेकंड में साफा बांधने की यह कला किसी संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर लगन और अनवरत अभ्यास से तराशा गया हुनर है। कपड़े के हर घुमाव को सही कोण देना और सिर पर संतुलन बनाए रखना एक ऐसी दक्षता है जो केवल गहरे समर्पण से संभव होती है। बिन्जाराम गौड़ के लिए यह कौशल मात्र काम का साधन नहीं है, बल्कि उनकी दिनचर्या और जीवन मूल्यों से रचा-बसा हिस्सा है। उनके हाथों से बंधा हर साफा राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहर, बुजुर्गों की गौरवशाली परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आता है। इसका आप पर असर पारंपरिक हस्तशिल्प और लोक कलाओं के संरक्षण का महत्व सीधे तौर पर क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक आयोजनों से जुड़ा हुआ है। • राजस्थान में: राज्य में होने वाले शादी-ब्याह और सामाजिक आयोजनों में प्रामाणिक पगड़ी बांधने वाले कारीगरों की मांग निरंतर बनी रहती है। ऐसे वरिष्ठ कारीगरों से प्रेरणा लेकर युवा पीढ़ी इस लोक कला को सीखकर सांस्कृतिक आयोजनों में रोजगार के अवसर भी तैयार कर सकती है। • देश भर में: भारतीय धरोहर और पहनावे के प्रति नई पीढ़ी में जागरूकता बढ़ती है। पारंपरिक परिधानों की बारीकियों को समझने से हस्तनिर्मित और सांस्कृतिक वस्त्र परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिलती है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक साफा बांधने की कला के आधुनिक समय में दुर्लभ होने और वरिष्ठ कारीगरों की निरंतर सक्रियता के पीछे सांस्कृतिक व जीवनशैली से जुड़े कारण मौजूद हैं। • पारंपरिक कला का निरंतर अभ्यास: बिन्जाराम गौड़ ने दशकों तक मारवाड़ की सामाजिक परंपराओं के बीच इस कला का निरंतर अभ्यास किया है। हाथों की इस अद्भुत गति और 40 सेकंड के हुनर का सीधा कारण वर्षों की लगन और अनुभव है। • आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव: नई पीढ़ी द्वारा तैयार परिधानों और पूर्व-निर्मित पगड़ियों का उपयोग बढ़ने से हाथ से साफा बांधने की तकनीक सीखने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई है। • मारवाड़ में साफे का अटूट महत्व: सामाजिक और मांगलिक कार्यक्रमों में साफे को सम्मान का सर्वोच्च प्रतीक मानने की परंपरा आज भी कायम है, जिसके कारण यह कला पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है। सवाल-जवाब 1. बिन्जाराम गौड़ कौन हैं और वे किस हुनर के लिए जाने जाते हैं? बिन्जाराम गौड़ 85 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग हैं, जो महज 40 सेकंड में पारंपरिक जोधपुरी साफा बांधने की अपनी असाधारण कला के लिए जाने जाते हैं। 2. बिन्जाराम गौड़ मूल रूप से कहां के निवासी हैं? वे मूल रूप से राजस्थान के बाड़मेर जिले के रहने वाले हैं और बीते कई वर्षों से जोधपुर में निवास कर रहे हैं। 3. जोधपुरी साफे को बांधने में बिन्जाराम गौड़ को कितना समय लगता है? वे कपड़े को हाथ में लेकर सिर्फ 40 सेकंड के भीतर व्यवस्थित और सुंदर साफा तैयार कर देते हैं। 4. राजस्थान की संस्कृति में साफे का क्या महत्व माना जाता है? राजस्थान, विशेषकर मारवाड़ में, साफा केवल सिर का पहनावा नहीं बल्कि स्वाभिमान, सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। प्रेरणा और सबक 85 वर्ष की उम्र में भी किसी पारंपरिक विधा में शीर्ष दक्षता बनाए रखना जीवन के हर क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक सीख देता है। • उम्र की सीमाओं से परे अभ्यास: 85 वर्ष की आयु में भी 40 सेकंड में साफा बांधना यह सिखाता है कि नियमित अभ्यास से शारीरिक फुर्ती और मानसिक एकाग्रता जीवनपर्यंत बनी रह सकती है। • सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान: बदलते वक्त और पश्चिमी परिधानों के बीच अपनी मिट्टी और लोक परंपराओं को निष्ठा से संजोए रखना व्यक्तिगत पहचान को सशक्त बनाता है। • हुनर को साधना बनाना: जब कोई कला केवल व्यवसाय न होकर जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है, तब उसमें असाधारण निपुणता और स्वाभाविकता आ जाती है। https://trendkia.com/rajasthan/maravara-ki-pagari-parnpara-ke-snvahaka-bane-binjaram-gaur-40-seknda-men-saja-dete-hain-sira-para-shana-43150 TrendKia — Har trend, sabse pehle.